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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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भूमिका ३१
योग्य एवं तृतीय रूप को—मन के योग्य देखता है । इसी रूप त्रैविध्य के कारण
देवी की भावना भी द्विविधात्मिका है—१. सरूपा २. अरूपा ।। प्रथम स्थूल-
रूपानुसंधानात्मिका है एवं द्वितीय पररूपानुसंधानात्मिका (चरमा) है । प्रथम स्वरूप
बहिर्याग द्वारा एवं दूसरा अन्तर्याग द्वारा साधित है ।
आचार्य भास्करराय ने मन्त्र-विज्ञान पर शोध करते हुए इस निष्पत्ति की
स्थापना की कि वेदमात्रा गायत्री के भी दो रूप हैं—१. सामान्य (Exotenic) एवं
२. गुप्त (Esotenic) ।। गायत्री का जो समान्य स्वरूप है वह उसका
चतुर्विशत्यात्मक वर्णमाला से एवं पादत्रय से निर्मित है किन्तु उसका एक रहस्यमय
या गुप्त स्वरूप भी है और वह है—विद्या पञ्चदशाक्षरी के रूप में स्थित है ।
श्रीविद्या का प्रत्येक अक्षर किसी न किसी एक स्वतंत्र शक्ति से अधिष्ठित है और
प्रत्येक अक्षर का स्वतन्त्र अर्थ है । भास्करराय यह भी स्थापित करते हैं कि
श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ऐसी विद्या है जो कि ‘तत्वमसि’ का साक्षात्कार कराती है एवं
जीवात्मा तथा परमात्मा में स्थित औपनिषदिक सत्य की परमानुभूति का द्वार
उद्घाटित करती है ।
आचार्य भास्कर साधक-समाज की बाह्योपासना एवं उसकी निष्फलता या
स्वल्प निष्पत्ति से चिरपरिचित थे इसीलिए उन्होंने मन्त्र एवं मन्त्र के देवता के
अन्तर्संबंध का अनुसंधान किया और यह स्थापित किया कि वाच्य एवं चावक में
अभेद है । चूँकि वाचक मन्त्र है और वाच्य देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में भी
अभेद है—‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते
वाच्य एव प्रसीदति ।।' (यामल) इसीलिए उन्होंने ‘प्रकाश’ एवं ‘वरिवस्यारहस्यम्’ के
दोनों अंशों में वरिवस्या के समस्त अङ्गों, तत्त्वों एवं उपादानों में तथा मन्त्र-मांत्रिक,
गुरु, देवता, यन्त्र, पूजाङ्ग, ग्रह, नक्षत्र, राशि, कूटत्रय, भाव, आचार, स्वात्मा,
भगवान एवं विश्व सभी में एकात्मता, तद्रूपता एकान्विति एवं अभेद की स्थापना
की है । यही वरिवस्या का रहस्य भी है भास्कराचार्य ने श्रीविद्या पर यह प्रथम
ग्रन्थ लिखा । उन्होंने इस पर ‘प्रकाश’ नामक टीका भी लिखी । ‘सेतुबंध’ नामक
जो अन्य मन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थ लिखा गया वह भास्कर की परवर्ती रचना है ।
‘सौभाग्यभास्कर’, ‘सेतुबंध’, ‘वरिवस्यारहस्यम्’ आदि अधिकांश रचनाएँ श्रीविद्या एवं
शाक्त दर्शन से ही सम्बंधित हैं ।
आचार्य भासुरानन्दनाथ (भास्करराय) ने अपने ग्रन्थ का ‘वरिवस्यारहस्यम्’
नामकरण करके यह द्योतित करने का प्रयास किया है कि वरिवस्या-विधान में
कतिपय रहस्य तत्त्व हैं जिन्हें सामान्य जन तो नहीं जानते किन्तु वे रहस्य तत्त्व ही
वरिवस्या के प्राण हैं अतः ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ में अन्य तत्त्वों को छोड़कर रहस्य
तत्त्व पर प्रकाश डालने की ही आङ्काक्षा व्यक्त की है । ‘वरिवस्या’ का अर्थ है
पूजा, उपासना या सपर्या—
‘‘पूजा नमस्यापचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः ।
वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासना ।।’’ (अमरकोष)
३ वरि. भू.