वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३९
संसार के समस्त प्राणियों का जन्म ब्रह्मा से होता है। सभी का पालन विष्णु
द्वारा एवं संहार रुद्र द्वारा होता है किन्तु ये तीनों भी वर्ण से ही उत्पन्न होते हैं ।¹
मन्त्र की परिभाषा
१. मन्त्र और मन्त्र का स्वरूप—
‘मन्त्र’ मननत्राणस्वरूप होते हैं। तन्त्रशास्त्र में मन्त्र को ‘मनु’ भी कहा जाता
है। ‘मृत्युञ्जयभट्टारक’ में कहा गया है कि चूँकि मन्त्र का ‘म’ शब्द—संसार से
उन्मोचन, शिव से योजन, एवं ‘त्र’ शब्द—मनन करने से त्राण करने का विधायक
है अतः इसे ‘मन्त्र’ कहा गया है—
“मोचयन्ति च संसाराद्योजयन्ति परे शिवे। मननत्राणधर्मित्वात्तेन मन्त्रा इति
स्मृताः ।। (२१।१) ‘मन्त्र’ को मन्त्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यह पूर्णाहन्ता का
अनुसंधान करता है, मनन धर्मा है, त्राण-कर्ता है—‘पूर्णाहन्तानुसंध्यात्मा स्फूर्जन्मनन
धर्मतः। संसारक्षयकृत्त्राणा धर्मतो मन्त्र उच्यते ।।²
२. मन्त्र का स्वरूप—
मन्त्र की सामान्य परिभाषा यह है कि जो मनन करने से साधकों का त्राण
करे वही ‘मन्त्र’ है—
‘मननात् त्राणधर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ।।' (सङ्केत पद्धति)
‘मन्त्र’ परमात्मा का शब्द-विग्रह है। मन्त्र परमात्मा का शब्दावतार है। मन्त्र
का मूलाधिष्ठान ‘नाद’ है अर्थात् मन्त्र का मूल तत्त्व—‘नाद’ है अतः तत्त्वतः
‘मन्त्र’ नादमय हैं। चूँकि ‘नाद’ बिन्दु के रूप में परिणत होता है अतः सारे
मन्त्र—‘बिन्दुरूप’ भी हैं। सृष्टि-विधान देखिए—‘आसीच्छक्तिःस्ततोनादः नादाद् बिन्दु
समुद्भवः ।।'³
सारांश—
(१) मन्त्र नादमय है, मन्त्र बिन्दुमय .है ।
(२) परब्रह्म का सगुणरूप ‘शब्दब्रह्म’ है अतः शब्दब्रह्मजन्यमन्त्र भी ब्रह्ममय है
(३) ‘मन्त्र’ चित् शक्ति की अभिव्यक्ति है—‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः’—अतः मन्त्र
अपने तात्विक स्वरूप में चिन्मय एवं शक्तिमय है।
(४) ‘यंत्र’ मन्त्रावयवों से सङ्घटित हैं अतः मन्त्र यंत्रस्वरूप भी है।
(५) ‘चक्र’ मन्त्रोपेत, मन्त्र-घटित एवं मन्त्र की शक्ति से संवलित हैं अतः
मन्त्र चक्रस्वरूप भी हैं।
१. कामधेनु तन्त्र २. सौभाग्यभास्कर
३. शारदातिलक