वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ४१
(१५) 'मन्त्र' भगवान का वर्णावतार है । 'मन्त्र' भगवती का शब्द-विग्रह है ।
३. मन्त्रस्वरूप विषयक अन्य दृष्टियाँ—
'मन्त्र' परमात्मा का सार्वकालिक शाश्वत एवं चिन्मय शब्दावतार है । 'मन्त्र'
अपने तात्त्विकस्तर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् पराशक्ति की नादात्मक
अभिव्यक्तियाँ हैं । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है क्योंकि शक्ति एवं शिव
अभिन्न हैं । समस्त मन्त्र वर्णात्मक तो हैं ही किन्तु सारे वर्ण भी शिवात्मक हैं—
'मन्त्रावर्णात्मका सर्वेवर्णाः सर्वेशिवात्मकाः ॥'
परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्शस्वरूप 'हृदय' कहा
गया है । 'मन्त्र' ही उसका हृदय है । विमर्शशक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र
नहीं है और यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—"सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला
विशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥"१
'मन्त्र'-साधना के तीन मुख्य अङ्ग हैं—१. मन्त्र २. मन्त्र-जापक ३. मन्त्र का
वाच्य (देवता) ॥ अपने तात्त्विकस्तर पर मन्त्र वहीं है जहाँ मन्त्र एवं उसका
वाच्यदेवता एकात्मता प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि—
“मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥”२
मन्त्र की मूल शक्ति है चित् शक्ति । इसीलिए कहा गया है—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥” मन्त्र का बल है निरावरण चित्शक्ति का उल्लासन । उसी
शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो उठते हैं
और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । आत्मा के परतत्त्व का अवबोध
होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।३
'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में ठीक ही कहा गया है कि वर्णातीत निराकार परम
तत्त्व का अवबोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ ही मांत्रिक के किङ्कर हो
जाते हैं । चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्णमात्र (जड़
अक्षर) मात्र बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फल चेष्टा करते हैं ।
'हंसपारमेश्वर'-नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि “केवल वर्णरूप मन्त्र
'पशुभाव' में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चरित होने पर वे पशुपति बन जाते
हैं और इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थाएँ हैं—१. 'पशु अवस्था' २. 'पशुपति
अवस्था' ।
'श्रीवैहायसी'-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—“संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि
द्वारा ही बोधित जान करना चाहिए । यथा सूत्र में मणि पिरोये जाते हैं तद्वत्
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (अ० ४) २. ब्रह्मानन्द गिरि—शाक्तानन्द तरंगिणी
३. स्पन्द प्रदीपिका