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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 530 में से

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३२ वरिवस्यारहस्ये
'नमोवरिवस' (३।१।१९) से क्यच् प्रत्यय जोड़ने पर 'वरिवस्या' शब्द निर्मित
होता है । 'वरिवस' शब्द पूजार्थक है । आचार्य भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' में
जिस रहस्य का उद्घाटन किया है उसका मूल केन्द्रीय स्वर अद्वैत-स्थापना है ।
यह ठीक भी है क्योंकि 'मन्त्रार्थ देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन
अभेदो मन्त्रदेवयोः ।' (शाक्तानन्द तरंगिणी) ॥ आचार्य भास्कर ने 'वरिवस्यारहस्यम्'
में विभिन्न प्रकार के ऐक्यों, अभेदों, ऐकात्म्यों एवं अभिन्नताओं का तर्कानुप्राणित
प्रतिपादन किया है जो निम्न हैं ।
शाक्ता द्वैतवाद का प्रायोगिक पक्ष—
१. मूलाधारादिक चक्रों एवं श्रीचक्र में एकात्मकता
सुषुम्ना के मूल में सस्थित अरुण सहस्रदल कमल में = त्रिपुराधिष्ठित
त्रैलोक्यमोहन चक्र, वह्नि के आधार चतुर्दल कमल में = त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरण चक्र, शाक्त स्वाधिष्ठानस्थित षडदल कमल में = त्रिपुरसुन्दर्य-
धिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र, नाभि में स्थित दशदल कमल में = त्रिपुरवासिनी से
अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र, अनाहत के द्वादशदल कमल में = त्रिपुरा-
श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र, विशुद्धचक्र के षोडशदलकमल में = त्रिपुरमालिनी
से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र, तालुमूल में स्थित लम्बिकाग्र के अष्टदल कमल में
= त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र, भ्रूमध्य में स्थित द्विदलकमल में =
त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रदचक्र, ललाट में स्थित इन्दु में—बिन्दु में—
महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिए ॥१
'योगिनीहृदय' में इसे इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है—
अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् ।
चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥२
२. चक्र एवं देवी में एकात्मता—
योगिनीहृदय में इस एकात्मता को इस प्रकार पुष्ट किया गया है—
'यदा सा परमाशक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ।
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥३
अर्थात् जब भगवती स्वेच्छावश स्वनिष्ठा स्फुरत्ता को देखती हैं तभी विश्वाभिन्न
त्रिकोणादिचक्रों की उत्पत्ति हो जाती है । ('सा देवी स्वेच्छया स्वनिष्ठां स्फुरत्तां यदा
पश्यति तदा चक्रस्य विश्वाभिन्नस्य त्रिकोणादिचक्रस्य संभव उत्पत्तिर्भवतीत्यर्थः ॥'४
३. पीठ एवं पञ्चभूतों में एकात्मता—
'पीठ'—क्रमशः सिति-पवन-जल-अग्नि मण्डल रूप है—
१-२. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' (मन्त्रसंकेत : श्लोक ८, ९)
३. योगिनीहृदय (चक्रसंकेत श्लो० ९) ४. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'