वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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हल्लेखाओं एवं 'ल' के योग से घटित होने के कारण श्रीविद्या राशिरूपिणी है
(२।९०)। विद्या एवं देवी में सारूप्य होने के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है ।
अतः श्रीविद्या गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशि सभी के साथ तादात्म्य रखती
है—देव्या रूपान्तरत्वेन विद्यायास्तदभेदतः । गणेशग्रहनक्षत्र योगिनीराशिपीठता ॥
(२।९१) विद्या एवं देवी के सारूप्य के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है । अतः
उसका गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशिरूप का समीचीन है । रेखाओं, 'दलों
एवं कोणों के गणों द्वारा घटित होने के कारण इसका गणेशत्व एवं त्रैलोक्यमोहन
आदि नवचक्रों द्वारा निर्मित होने से इसका ग्रहत्व स्पष्ट है । वृत्तत्रय, तीन
भूगृहरेखाओं एवं चौदह कोणों एवं सात अन्य चक्रों की पृथक्-पृथक् गणना द्वारा
इसका नक्षत्र रूप स्पष्ट है ।
श्रीचक्र के साथ तादात्म्य—
पालन एवं संहार नामक चक्रद्वय, पद्मद्वय एवं अन्य वृत्तद्वय एवं भूगृह आदि
के योग से—श्रीचक्र योगिनीरूप है । पाँच शक्ति, चार अग्नि, एक बिन्दु, एक वृत्त
एवं एक भूगृह आदि बारह के योग से श्रीचक्र राशिरूप है । विद्या के अक्षरों द्वारा
निर्मित होने के कारण चक्र इनसे अभिन्न हैं ।
मातृका वर्णों की संख्या = ५१ पीठ ॥ ओडयाण, जालंधर, पूर्णगिरि,
कामरूपपीठ, गणप, ग्रह, भ आदि एक, नौ, सत्ताईस, छः, बारह से घटित
पचपन पीठ हैं ।
८. अपने गुरु, देवता, विद्या एवं चक्र में तादात्म्यभाव—
देवी, विद्या चक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—इन पाँचों में भी तादात्म्यभाव है ।
९. कुण्डलिनी के साथ तादात्म्य—
कुण्डलिनी का श्रीविद्या एवं देवी के साथ तादात्म्य है । श्रीविद्या का अपने
घटक अक्षरों के साथ तादात्म्य है । कल्याणी, एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि
देवी के तीन सौ नाम मन्त्र के आद्यक्षरों का प्रतीक है । नाम का एकांश समस्त
नाम का प्रतीक है । वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूटों के साथ (देवी के)
किरीट से कण्ठ, कण्ठ से कटि एवं कटि से पादाग्र में तादात्म्य है । प्रथमकूट के
छः वर्गों एवं तीन मिथुनों (ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी एवं रुद्र-पार्वती) का तादात्म्य
है । देवताष्टक ईकार के प्रतीक है । अक्षरों के साथ वामा, इच्छा आदि शक्तियों
का तादात्म्य है । ब्रह्म ही शिव-शक्ति दोनों का प्रतीक है क्योंकि शिवशक्ति अभिन्न
हैं । 'वाग्भवकूट' सूक्ष्म की विराट व्याप्ति एवं 'कामराजकूट' शौर्य, धन, स्त्री एवं
कीर्ति के प्रतीक हैं । प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कूट के प्रतीक ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं
सामवेद हैं । 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक हैं । 'ह स क'—हँसते हुए मुख का, 'ह
स'—आनन्द का, 'क'—सूर्य का, 'ह'—चन्द्रमा का, क एव ह—सूर्य-चन्द्रमा का,
'ल'—नेत्र का, क ह ल—सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्रवालों का, एवं 'क'—ब्रह्म का प्रतीक
है ।