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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

२५६ वरिवस्यारहस्ये
एवं 'हकार' से युक्त शिवशक्ति सामरस्य वाला परब्रह्म है। 'अहं' रूप परप्रमाता के
परामर्श का ही यह उदय है। उसी की महत्ता से वाच्य वाचक रूप सृष्टि का
अवभास होता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—
'अक्षर ही परब्रह्म है। उसका 'स्व' भाव ही अध्यात्म है ॥'१
यल्लोहित तदग्निर्यद्वीर्यं सूर्यैन्दुविग्रहम् ।
अ इति ब्रह्म परमं तत्संघट्टोदयात्मकम् ॥ २२७ ॥२
'अकार' एवं 'हकार' एकत्र अवस्थित हैं। इसमें विभाजन नहीं होता। जैसे
वायु एवं आकाश' यह 'अ' रूप शिव (पर प्रमाता) ५० वर्णों में भी व्याप्त है।
यह अनुत्तरकर्ता है।
“अकारश्च हकारश्च द्वावेतावेकतः स्थितौ ।
विभक्ति र्नयोरस्ति मारुताम्बरयोरिव ॥”३
यह अनुत्तर परमेश्वर का ही शाक्त विसर्ग है जो कि 'हकार' पर्यन्त स्थूल रूप
से प्रस्फुरित है। वहाँ से इसके प्रत्यावर्तन की स्थिति में शिव, बिन्दु

द्वितीयोंऽशः २५७
'ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः ।। (ई०प्रत्य०) 'ईश्वर' = बहिरुन्मेष ।
'सदाशिव' = अन्तः निमेष ।
३. 'शुद्धविद्या या सद्विद्या तत्त्व' में- 'अहम्' एवं 'इदम्' इन दोनों रूपों में
ऐक्य की प्रतीति रहती है । 'मै = यह हूँ'' यही भावना शुद्धविद्या में जागृत रहती
है । इसमें क्रियाशक्ति को प्राधान्य है ।
४. 'मायातत्त्व' — इस भूमि पूर्वभूमि की ऐक्य प्रतीति पृथक्-पृथक् हो जाती
है । 'अहं' अहं पुरुष रूप में एवं 'इदम्' अंश प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हो
जाता है । यहाँ 'अचित' में प्रमातृत्व का आभास होने लगता है । इस भूमि में
परमेश्वर माया शक्ति द्वारा अपने रूप को आच्छादित कर लेते हैं और पुरुष तत्त्व
के रूप में पृथक हो जाते हैं । परमशिव सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, पूर्ण, नित्य, व्यापक
एवं असंकुचित शक्ति वाला होकर भी स्वेच्छावश 'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' एवं
'नियति' रूप ५ कञ्चुकों से आवेष्टित होकर अभिव्यक्त होता है इन्हीं पाँचों से
आच्छादित होकर यह चैतन्य 'पुरुषतत्त्व' बन जाता है ।
शङ्कराचार्य के कथनानुसार "अहं (अस्मत् प्रत्यय) प्रत्यक् चैतन्य है ।।"
"अहं" = अ = शिव ।। "ह" = शक्ति ।।
'अहं' = अ से लेकर क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग एवं य, व,
र, ल, श, ष, स, ह—पर्यन्त अर्थात् अशब्दादि एवं हकारान्त सम्पूर्ण वर्णमाला
एवं उसके समस्त वर्ण 'अहं' के वाच्य हैं । पाणिनि सूत्र 'आदिरन्त्येन सहेता ।।
२।२।७२' भी आदि (अ) अन्त्य (ह) की अभेदात्मकता एवं सर्वव्यापकता की ओर
इंगित करता है ।
१. क म वर्ग की उत्पत्ति— 'अकार' से ही होती है । हकार एवं विसर्ग भी
अ से ही उत्पन्न होते हैं— 'कवर्गस्य च अकाराज्जन्म द्योतयितुं उक्तम् 'अकुह
विसर्जनीयानां कण्ठः'' इत्यादीनीत्या क वर्ग—हकार—विसर्जनीयानामकाराद-
वोत्पत्तिः ।।'१ हकारात्मिका इस कला से ही सारे वर्ण समुदाय का आविर्भाव होता
हैं— 'हकारात्मा वैसर्गिकी कला जाता, निखिलमेव वर्णजातमुदिम्'२
समस्त प्रपञ्च को प्रत्याहत करके पर प्रमाता एवं मन्त्र वीर्यात्मा अहं परामर्श
सर्वत्र उल्लसित है कहा भी गया है— प्रकाश की आत्मविश्रान्ति ही 'अहं' भाव
है— 'प्रत्याहताशेषविश्वः प्रमात्रैकरूपः परमन्त्रवीर्यात्मा अयमहंपरामर्शः-
'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहंभावो हि कीर्तितः ।। (अजड प०) गुरु कौन है?
'अहंपरामर्श रहस्यविज्ञः गुरुः ।। आदिम अनुत्तर वर्ण (अ) एवं अन्त्य वर्ण 'ह'—
दोनों अहं परामर्शात्मक हैं । इन दोनों से रहित एवं इनकी रहस्यात्मकता के न
होने पर कोई भी मन्त्र साधक के लिए व्यर्थ हो जाता है यथा शरद का बादल
'आदिमान्त्यविहीन नास्तु मन्त्राः स्युः शरदभ्रवत् ।।'३ ऐसे मन्त्र जो अहं परामर्श
१-३. तन्त्रालोक—'विवेक'
१७ वरि.

२५८ वरिवस्यारहस्ये
रहित हैं या मूल कारण ज्ञान शून्य हैं साधक के लिए सिद्धिप्रद नहीं होते । 'आदि
मान्त्यविहीनानि मन्त्राणि च तथैव च । निष्कलानि भवन्त्येवं पिवतो मृगतृष्णिकाम् ॥
कोई पुरुष सन्तानेच्छावश अपनी उत्पादन शक्ति (अपने शरीर के अर्धभाग
रूपा भार्या) में स्वयं अपने बिन्दु (शुक्र) के द्वारा प्रवेश कर जाता है—('शुक्ल
बिन्दु' के माध्यम से प्रवृष्टि हो जाता है)१—'शुक्लबिन्दु' एवं पुरुष में तत्त्वतः कोई
भेद नहीं रहता अतः पति ही पत्नी द्वारा पुत्र बनकर जन्म लेता है उसके बाद उस
शुक्लबिन्दु के भीतर भार्या का 'शोणितबिन्दु' भी प्रविष्ट हो जाता है । इससे दोनों
मिलकर बिन्दु फूल उठता है । यह 'वटोदुम्बरादिबीजस्थानीय' होता है । उसके बाद
बीज से निकलने वाले अंकुर की भाँति कालान्तर में सन्तानोत्पत्ति हो जाती है ।
यह उसी प्रकार है यथा सूर्याभिमुख दर्पण के भीतर प्रविष्ट किरणों से एवं
बाह्यकिरणों के सङ्कलन से कुड्य आदि में तेजो बिन्दु उत्पन्न हो उठता

