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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 530 में से

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पृष्ठ 42

३४ वरिवस्यारहस्ये
(४) गायत्रीमन्त्र का 'महि' = पञ्चदशीमन्त्र का 'ल' (पृथ्वी) ।।
(५) गायत्रीमन्त्र का चौथा चरण = 'धियो यो नः प्रचोदयात् । पञ्चदशीमन्त्र
का = 'ह्रीं' (मायाबीज, लज्जाबीज) ।। गायत्रीमन्त्र एवं पञ्चदशी के
मन्त्राक्षर परस्पर के मन्त्राक्षरों के प्रतिनिधि है—प्रतीक है—प्रतिनिधि है—
तदर्थक हैं ।
गायत्रीमन्त्र और पञ्चदशी का 'कामराजकूट'—
जिस प्रकार गायत्रीमन्त्र एवं वाग्भवकूट के मन्त्राक्षर परस्पर प्रतीक हैं उसी
प्रकार गायत्रीमन्त्र के अक्षर पञ्चदशीमन्त्र के 'कामराजकूट' के अक्षरों के भी प्रतीक
हैं—दोनों मन्त्रों के अक्षर एक ही अर्थ सङ्केतित करते हैं—अतः दोनों में साम्य है ।

गायत्रीमंत्र के अक्षरपञ्चदशी मंत्र के अक्षर
१. 'तत् सवितुः वरेण्यम्' (अक्षरत्रय)'ह' 'स' 'क'—अक्षरत्रय के बोधक
२. 'भर्गो देवस्य धी' (षडक्षर)'ह' (चौथा वर्ण)
३. 'भर्गो देवस्य धी''स' 'क' तृतीयकूट के दो वर्ण
(द्वितीय एवं तृतीय कूटों के शेष
वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से
करना चाहिए ।)
कूटत्रय एवं शक्तियों में तादात्म्य
ब्रह्मा-भारती, वामा-इच्छा ┐ १. वाग्भवकूट ┐
हरि-क्षिति, ज्येष्ठा-ज्ञाना ─┤ मिथुनत्रय = २. कामराजकूट │
शिव-अपर्णा, रौद्री-क्रिया ┘ ३. शक्तिकूट¹ ┘
तीन समष्टियाँ (पुरुष एवं नारी तत्त्व का सङ्घात) = शान्त एवं अम्बिका रूप
में तीन 'ईकार' ।। भारती, सकले एवं ब्रह्मा आदि से आरंभ होने वाले त्रिकत्रय =
माया (ह्रीं) से रहित कूटत्रय के बोधक ।। 'माया' (ह्रीङ्कार) का चौथा मिथुन है =
जो शिव-शक्ति का बोधक है ।
पञ्चदशीमन्त्र में पन्द्रह वर्ण हैं किन्तु अनेक वर्णों की पुनरुक्ति भी है अतः
पुनरुक्ति को छोड़कर गिने तो पञ्चदशी में मात्र सात ही अक्षर प्रयुक्त हुए हैं ।
पञ्चदशी के सात मूलाक्षर = वामा-इच्छा-ज्येष्ठा-ज्ञाना-रौद्री-क्रिया के प्रतीक ।।
'पञ्चदशीमन्त्र' में प्रयुक्त मूलाक्षर—७—(क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह, स)
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१. वरिवस्यारहस्यम् (६०-६५)