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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 530 में से

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पृष्ठ 43

भूमिका ३५
| मन्त्र के वर्णों की | ३ | १ | १ | ३ | ३ | २ | २ = संख्या = १५ |
| पुनरुक्ति संख्या | | | | | | | |
| वर्ण | क | ए | ई | ल | ह्रीं | ह | स = मन्त्राक्षर = ७ |
| | | | | | | = मूलाक्षर |
परदेवता—वामादिक सप्तशक्तियों की समष्टि ॥
परदेवता—षट्त्रिंशत् तत्त्व ॥²
‘अहं’ = ‘अ’ = शिव । ‘ह’ = शक्ति । = ‘ई’ कामकला । वर्ण—गुण ।
कामकलात्रय—एवं ईकार—स्पर्श चतुष्टय । ३ लकार = लोकत्रय । मन्त्रगत—तीन
ककार = ‘सकल’, ‘प्रलयाकल’, विज्ञानाकल । पञ्चदशीमन्त्रगत हृल्लेखात्रय को
छोड़कर अवशिष्ट अक्षरों में स्थित अकार (क, ल; ह स क ह ल; स, क, ल में
स्थित दस अकार) = जीव । ग्यारहवाँ स्वर “एकार” = जीव का वाचक एवं
विद्या का प्राण । बिन्दुत्रय = रुद्र, ईश्वर एवं सदाशिव । नादत्रय = शान्ति, शक्ति,
शंभु । महाविद्या के सैंतिस पद = ३६ तत्त्व एवं सैंतिसहवाँ तत्त्वातीत सैंतिसहवाँ
तत्त्व । जन्य-जनक में अभेद = (वाच्य-वाचक में अभेद) = ब्रह्म एवं जगत् तथा
जगत् एवं विद्या में अभेद । परमशिव = जागतिक पदार्थ । दीक्षा गुरु एवं
परमशिव में अभेद । (श्लोक क्र० २।८२) भगवती पराम्बा = (इच्छा, ज्ञान, क्रिया

  • सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण+अग्नि-सोम-सूर्य इन नौ के संयोग से) त्रिनेत्री पराम्बा
    ग्रहरूपा भी है । (२।८४)
    ७. पराम्बा के साथ तादात्म्य—
    पराम्बा का अन्य तत्त्वों के साथ तादात्म्य—जगन्माता त्रिपुरा जगद्रूपिणी,
    तत्त्वरूपिणी, चक्ररूपिणी, शक्तिरूपिणी, वर्णरूपिणी, यन्त्ररूपिणी, मन्त्ररूपिणी, गुरु-
    रूपिणी तो हैं ही किन्तु वे साथ ही साथ ग्रहरूपिणी एवं नक्षत्ररूपिणी भी है । दस
    इन्द्रियों, चार अन्तःकरणों, दस इन्द्रिय-विषयों, प्रकृति, पुरुष एवं गुणतत्त्वों के योग
    से सत्ताईस अङ्गों से युक्त होने के कारण भगवती भी सत्ताईस नक्षत्रों के साथ
    तादात्म्य रखती है । भगवती का योगिनियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८६)
    भगवती का राशियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८७) क्योंकि नाग, कूर्म
    आदि पाँच प्राण, प्राणापानादि पाँच, जीवात्मा एवं परमात्मा दो के द्वादशाङ्गों से
    समन्वित होने के कारण जगदम्बा राशिस्वरूपा हैं । (२।८७) श्रीविद्या गणेशरूपिणी
    भी हैं । (२।८८) यह ‘श्रीविद्या’ बिन्दुत्रय, नादत्रय एवं कूटत्रय के शेषांशों द्वारा
    घटित होने के कारण ग्रहरूपिणी भी है एवं व्यञ्जनों द्वारा सत्ताईस अक्षरों वाली होने
    के कारण श्रीविद्या नक्षत्ररूपिणी भी है (२।८९) तीन ह्रीं हृल्लेखाओं (ह्री त्रय) एवं
    उससे भिन्न तीन कूटों के योग से श्रीविद्या योगिनीरूपा भी हैं । तीनों (ह वर्णों)
    २. वरिवस्यारहस्यम्