द्वितीयोंऽश: २५९
मात्रावशेषं ब्रह्मैव भासत ॥'१
२. श्रुतियों में भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया है—'यथा प्रियया
संपरिष्वक्तोन बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्'२
३. यो ब्रह्मरन्ध्रस्थितो बिन्दुः स निःशेषेण न कामालयं प्रविशति किन्त्वंशेन ।
बिन्दुः तुरीय बिन्दुः ।। तदंशो मन्दिरस्थितस्तु कामाख्यो बिन्दुः कामेश्वरः ।।३
४. कामबिन्दोः शोणबिन्दुना सहपरस्परानुपविष्टत्वे बिन्दुद्वयं विसर्गो हकारो
विमर्शः ।। हकार रूपा शक्तिरेव च कला "हकारोऽन्यः कलारूपः ।। सेयं
'कामकला' भवति ।।४
५. मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो ।
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि. ते मन्मथकलाम् ।।
मुख बिन्दुः कामबिन्दुः ।। कुचयुगं = विमर्शबिन्दु द्वयम् ।। हकारः विमर्शः ।।५
६. पति का पत्नी के साथ संभोग करने से उसका जो शुक्ल बिन्दु पत्नी के
अन्दर प्रवेश करता है पति उसके माध्यम से स्वयं पत्नी के गर्भ में प्रवेश करता
है। 'आत्मा वै पुत्रनामासि' ।। (श्रुति)
७. 'शुक्लबिन्दु' में भार्या का शोणित बिन्दु प्रवेश करता है अतः—
'शुक्लस्यान्तः शोणितबिन्दुरूपेण भार्या प्रविशति' 'यथा हि कश्चित पुरुषः ........
स्त्रीयामुत्पादनशक्तिमालोक्य स्वार्धशरीरात्मकायां भार्यायां स्वयमन्तः प्रविशति
शुक्लरूपेण ।।'
सारांश—१. पुरुष का अपने श्वेत वीर्य द्वारा पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होना ।
२. पत्नी का, अपने गर्भ में पतित पति के शुक्लबिन्दु में अपने लाल रङ्ग
के रज के प्रवेश द्वारा—मानो स्वयं प्रवेश कर जाना ।। 'बिन्दुं रक्तरूपा शक्तिः
प्रविशति ।। तेन संभिन्नो बिन्दुरुच्छूनो भवति ।।
'कामकलाविलास' में कहा गया है—
'सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्तशिवशक्तिसंकुचत्प्रसरम् ।
वागर्थसृष्टि हेतुः परस्परानुपविष्टः विस्पष्टम् ।।
बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः ।
कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू ।।६
नटनानन्दनाथ कहते हैं—'शब्दोत्पादकोऽनुत्त राक्षराभिधेयः परमेश्वरः स्वात्म-
भूताखिलप्रपञ्च निलयात्मक विमर्शशक्तिमनुप्रविश्य बिन्दुभाव मयते ।। ततः सा विमर्श
शक्तिरपि स्वान्तर्गत प्रकाशमय बिन्दु मनुप्रविशति ।। ततश्च बिन्दुरुच्छूनो भवति ।७
१-५. सेतुबन्ध ६. कामकलाविलास
७. चिद्वल्ली—नटनानन्दनाथ

२६० वरिवस्यारहस्ये
स्फुरत्तात्मक लहरी से युक्त, पारमार्थिक प्रकाश रूप उस अहमात्मक बिन्दु से,
इच्छा, ज्ञान एवं क्रियास्वरूप मातृत्रयात्मक अनन्त सृष्टि उद्भूत हुई है । यथा
सूर्याभिमुख दर्पण में अन्तःप्रविष्ट किरणों द्वारा दोनों ओर से प्राप्त किरणों के
सम्मेलन से, भित्ति परतेजोबिन्दुविशेष प्रादुर्भूत होता है उसी प्रकार प्राणियों के
अदृष्टवश अपने में उपसंहृत विश्व की रचना की इच्छा से प्रकाशरूप ब्रह्म, अपनी
शक्ति को देखने के लिए अभिमुख होकर उसके अन्तराल में तेजरूप से प्रविष्ट
होकर शुक्लबिन्दु का रूप ग्रहण करता है । फिर उस बिन्दु में रक्तरूपा शक्ति
प्रविष्ट होती है जिससे कि संमिश्रित बिन्दु यत्किंचित अभिवृद्धि करता है । वही
'हार्धकला' रूप पदार्थ विशेष के रूप में परिचित होता है । वह बिन्दु, समष्टि रूप
से एक एवं स्फुट शिवशक्तिसामरस्य नामक अग्नीषोमात्मक 'काम' 'रवि' आदि कहा
जाता है । व्यष्टि रूप में वे दो रहते हैं । 'शुक्लबिन्दु' चन्द्रमा एवं रक्त बिन्दु
अग्नि है । इस बिन्दुद्वय को विसर्ग भी कहते हैं । सूर्य रात्रि को अग्नि में तथा
अमावस्या को चन्द्र में प्रवेश करता है । समष्टि बिन्दु की इसीलिए 'रवि' आख्या
है ।
१. 'काम' नामक बिन्दु २. 'विसर्ग' ३. 'हार्धकला'—इन तीन अवयवों से
युक्त एक अखण्ड पदार्थ अण् आदि प्रत्याहार के सदृश 'कामकला' कहा जाता है।
यही सम्पूर्ण सृष्टि का बीज है । 'कामकला' तुरीय (चतुर्थ) बिन्दु मूलभूत ब्रह्म है ।
चतुर्थ बिन्दुरूप एवं शून्यस्वरूप अकार एवं हकार से उत्पन्न 'कामकला' अहं कही
जाती है । 'अहं' पद का अर्थ है—अकार हकारोभयात्मकता एवं शिवशक्तिद्वय-
रूपता। 'अहं' = अखिल सृष्टि का वाचक है । विश्वात्मारूप प्रकाश ही 'अहं' है ।
'कामकला' में पहले तुरीय बिन्दु, उसके नीचे 'काम' नामक 'बिन्दु' उसके
नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय एवं उसके नीचे 'हार्धकला' स्थित है । तुरीय एवं विसर्ग
के मध्य चैतन्यरूप से अकार एवं हकार स्थित हैं । ये 'अ' एवं 'ह' वैखरी रूप
से नहीं प्रत्युत् पर एवं परा मातृकारूप शून्याकार सदृश स्थित हैं । ये अ + ह
कुटिलात्मक हैं । सृष्टि की माता वक्रा वामा शक्ति कुटिला है । काम + विसर्ग या
अकार + हकार कुण्डलिनी के प्रतिबिम्ब हैं । अकार + हकार कुण्डलिनी से
अभिन्न हैं । पर ब्रह्म के दो रूप हैं—१. अर्थ २. शब्द अ + ह = शिवशक्ति;
अकुल + कुण्डलिनी ॥
अहन्तामय त्रिबिन्दु तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा 'कामकला' त्रिगुणात्मक त्रिकोणरूप में
परिणत हो जाती हैं और जगन्माता बनती हैं । १. शुक्ल २. रक्त ३. मिश्र बिन्दु
(बिन्दुत्रय) सिंघाड़े के आकार का त्रिकोण है ।
बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्म शृङ्गारं विद्धि सुन्दरम् ।
मिश्रं शुक्लं च रक्तं च पुराणं प्रणवात्मकम् ॥१
'विसर्ग'—विसर्ग शब्द अनेकार्थक है । योग के अनुसार 'महानाद' के ऊपर
१. कामकलाविलास

