वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 41, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३३
१. भूतत्त्व, चतुरस्र, पीतवर्ण = 'कामरूपपीठ' ।
२. वायुतत्त्व, षड्बिन्दुलांछित, वर्तुल, धूम्रवर्ण = 'पूर्णगिरिपीठ' ।
३. जलतत्त्व, अर्धचन्द्राकार, श्वेत = 'जालन्धरपीठ' ।
४. अग्नितत्त्व, त्रिकोण, रक्त, = 'उड्डीयनपीठ' ।¹
“पीठाः कन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः । चतुरस्रं तथा बिन्दु
षट्कंयुक्तं च वृत्तकम् । अर्धचन्द्रं त्रिकोणं च रूपाण्येषां क्रमेण तु । पीतो धूम्रस्तथा
श्वेतो रक्तो रूपं च कीर्तितम् ।।'² चतुरस्रं कामरूपपीठः । षड्बिन्दुयुक्तवृत्तरूपः
पूर्णगिरिपीठः । जालंधरपीठः अप्तत्त्वमयः । त्रिकोणम् तेजस्तत्वमयः ओड्याणपीठः ।
४. चिदात्माशक्ति एवं विश्व में एकात्मता—
अमृतानन्द योगी ने ठीक ही कहा है—“विश्वाकार प्रथा षटत्रिंशत्तत्वात्मना
परिणता विमर्शशक्तिः”, ‘विश्वाकार प्रथाधार निजरूपशिवाश्रयम् ।'³ चिद्विमर्शशक्ति
आत्मभित्ति में जब आत्मप्रकाशन करती है तो वही प्रकाशन विश्व बन जाता है—
'चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाशामर्शने यदा । करोति स्वेच्छया पूर्णविचिकीर्षा-
समन्विता ।।'⁴
५. प्रकाश एवं विमर्श में एकात्मता—
प्रकाश (परमशिव) अपने को विमर्शांश द्वारा विभक्त कर लेता है और
पश्यन्ती आदि वाणीचतुष्टय क्रम से प्रश्न भी करता है—वही प्रकाश है वही विमर्श
है—“भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य पश्यन्त्यादि क्रमात्
पृच्छति ।।”⁵
६. गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में एकात्मता—
(क) गायत्रीमन्त्र—'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्'
(ख) पञ्चदशीमन्त्र—क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ॥
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी का 'वाग्भवकूट'—
(१) गायत्रीमन्त्र का 'तत्' = पञ्चदशीमन्त्र का 'क' = 'तत' = ब्रह्म ॥ ‘क'
= कामेश्वर भगवान् शिव (ब्रह्म, परमात्मा) ॥
(२) गायत्रीमन्त्र का = 'सवितुर्वरेण्यं' = प्रसवित्री, जगन्माता ॥ पञ्चदशीमन्त्र
का 'ए' = देवी कामेश्वरी । (सरस्वती देवी)
(३) गायत्रीमन्त्र का = 'भर्गो देवस्य धी' । पञ्चदशी मन्त्र का ‘ई' =
सर्वान्तर्यामी, सर्वपोषक ।
१. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध' २. योगिनीहृदय
३. दीपिका ४. योगिनीहृदय
५. अमृतानन्द—'योगिनी-दीपिका'