द्वितीयोऽंशः २६१
शंखिनी नाड़ी के शिखर प्रदेश में 'विसर्ग' नामक शक्ति है—उसी के नीचे
सहस्रदल कमल है—
'तदूर्ध्वं शंखिन्या निवसति शिखरे शून्यदेशे प्रकाशं ।
विसर्गाधः पद्मं दशशतदलं पूर्णचन्द्रातिशुभ्रम् ॥'
शंखिनी नाड़ी का शिखर प्रदेश ही 'शून्यस्थान' है । यही स्थान सुषुम्णा का
भी ऊर्ध्व देश है । इसी शून्य प्रदेश में सहस्रार भी स्थित है । इस शून्य प्रदेश के
ऊपर 'विसर्ग' नामक शक्ति का अवस्थान है । सहस्रदलकमल विसर्ग के नीचे है ।¹
इस श्लोक में कहा गया है कि हकार चैतन्य से समन्वित बिन्दुओं का मिथुन
'विसर्ग' कहा जाता है । इन सभी की मिश्रित समष्टि 'रवि' है । इसी 'रवि' को
'काम' भी कहते हैं । 'अकार' चैतन्ययुक्त है । 'अकार' एवं 'हकार' शिव-शक्ति
है । हः शिवो गगनं प्राणः ॥ (मातृकाकोश) 'ह'—ह—व्योम । 'हकाराद् व्योम
सम्भूतम् ॥
अकार एवं हकार का स्वरूप—'अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः
प्रकीर्तितः । अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्नहमि स्फुटम् ॥ गीता में भी कहा गया
है—'अक्षराणामकारोऽस्मि ।।²
'अहं' का अर्थ—१. 'मैं' = अस्मत् प्रत्यय । जीव, शिव ॥ २. 'अ' से
'ह' पर्यन्त समस्त वर्ण माला ॥ ३. 'अ' माने शिव 'ह' माने शक्ति = अर्थात्
शिवशक्त्यात्मक निःशेष सत्ता ॥ ४. 'अकारहकारोभयात्मकत्वं शिव शक्तिद्वयरूपत्वं
चाहं पदस्य निष्कृष्टो अर्थः ॥' 'अहं' का वाच्य क्या है? 'तज्जन्यानां सूक्ष्मादि-
स्थूलान्तानामखिल सृष्टीनामहं पदवाच्यत्वम् ॥³ अर्थात् अहं पद से उत्पन्न समस्त
स्थूल-सूक्ष्म सृष्टि 'अहं' का वाच्य है । 'आदिमो अकारः अन्त्यो हकारः तयोः
समाहारः अहम् ॥ अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतो
ऽहमुत्तरतोऽहमेवं सर्वम् ॥'⁴
अकारहकारस्वभावा ही कामकला भी है—'एवमकार हकारैकस्वरूपा
कामकला ।।'⁵
चन्द्ररूप 'शुक्लबिन्दु' एवं अग्निरूप 'रक्तबिन्दु'—अर्थात् बिन्दुद्वय—को
'विसर्ग' भी कहते हैं । १. कामबिन्दु २. विसर्ग ३. हार्धकला—से युक्त अखण्ड
पदार्थ 'कामकला' कहलाता है । अकार एवं हकार से उत्पन्न 'कामकला' अहंपद
का वाच्य है ।
योगशास्त्र में कहा गया है कि शंखिनी नाड़ी के शिखर प्रदेश अर्थात्
'शून्यस्थान' (सुषुम्णा का ऊर्ध्व देश) में स्थित सहस्रार के ऊर्ध्व देश में 'विसर्ग'

१. षट्चक्रनिरूपण २-३. भास्करराय—'प्रकाश'
४. छान्दोग्य० ५. भास्करराय—'प्रकाश'

२६२ वरिवस्यारहस्ये
नामक शक्ति है । इसी 'विसर्ग' के नीचे १००० दलों वाला कमल है—
'विसर्गाधः पद्मं दशशतदलं पूर्णचन्द्रातिशुभ्रम्'१ ब्रह्मरंध्र का ऊर्ध्वदेश ही
'विसर्ग' है ।२
'अहं' एवं 'कामकला'—'अहं' 'सङ्केतपद्धति' में 'अहं' की व्याख्या इस
प्रकार की गई है—
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ।
हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तित ॥
अहं का स्वरूप—
'अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परम शिवः ॥
हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ।
अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्नहमि स्फुटम् ॥'
श्रीकृष्ण ने अपने को अक्षरों में अकार कहा है—'अक्षराणामकारोऽस्मि'
'कामकला'—भास्करराय कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्याभिमुख दर्पण में
उसके भीतर प्रविष्ट किरणों से दो किरणों के सङ्कलन रूप 'तेजोबिन्दु' विशेष
कुड्यादि में प्रादुर्भूत हो जाता है उसी प्रकार प्राणी अदृष्ट के कारण स्वान्तःसंहत
विश्व की सिसृक्षा द्वारा प्रकाशरूप ब्रह्म अपनी स्वयं की शक्ति को देखने के लिए
उसके अभिमुख होकर तदन्तस्तेज रूप में प्रवेश करके शुक्लबिन्दु भाव प्राप्त करता
है और उसके अनन्तर उस बिन्दु में रक्तरूपा शक्ति प्रवेश करती है । उससे
'संमिश्रबिन्दु' उच्छून (फूला हुआ) हो जाता है । वहाँ 'हार्दकला' के रूप में एक
पदार्थ विशेष उत्पन्न हो जाता है । वह गुरुमुखमात्रैक अवगन्तव्य है । वह बिन्दु
समष्टिरूप से एक है—स्फुट है और शिव शक्ति सामरस्य रूप 'काम'-'रवि'—
'अग्निषोमात्मक रवि' कहा जाता है । व्यष्टि रूप में वह दो है । एक रूप है
शुक्ल इन्दु । दूसरा है—रक्त बिन्दु या अग्नि । “बिन्दु” द्वयात्मक होने के कारण
'विसर्ग' कहा जाता है । समष्टि बिन्दु रवि है क्योंकि श्रुतियों में कहा गया है
कि—“रवे रात्रावग्नावमावास्यायां चन्द्रे च प्रवेशस्य” । इस प्रकार १. काम नामक
बिन्दु २. विसर्ग ३. हार्दकला—इन तीन अवयवों से 'कामकला' का आविर्भाव
होता है । यही है 'समस्त सृष्टि बीज' कहलाता है । ('कामकला' = 'समस्त सृष्टि
बीज') ॥ 'अकार हकारयोर्मध्ये सर्ववर्णपाठः' 'अहं'—अ से 'ह' तक की समस्त
वर्णमाला ॥ एतन्मूल ब्रह्म—'तुरीयबिन्दु' कहलाता है ।३
'कामकला' एवं 'अहं' में सम्बन्ध—'तद्रूपाभ्यां शून्य स्वरूपाभ्यामकार
१. षट्चक्रनिरूपण (पूर्णानन्दयति) २. सर्पेण्टपावर—सर जॉनवुडरफ
३. वरिवस्यारहस्यम्—'प्रकाश'

हकाराभ्यामुत्पन्ना 'कामकला' व्यक्ताव्यक्तविलक्षणा 'अहं' पद वाच्या । अकार हकारो-
भ्यात्मकत्वं शिव शक्तिद्वयरूपत्व चाहंपदस्य निष्कृष्टोऽर्थः । अतएव तज्जन्यानां
सूक्ष्मादिस्थूलान्तानामखिलसृष्टीनामहंपद वाच्यत्वम् ।। वेदों में कहा गया है—'ब्रह्म वा
इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवादहं ब्रह्मास्मीति' । 'बृहदारण्यकोपनिषद' में कहा गया
है—'त्वं वा अहमहं वै त्वम्' (ऐतरेयो०) 'कस्त्वमित्यहमिति होवाच त्वमेवेदं सर्वं
तस्मादहमिति सर्वाभिधानम् ।। (तापनीयोपनिषद) ।। 'तद्वा एतद्ब्रह्माद्वयम् ।।—इत्यादि
वाक्यों द्वारा ब्रह्मस्वरूप की व्याख्या करके उसकी उपासना पूर्णांहंभावभावनारूप है—
“हंसः सोऽहं” है । 'अहं' क्या है?
'आदिमोऽकारः, अन्त्यो हकारः, तयोः समाहारः 'अहम्' ।
'स्वपरावभासनक्षमे आत्माविश्वस्य यः प्रकाशोऽसौ ।
अहमिति स एक उक्तोऽहंतास्थितिरीदृशी तस्य ।।'
'कामकला' अकार हकारस्वभावा है—"एवमकारहकारैक स्वरूपा कामकला"
मध्यबिन्दु काम है—"मध्यबिन्दुः कामाख्यः ।” 'अकार' = शिव । 'हकार' =
शक्ति ।। 'मन्मथकला' का स्वरूप निम्नानुसार है—'मुखं बिन्दुं कृत्वा
कुचयुगमधस्तस्य तदधो । हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ।।' मुखबिन्दु ही
कामबिन्दु है ।
'कामकलाविलास' में 'कामकला' का स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया गया
है—सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्तशिवशक्ति संकुचत्प्रसरम् । वागर्थसृष्टि हेतुः परस्परानु-
प्रविष्ट विस्पष्टम् । बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः । कामः कमनीयतया
कला च दहेनेन्दुविग्रहौ बिन्दू । इति कामकला विद्या देवी चक्रात्मिका सेयम् ।
विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपा ।।' अमृतानन्दनाथ कहते हैं—
"बिन्दोः प्रस्पन्द संविदः बिन्दुरग्नीषोमात्मकः कामाख्यो रविः शिव
शक्तिसामरस्यवाच्यात्मा जातः ।।१ हकाररूपा शक्ति ही 'कला' है 'हकारोऽन्त्यः
कलारूपः ।।' (सङ्केतपद्धति) ।। 'सेयं कामकला भवति ।।" समष्टिरूपकामकला में
ईकार की शक्ति हैं । ईकार का नाम भी 'कामकला' है—'समष्टिरूप कामकलायामी-
कारस्य शक्तिः । ईकारस्य कामकलेत्यत एव नाम'
जिस बिन्दु से त्रिकोण उत्पन्न हुआ है वही 'कामकला' है—"यस्माद
बिन्दोस्त्रिकोणमुत्पन्नं स कामकला'२ 'अकार' सम्पूर्ण वाणियों का अग्रगामी एवं
प्रकाशात्मक 'परमशिव' है 'हकार' चरमवर्ण रूप विमर्श तत्त्व है । इन दोनों का
सामरस्य ही पराहन्ता है—
"अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ।।
हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ।
अनयोः सामरस्यं यत्पस्मिन्नहयि स्फुटम् ।।'३
१-२. योगिनीहृदयदीपिका—अमृतानन्दनाथ ३. वरिवस्यारहस्यम्—'प्रकाश'

२६४ वरिवस्यारहस्ये
'अहं' एक अद्वैत तत्त्व है और अ एवं ह का सामरस्य ही 'पराहन्ता' है ।
सर्वोच्च 'अहं' का यही स्वरूप है ।
'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरि ॥'१ पञ्चदशी के अवयवभूत मन्त्राक्षरों
का अर्थ ही भावार्थ है—
श्रीसौभाग्यविद्याऽवयवपञ्चदशाक्षराणामर्थो भावार्थः ॥२
भास्करराय इसकी व्याख्या करते हुए 'सेतुबंध' में कहते है—'यः
केवलस्तात्पर्यादिनाऽनवगतोऽक्षराणां वृत्यैव लभ्योऽक्षरार्थोऽक्षरस्वभावलभ्यत्वात् स
भावार्थः ॥'३
भास्करराय की दृष्टि में—१. भगवती एवं मन्त्र २. तथा भगवती एवं जगत्
में अभेद का प्रतिपादन ही 'भावार्थ' है ।
अथ संप्रदायार्थमाह—
व्योमादिजनकहकरसलाणैर्घटनेन पञ्चभूतमयी ।
पञ्चतुस्त्रिद्व्येकगशब्दादिगुणात्मपञ्चदशवर्णा ॥ ७४ ॥
(ह क र स ल—वर्ण तथा इनका पञ्चभूतों से सम्बंध एवं संप्रदायार्थ)
(यह विद्या) आकाशादिक पञ्चभूतों के स्रष्टा 'ह क र स ल' वर्णों से संसृष्ट
होने के कारण पञ्चभूतात्मिका है । इसके पंद्रह अक्षर पञ्चतत्त्वों के गुणों—शब्द,
स्पर्श, रूप, रस एवं गंध—के वाचक हैं जो कि (पञ्चतत्त्वों में क्रमशः) पाँच, चार,
तीन, दो एवं एक की संख्या में विद्यमान हैं ॥ ७४ ॥

  • प्रकाश *
    व्योमाकाशः । आदिना वाय्वग्निजलभूमिपरिग्रहः । एतत्पञ्चकस्य जनका ये
    हकरसलार्णा हकारादिवर्णास्तैर्घटनेनेयं विद्या पञ्चभूतमयी पञ्चभूताभिन्ना । उक्तं च—
    'हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः ।
    रेफादग्निः सकराच्च जलतत्त्वस्य संभवः ।
    लकारात् पृथिवी जाता तस्माद्विश्वमयी च सा ॥'
    इति । अत्र यद्यपि प्रकाशविमर्शसामरस्यात्मकवस्तुविशेषस्यैव शब्दार्थसृष्टि-
    जनकत्वमविशिष्टं थापि प्रकाशांशस्यैवार्थसृष्टौ विमर्शांशस्यैव शब्दसृष्टौ जनकत्वम्,
    तयोः परस्परसापेक्षत्वेनैव स्वस्वकार्यजनकत्वस्य श्रुतिस्मृतिसिद्धत्वात्, एकस्य
    स्वकार्यजनकत्वेऽपरस्य तत्कारणतावच्छेदकत्वमावश्यकम् । एवं च कारणतावच्छेद-
    ककारणतयोर्विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहेण द्वयोरपि प्रातिस्विककारणत्व-
    सिद्धिः तदभिपायेणैव हि तन्त्रेष्वन्यतरस्यैव कारणताबोधकानि वचनानीति ज्ञेयम् ।
    भगवता व्यासेनापि 'शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्' इति सूत्रे जगतः
    १-२. योगिनीहृदयदीपिका—अमृतानन्दनाथ ३. सेतुबन्ध

: प-ञ्चा-दि-सं-ख्या-का-नां-मा-का-शा-दी-नां.

  • Look at 'नां': yes, there is a dot on ना, then a मा! "पञ्चादिसंख्याकानांमाकाशादीनां"
  • Wait, or is it "पञ्चादिसंख्याकानां आकाशादीनां"? No space, but there's a dot over ना and then मा! It's a double representation (anusvara + m), common in Indian prints: पञ्चादिसंख्याकानांमाकाशादीनां.
  • Line 13:
    • तादृशसंख्याकाः । तेन व्योमादिषु पञ्चसु पञ्च शब्दाः, वाय्वादिषु चतुर्षु चत्वारः
  • Line 14:
    • स्पर्शाः, अग्न्यादिषु त्रिषु त्रीणि रूपाणि, जलभूम्योर्द्वौ रसौ, पृथिव्यामेको गन्ध इत्येवं
  • Line 15:
    • संहत्य पञ्चदश गुणा विद्यास्थैः पञ्चदशभिर्वर्णैरभिन्ना इति पञ्चदशानां वर्णानामुपपत्तिरिति
  • Line 16:
    • `भावः । अथ पञ्चदशभिर्गुणैः

२६६ वरिवस्यारहस्ये
'व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्या भूतगुणात्मिका ।
पञ्चभिश्च तथा षड्भिश्चतुर्भिरपि चाक्षरैः ॥'
इति स्फुटतरवचनविरोधात् । तत्र हि सामान्येन पञ्चदशसंख्याकाक्षरवत्त्वमुपपाद्य
संभावितनानाशङ्कापरिहाराय विशिष्य विशिष्य कूटत्रयाक्षराणां गणनयाऽज्भिरेव
सव्यञ्जनैः संख्यापूर्तिरित्यस्य स्पष्टं निर्धारितत्वादिति । अत्र ब्रूमः—सायमज्भिरेव
पञ्चदशत्वम्; तथापि हकारादिव्यञ्जनानामेव गुणभेदः, तेषामेव तद्वाचकत्वात् ।
शक्ततावच्छेदकं तु पञ्चदशसंख्यासमवायित्वसमानाधिकरणहकारत्वादिकं न पुनः
शुद्धहकारत्वादिकम्, अन्यथा हकारेण व्योमवाचकेन प्रकृते शब्दलक्षणायां
युगपद्वृत्तिद्वयविरोधापत्तेः । शब्दैक्ये ऽपि शक्ततावच्छेदकरूपधर्मद्वयभेदेनार्थद्वय-
भानमुपपद्यते । कथमम्यथा लि

द्वितीयोंऽशः २६७
प्रकाश एवं प्रकाश से पृथिवी—इसी क्रम से पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति होने पर भी
हकारवत् विमर्श विशिष्ट प्रकाश का ही व्योम का कारण होने से कारणता
वच्छेदकत्व के हकार में सिद्ध होने के कारण उसकी कारणता को भी सिद्ध करता
है। यही कङ्कारादिक के विषय में भी समझना चाहिए ॥ "व्योमबीजैस्तुविद्या-
स्थलैर्लक्ष्येच्छब्दपञ्चकम् ॥" (यो० हृ०)१
आकाश पञ्चविध, वायु चतुर्विध, अग्निस्त्रिभाग, जल द्विभाग, पृथिवी एक
विध—यह बात पञ्चीकरण-विवरण आदि में सुस्पष्ट है । ५ विध व्योमो में ५ शब्द,
चतुर्विध वायु में ४ स्पर्श, त्रिविध अग्नि में रूपत्रय, द्विभाग जल में २ रस, एक
विध पृथ्वी में. एक गंध—गुण विद्यमान हैं ।२
१. आकाश ५ — ५ शब्द ┐ पञ्चदश गुणों का 'श्रीविद्या'
२. वायु ४ — ४ स्पर्श │ के १५ अक्षरों के साथ अपृथक्
३. अग्नि ३ — ३ रूप │ संबंध है "पञ्चदश गुणा विद्यास्थैः
४. जल २ — २ रस ┤ पञ्चदशभिर्वर्णैरभिन्ना इति पञ्चदशानां
५. पृथ्वी १ — १ गंध │ वर्णानाम् उपपत्तिः ।"३
──────── │ "पञ्चदशभिर्गुणैः पञ्चदशाना-
१५ १५ ┘ वर्णानामभेदः"४
हकारपञ्चक—व्योमपञ्चक 'हकार पञ्चकस्य व्योम पञ्चकजनकत्वेन तद्वाचकत्वमेव
चाभेदः ।' तद्गुणैः शब्दैरपि सहाभेदः सिद्धप्राय एव ।
गुणगुणिनोरभेदेन गुणस्य गुण्यभिन्नत्वस्य न्यायसिद्धत्वात् ॥ 'योगिनीहृदय'
में कहा भी गया है—'व्योम बीजैस्तु विद्यास्थलैर्लक्षयेच्छब्दपञ्चकम्'
ठीक भी कहा गया है—'गुणाः पञ्चदशाख्याता भूतानां तन्मयी शिवा—'
'व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्याभूतगुणात्मिका । पञ्चभिश्च तथा षड्भिचतुर्भिर रपि
चाक्षरैः ॥' विद्या गुणवती एवं पञ्चभूतात्मिका है—'गुणाः पञ्चदशाख्याता भूतानां
तन्मयी शिवा ॥' 'तन्मयी' का क्या है? भूतमयी गुणमयी पञ्चदशसंख्याकावयववती
विद्या देवी व शिवा ॥
१. स्वरों के साथ पञ्चदशी के १५ वर्ण
२. हकारों के साथ व्यञ्जनों का अभेद एवं गुणों का अभेद ॥
१५ वर्ण = १५ गुण—दोनों 'सत्यमज्भिरेव पञ्चदशत्वम् । हकारादिव्यञ्जना
नामेव गुणाभेदः तेषामेव तद्वाचकत्वात् ।' में अभेद है—"पञ्चदशानां पञ्चदशगुणाभेद
कथनं तु ॥"
इदानीम् 'प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते' इतिवचनस्वारस्यमनुसंदधानो
───────────────────
१-४. भास्करराय

२६८ वरिवस्यारहस्ये
गुणानां गुणिबोधकाक्षरबोध्यत्ववत् तज्जनकाक्षरजन्यत्वस्यापि सत्त्वादभेदः
संभवतीत्याह—
तत्तज्जनकैर्वर्णैस्तत्तत्संख्यैस्तु तद्गुणा जाताः ।
कामकलाभिश्चतसृभिरासीत् स्पर्शश्चतुर्विधो न तु कैः ॥ ७५ ॥
(वर्णों द्वारा गुणोत्पत्ति एवं कामकला द्वारा स्पर्शोत्पत्ति का प्रतिपादन)
उन-उन उत्पादक अक्षरों द्वारा तथा (तद्गत) उन-उन संख्याओं द्वारा (उनके)
वे गुण उत्पन्न हुए हैं । (अर्थात् इनकी संख्या इनके जनक वर्णों की संख्या
के समतुल्य है ।) स्पर्श चतुष्टय तीन कामकलाओं एवं तृतीय ईकार द्वारा उत्पन्न
हुए हैं ॥ ७५ ॥

  • प्रकाश *
    तत्तज्जनकैर्व्योमादिजनकैः । तत्तत्संख्यैः पञ्चादिसंख्याकैः । तद्गुणा
    व्योमादिगुणाः । पञ्चादिसंख्याका इति शेषः । विद्यायां हि मायात्रये हकारत्रयम्,
    मध्यमकूटे हकारौ द्वौ, एवं पञ्चभिर्हकारैः पञ्च शब्दा उत्पन्नाः । अत एव तेषामर्थाः
    शब्दा एव, 'ये ये यद्यज्जनकास्तेषां तेषां त एवार्थाः' इति वक्ष्यमाणत्वात् । उक्तं च
    'व्योमबीजैस्तु विद्यास्थैर्लक्ष्येच्छब्दपञ्चकम्' इति । ननु भावार्थप्रकरणे मध्यमहकारस्य
    विद्यामूलबीजात्मककामकलार्थरूपत्वमुक्तमिति तस्य शक्तिवाचकत्वमेव युक्तं न पुनः
    शब्दलक्षकत्वमिति चेत्; न ह्येकवाचकत्वमपरलक्षकत्वे तन्त्रम्, वृत्तिद्वयविरोधस्य
    परिहृतत्वात् 'गङ्गायां घोषमत्स्यौ' इत्यादौ तस्येष्टत्वाच्च । वस्तुतस्तु, शिवशक्त्यात्मक-
    मूलबीजात्मकावकारहकारौ तु सूक्ष्मतमादप्यत्यन्तसूक्ष्मरूपावित्युक्तम् । इह तु
    वैखरीत्मकस्थूलरूपये रेवार्थान्तरपरत्वमुच्यते । अत एव मध्यप्राणोत्थनेन तादृशसूक्ष्म-
    रूपतां द्योतयित्वा तस्य प्रथारूपो यः स्पन्दः स्थूलात्मिका सृष्टिस्तद्रूपे व्योम्नि हकारे
    स्थितेत्युक्तं न पुनः स्थूलहकार एव शक्तिरिति । उक्तं च 'तेषां कारणरूपेण स्थितं
    ध्वनिमयं परम्' इति । तेषां शब्दानाम् । शब्दसृष्टेः सर्वस्यापीत्यर्थः । कारणं शक्तिः,
    तस्या रूपं सूक्ष्मतमादपि परम् । तादृशेन रूपेणोपलक्षितं सद् ध्वनिमयम् । ध्वन्यभिन्नं
    सत् स्थितं परं परब्रह्मेत्यर्थः । सर्वेष्वपि वर्णेषु वर्णांशध्वन्यंशौ परस्परसंसृष्टौ वर्तेते
    सुवर्णे परस्परसंसृष्टपार्थिवतैजसांशवत्, कत्वादिवर्णधर्माणां तारत्वमन्द्रत्वषड्जत्वादि-
    ध्वनिधर्माणां च सर्ववर्णेष्वनुभूयमानत्वात् । अत एव शारीरकभाष्ये स्फोटनिरासाय
    वर्णानामेव नित्यत्वमङ्गीकर्तुं तेषामेकैकव्यक्तिरूपत्वमुपपाद्य वैलक्षण्यप्रतीतिः सर्वापि
    ध्वन्यालम्बनत्वेनोपपादिता देवताधिकरणे । तथा च मध्यमहकारे ध्वन्यंशः
    परब्रह्मवाचकः, वर्णांशस्तु शब्दलक्षक इति विवेक इति भावः । ये तु हादिविद्या-
    पक्षपातिनो योगिनीहृदयस्य सम्पूर्णतन्त्रस्यापि हादिविद्यायामेव तात्पर्यमिति मन्यमाना
    इहान्यथा व्याचक्षते—'परं षष्ठं हाक्षरं तेषां पञ्चानामपि शब्दानां कारणभूतो यो
    ध्वनिर्नार्दस्तन्मयं तद्वाचकम्' इति, तेषां तत्र ग्रन्थस्वारस्यभङ्गेन क्लृप्ततरं व्याख्यानमेव
    शरणमिति तत्र तत्र स्पष्टीकरिष्यामः । ननु तथा सति वायुजनककाराणामेव
    चतुर्विधस्पर्शजनकत्वस्यावश्यकत्वात् ककाराणां च चतुर्णामभावादनुपपन्नमिद-
    मित्याह—कामकलाभिरिति । महामायायां त्रय ईकारा एकस्तृतीयाक्षररूपश्चेति

नाभ्यां द्वित्वमेव स्पष्टीकृतम् । ननु—व्योमबीजेन १व्योमगुणलक्षणा युक्ता,
शक्यसंबन्धात् । चन्द्रवाचकबीजस्य तु चन्द्रगतामृतलक्षकत्वमेव वाच्यं न पुनर्जलग्रत- -> wait, let me look at line 26: पुनर्जलग्रत- or पुनर्जलगत-?
In line 26: पुनर्जलगत-: पु, न, र्ज, ल, ग, त, -. Definitely पुनर्जलगत-.
रसलक्षकत्वम्, असंबद्धलक्षणायामतिप्रसङ्गात् । न च व्योमवाचकस्यापि वाय्वादिगत-
शब्दलक्षकत्ववदुपपत्तिः, तत्रापि नभोगुणस्य व्यापकत्वेन स्वशक्यसमवेतव्याप्यत्व-
रूपसंबन्धस्य सत्त्वात् । अत एव 'प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते' इत्यनेन
वचनेन तेजोरूपस्य व्यापकत्वलक्षणं प्राधान्यं शक्यसंबन्धप्रदर्शनायैवोक्तम् । तन्न्यायस्य
हकारादावपि तुल्यत्वेनादोषात् । न च तथामृत

२७० वरिवस्यारहस्ये
हादिविद्यापक्षपातिनस्तु, 'चन्द्रबीजै:' इति बहुवचनस्य स्वानुगुणत्वं मत्वा तुष्यन्तस्त्रिभिः
सकारै रसा लक्ष्यन्त इति व्याख्याय, ननु रसस्य द्वैविध्यात् तृतीयसकारः किमर्थ
इत्याशङ्क्य, अमृतं गतो ऽप्येको रसो ऽस्तीति तल्लक्षकत्वेनोद्ग्रन्थमेव समावाय, नन्वेवं
सति तृतीयरसाधारत्वेन भूजलभेदात् षष्ठमहाभूतस्यापत्तिरित्याशङ्कायाम् 'संबन्धो
विदित:' इति ग्रन्थमवतार्य, जलामृतयोः संबन्धो हि लोकप्रसिद्धः, तस्य जलनिधावे-
वोत्पन्नत्वात्, अतो जल एवान्तर्भाव इत्याशयपरत्वेन व्याचक्षते । तेषां रसस्येति पदस्य
जलनिधौ लक्षणा, स्थूलसूक्ष्मपदाभ्यां प्रत्येकैकत्ववत्त्वेन लब्धद्वित्वविरोधश्च, जले
ऽन्तर्भवे सिद्धे पुनर्वैयर्थ्यतादवस्थ्यं च । प्रत्युत जलामृतयोरभेदात् प्रातिस्विकम-
मृतवाचकः सकारो नापेक्षित इत्येवार्थः संभवतीति । एवं लकारस्य गन्धबोधकत्वम्
'वसुंधरागतो' गन्धस्तल्लिपिर्गन्धवाचिका' इति वचनात् ॥ ७५ ॥

  • सरोजिनी *
    वर्णों से गुणों की उत्पत्ति होती है ।
    वर्ण—गुण । गुणों की संख्या (इनके जनक) वर्णों की संख्या के तुल्य है ।
    ३ कामकला + तृतीय ईकार—चारों प्रकार के स्पर्श ॥
    “तत्तज्जन्कैर्वर्णैः” = व्योमादि को जन्म देने वाले अक्षरों के द्वारा ॥
    'तत्तत्संख्यैः' = पञ्चादिसंख्याकों द्वारा । 'तद्गुणा' = 'व्योमादिगुणाः ॥ व्योमादि के
    १५ गुण । विद्या में स्थित मायात्रय में हकारत्रय स्थित हैं । 'मध्यकूट' में २ हकार
    हैं । ५ हकारों से—५ शब्द ॥ कहा भी गया है—"व्योमबीजैस्तु विद्यास्थै-
    र्लक्ष्येच्छब्दपञ्चकम् ॥"
    नन्वेकेनैव लकारेणैकविधगन्धबोधोपपत्तेरितरद्वयवैयर्थ्यम्; अत आह—
    भुवनत्रयसंबन्धादासीत् त्रेधा लकारोऽपि ।
    ये ये यद्यज्जनकास्तेषां तेषां त एवार्थाः ॥ ७६ ॥
    (वर्ण एवं उनके अर्थ में तादाम्यभाव)
    लोकत्रय से संबंधित होने के कारण लकार भी (मन्त्र में) तीन बार आता है।
    जो-जो वर्ण जिनके-जिनके स्रष्टा हैं वे ही उनके-उनके संसृष्ट अर्थ हैं ॥ ७६ ॥
  • प्रकाश *
    भुवनत्रयेण सह वाच्यवाचकभावसंबन्धाल्लकारस्य त्रैविध्यं जन्यजनकभाव-
    संबन्धाद्वा, 'भुवनत्रयसंबन्धात् त्रिधात्वं तु महेश्वरि' इति वचनात् । स्पष्टमन्यत् ॥ ७६ ॥
  • सरोजिनी *
    'भुवनत्रय' = लोकत्रय ॥ 'एवार्थः' = ही अर्थ हैं । अर्थात् शब्द ही (अक्षर
    ही) पदार्थ भी हैं । 'पदार्थ' वस्तु को (या 'अर्थ' को) कहते हैं । वस्तु (पदार्थ) हैं
    १. सुंधरागुणो

द्वितीयोंऽश: २७१
क्या? वस्तु है पद (शब्द) का अर्थ (Meaning of the word) जगत् एवं उसके
पदार्थ केवल शब्द के वाच्य हैं—शब्द के अर्थ हैं—शब्दार्थ (Interpret°kion of
word) हैं । शब्द (कारण) जगत् (कार्य) हैं । “ये ये यद्यज्जनकास्तेषां तेषां त
एवार्थाः ॥’’—जो जो वर्ण जिनके-जिनके उत्पादक हैं वे ही उनके-उनके उत्पन्न
(उत्पाद्य) पदार्थ भी हैं । चूँकि ‘कारण’ ही ‘कार्य’ के रूप में उत्पन्न होता है अतः
विश्व के समस्त अर्थों का मूल कारण अक्षर (शब्द) होने के कारण सारे अर्थ
उसके विवर्त हैं—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्द तत्त्वं यदक्षरं ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
अक्षर या शब्द उपादान कारण है और पदार्थ एवं पदार्थमय जगत् उसके
कार्य हैं । यहाँ तक कि जगत् का परात्पर, तत्वातीत परब्रह्म एवं उसकी शक्ति भी
अक्षर ही है—
‘अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ।
हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥’१
‘अ’ = प्रकाश = परमशिव ‘ह’ = कला विमर्श शक्ति ‘अ’ ही समस्त
वर्णसमुदाय एवं पदार्थ-जगत् का कारण है । ‘परात्रिंशिका’ एवं शब्दसृष्टिवाद—
‘परात्रिंशिका’ की दृष्टि के अनुसार ‘अहं’ शब्द की आद्य, ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति के
साथ ही अ से ह तक की समस्त मातृकाओं का आविर्भाव हुआ ।
(क) ‘अहं’—अ से ह = (अर्थात् समस्त स्वर एवं समस्त व्यञ्जन रूप
अशेष मातृकाओं का जन्म ॥)
(ख) इसके बाद ‘इच्छाशक्ति’ में शाखायें निकली—१. ज्ञानशक्ति २. क्रिया
शक्ति ।
१. ज्ञानशक्ति—अन्तःकरण चतुष्टय एवं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
२. क्रियाशक्ति—दस प्राण एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ
‘अहं’ = वर्णमाला का सार (निचोड़) = यही अहं ही है ‘प्रथमस्पंद’
भैरवी भगवान् भैरव से प्रश्न करती है कि—‘ओ प्रपञ्च के स्वामी अनुत्तर
शब्द तत्त्व का क्या महत्व है? यह ज्ञानाप्ति में सहायक कैसे बनता है?
साधक उसके द्वारा तुमसे ऐकात्म्य कैसे अधिगत करता है? परमशिव रुद्र
कहते हैं—वर्णमाला के दो भेद हैं—(क) स्वर (२) व्यञ्जन ।
३. ‘अ’ से ‘अनुस्वार’ तक के अशेष वर्ण—पन्द्रह तिथियाँ
४. ‘क’ से ‘म’ तक के अशेष वर्ण—पृथ्वी से पुरुष तत्त्व तक के समस्त
पच्चीस तत्त्वों का जन्म ॥
१. संकेतपद्धति

२७२ वरिवस्यारहस्ये
५. क—पृथ्वी, ख—जल, ग—अग्नि, घ—वायु, ङ—आकाश ।
६. 'ट' से 'ण'—कर्मेन्द्रियाँ
७. 'त' से 'न'—ज्ञानेन्द्रियाँ ८. य, र, ल, व—राग, विद्या, कला माया ॥
इदानीं वायुजनकानामपि ककाराणामर्थान्तरमस्तीति पूर्वोक्तस्य 'ये ये
यद्यज्जनकाः' इत्यस्यौत्सर्गिकस्य नियमस्यापवादमाह—
ककारत्रयवाच्यास्तु सकलाः प्रलयाकलाः ।
विज्ञानकेवलाश्चेति त्रिप्रकारा उपासकाः ॥ ७७ ॥
(ककारत्रय एवं 'सकल', 'प्रलयाकला तथा 'विज्ञानाकल' की अभेदात्मकता)
सकल, प्रलयाकल एवं विज्ञानाकल (नामक) तीन प्रकार के उपासक
(आराधक, साधक) (मन्त्रगत) ककारत्रय के वाच्य हैं । (अर्थात् ककारत्रय सकल,
प्रलयाकंल एवं विज्ञानाकल के वाचक हैं ।) ॥ ७७ ॥

  • प्रकाश *
    प्रमातारः साधकाः पशव इत्यादिपदाभिधेया उपासकास्त्रिविधाः—अधमा मध्यमा
    उत्तमाश्चेति । त एवाशुद्धमिश्रशुद्धपदैः सकलादिपदैश्च क्रमेण व्यवह्रियन्ते । तत्र
    भेदैकदृष्टयः शिवाहंभावभावनाहीनाः कर्मैकरताः प्रथमाः । सुपक्कमलकर्माणः
    'चितिश्चैत्यं च चैतन्यं चेतनं द्वयकर्म च ।
    जीवः कला शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं भवेत् ॥'
    इति श्लोकोक्तसूक्ष्मपुर्यष्टकसंबन्धशालिनः कर्मज्ञानमार्गयोः साधारणा द्वितीयाः ।
    निरस्तभेदाः सर्वत्र शिवैकदृष्टयः पूर्णज्ञानिनस्तृतीयाः । एते च स्वच्छन्दसंग्रहे विस्तरेण
    प्रपञ्चिताः । ते त्रयाणां ककाराणां वाच्याः । तदुक्तम्—
    'अशुद्धशुद्धमिश्राणां प्रमातॄणां परं वपुः ।
    क्रोधीशत्रितयेनास्य¹ विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥'
    इति । क्रोधीशः ककारः । न चाकराणां पार्थक्यस्याग्रे वक्ष्यमाणत्वेनैकैक-
    हलात्मका एव हकारककारादयो वाचका वक्तव्याः, तथा च ककारे जश्भावेन
    गत्वापत्तिरिति वाच्यम्; एकहल एव पदत्वेन पदान्तत्वाभावात्, व्यपदेशिवद्भावस्य
    'टकितौ', 'सुप्पिप्तौ' इत्यादिज्ञापकेनानित्यत्वात् ॥ ७७ ॥
  • सरोजिनी *
    ककारत्रय जीवों के वाचक हैं ।
    १. वाग्भव का 'क' २. कामराज कूट का 'क' ३. शक्तिकूट का 'क'—
    तीनों मिलाकर ३ 'क' हैं ।
    १. त्रितयेनात्र

द्वितीयोंऽशः २७३
१. प्रथम ‘क’ का अर्थ—‘सकल’
२. द्वितीय ‘क’ का अर्थ—‘प्रलयाकल’
३. तृतीय ‘क’ का अर्थ—‘विज्ञानाकल’
उपासकों के तीन भेद हैं—१. ‘अधम’ २. ‘मध्यम’ ३. ‘उत्तम’ :
‘उसकास्त्रिविधाः अधमा मध्यमा उत्तमाश्च’ ये १. अशुद्ध २. मिश्र ३. शुद्ध
सकल-प्रलयाकल-विज्ञानाकल के नाम से अभिहित किए जाते हैं—
प्रथम उपासक—शिवाहंभाव-भावनाहीन, कर्मैकरत भेदबुद्धि वाले । ‘शिवाहंभाव-
भावनाहीनाःकर्मैकरताः प्रथमा ॥ द्वितीय उपासक—साधारण । कर्मज्ञानमार्गी,
सूक्ष्मपुर्यष्टकसंबंध शाली उपासक । तृतीय उपासक—निरस्तभेद एवं सर्वत्र .शिवैक
दृष्टिवाले एवं पूर्णज्ञानी ॥१ ये तीनो उपासक ही ककारत्रय के वाच्य हैं—‘ते त्रयाणां
ककाराणां वाच्याः ॥’ इसीलिए कहा भी गया है—
अशुद्ध-शुद्ध-मिश्राणां प्रमातृणां परं वपुः ।
क्रोधीशत्रितयेनास्य विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥
क्रोधीश = ककार ॥
अकारैर्दशसंख्याकैरुच्यन्ते जीवराशयः ।
विद्यायाः प्राणभूतः संस्तद्वाच्येकादशः स्वरः ॥ ७८ ॥
(अकार एवं जीवों में अभेदात्मकता तथा एकार का विद्यागत महत्त्व)
दशसंख्याक अकारों द्वारा जीव-समूह (उनके वाच्य के रूप में) कहे गए हैं ।
ग्यारहवाँ स्वर (एकार) विद्या का प्राण होता हुआ भी उसका वाच्य है ॥ ७८ ॥

  • प्रकाश *
    पञ्चदश्यां द्वितीयतृतीयवर्णौ हल्लेखात्रयं च मुक्त्वा अवशिष्टेषु दशस्वक्षरेष्वकारा
    दश । तेषां जीवराशय एव वाच्याः । एकेनाप्यभिधानसंभवे दशभिरभिधानं
    जीवानामानन्त्यद्योतनाय । तृतीयकूटाद्याकारे तु ध्वनिरूपस्यैव भावार्थप्रकरणे
    मूलबीजांशरूपत्वमुक्तमिति न विरोधः । एकादशः स्वर एकारः । स च विद्यालक्षणस्य
    मूलबीजोत्थवृक्षस्यान्तरः प्राणः सन्नपि स्वयं स्ववाची, लोके ऽपि क्षतस्य पुनः
    प्ररोहणादिना अनुमीयमानस्याध्यात्मिकवायुसंबन्धस्य वृक्षादावङ्गीकारात् । उक्तं च—
    ‘श्रीकण्ठदशकं तद्वदव्यक्तस्य हि वाचकम् ।
    प्राणभूतः स्थितो देवि तद्वदेकादशः स्वरः ।
    एकः सन्नेव पुरुषो बहुधा जायते हि सः’ ॥
    इति । श्रीकण्ठा अकाराः । अव्यक्तो जीवः । एकादश एकारः, ‘संधिरेकादशो
    भद्रा पद्मनाभः कुलाचकः’ इति कोशात्,
    १. भास्करराय—‘प्रकाश’ (स्वच्छन्दसंग्रह)
    १८ वरि.

२७४ वरिवस्यारहस्ये
'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् ।
ब्रह्माण्डादि कटाहान्तं जगत् . . . . . ॥'
इति प्रयोगाच्च योगरूढो ऽयं शब्दः । तस्य च शुद्धयोगापेक्षया परत्वमस्त्येव । स
च प्रकृत एको ऽपि दृश्यमानो बहुरूपः परिणमते । उक्तं च कादिमते—
'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् ।
ब्रह्माण्डादि कटाहान्तं जगद्यद्यापि दृश्यते ॥'
इति । हादिपक्षे तु शुद्धयौगिकत्वमङ्गीकृत्य श्रीकण्ठपरत्वेनैकादशपदं व्याख्याय
परो द्वादशः पुरुषः परः शिवः, तद्वाचक इति व्याचक्षते । तत्क्लिष्टमिति स्वर इति
विशेषेणाकाख्यावर्तकेन सूचितम् । ननु श्रीकण्ठदशकस्यैकस्मिन्नेव श्लोके प्रति-
संबन्धित्वेन निर्दिष्टस्योपस्थित्या, एकादशो ऽपि श्रीकण्ठ एवेति चेन्न, रूढिप्राबल्ये
तादृशोपस्थितेरप्रयोजकत्वात् । कथमन्यथा ज्ञानार्णवे—
'आद्यं वाग्भवमुच्चार्य कामबीजं द्वितीयकम् ।
कुमार्यास्तु तृतीयं तु त्रिपुरा परमेश्वरी ॥'
इति त्रिपुराचक्रेश्वरीमन्त्रोद्धारः सङ्गच्छताम्? तत्र हि कुमार्याः प्रतिसंबन्धित्वेन
निर्देशे ऽप्याद्यद्वितीयपदाभ्यां मातृकासंबन्धिनावेव प्रथमद्वितीयौ वर्णौ विवक्षितौ,
दक्षिणामूर्तिसंहितादौ 'अं आं सौः' इत्यस्यैव प्रथमचक्रेश्वरीमन्त्रस्योद्धृतत्वात् । अन्यथा
बालाया एव त्रिपुराचक्रेश्वरीत्वमापद्येत । तस्मान्मातृकायामेकादश एवात्र ग्राह्य इति ।
तार्तीयप्रथमस्य पूर्वमभिहितत्वान्नेह पुनरुट्टङ्कनमित्यपि हादिपक्षे सुवचम् । परं तु न तथा
सांप्रदायिकैर्व्याख्यातम् । तथापि कः प्राणवाचको ऽकारः को वा जीववाचक
इत्यनिर्धारणं तत्पक्षे दुरुद्धरम् ॥ ७८ ॥

  • सरोजिनी *
    क + अ, ल् + अ, ह् + अ, स् + अ, क् + अ, ह् + अ, ल् + अ,
    स् + अ, क् + अ, ल् + अ = ये ही १० 'अ' ॥
    पञ्चदशी मन्त्र में द्वितीय एवं तृतीय वर्ण एवं तीन हल्लेखाओं को छोड़कर
    अर्थात् 'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं' में से द्वितीय वर्ण
    (ए) एवं तृतीय वर्ण (ई) छोड़कर शेष—क, ल, ह, स, क, ह, ल, स, क, ल
    में १० अकार स्थित हैं—
    ('पञ्चदश्यां द्वितीयतृतीय वर्णौ हल्लेखायां च मुक्त्वा अवशिष्टेषु
    [

द्वितीयोंऽशः २७५
इस प्रसङ्ग में कहा भी गया है—
'श्रीकण्ठदशकं तद्वदव्यक्तस्य हि वाचकम् ।
प्राणाभूतः स्थितो देवि तद्वदेकादशः स्वरः ।
एकः सन्नैव पुरुषो बहुधा जायते हि सः ॥'
श्रीकण्ठाः = अकार समूह । अव्यक्त = जीव । एकादशः = एकार ।
'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् । ब्रह्माण्डादि काहान्तं जगत्....॥' 'कादिमत'
में कहा गया है—
'यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयात्मकम् ।
ब्रह्माण्डादि कटाहान्तं जगद्व्यापि दृश्यते ॥
'हादिमत' में शुद्धयौगिकत्व को अङ्गीकृत करके श्रीकण्ठपरत्वेन एकादश पद
की व्याख्या करके द्वादश पुरुष पर शिव उसका वाचक है—ऐसा समझना चाहिए ।
'एकार' की एकादश स्वर कहा गया है ।
१० अकार = जीव-समूह । एकादश स्वर (एकार) = विद्या का प्राण एवं
जीव का वाचक ।
योगिनीहृदयस्थमेव पद्यं लाघवात् स्पष्टत्वाच्च निबध्नाति—
बिन्दुभिस्त्रिभिरुच्यन्ते रुद्रेश्वरसदाशिवाः ।
शान्तिः शक्तिश्च शम्भुश्च नादत्रितयबोधनाः ॥ ७९ ॥
(बिन्दुत्रय के साथ रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव की अभेदात्मकता तथा शान्ति,
शक्ति एवं शम्भु की नाद के साथ अभेदात्मकता)
बिन्दुत्रय के द्वारा रुद्र, ईश्वर एवं सदाशिव (बिन्दु के वाच्य के रूप में) के
कहे गए हैं । नादत्रय शान्ति, शक्ति एवं शिव के बोधक (वाचक) हैं ॥ ७९ ॥

  • प्रकाश *
    रुद्रस्तेजस्तत्त्वम्, 'रुद्रो वा एष यदग्निः' इति श्रुतेः । तेन पुरुषनियतिकालराग-
    विद्याकलामायानां परिग्रहः, 'पुरुषादिकमायान्तं तेजस्तत्त्वं महेश्वरि' इति स्वच्छन्द-
    संग्रहोक्तेः । शान्तिः प्रकृतिः शुद्धविद्या च । अर्धचन्द्राद्युन्मनान्तवर्णाष्टकं नादपदेनोच्यते ।
    नादगितयमेव बोधनं येषां ते । करणे ल्युट् ॥ ७९ ॥
  • सरोजिनी *
    १. बिन्दुत्रय = रुद्र, ईश्वर एवं सदाशिव ॥
    २. नादत्रय = शान्ति, शक्ति एवं शम्भु ॥
    'रुद्र' = तेजस्तत्व 'रुद्रस्तेजस्तत्वम् ॥'