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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 530 में से

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पृष्ठ 373

द्वितीयोंऽश: २७१
क्या? वस्तु है पद (शब्द) का अर्थ (Meaning of the word) जगत् एवं उसके
पदार्थ केवल शब्द के वाच्य हैं—शब्द के अर्थ हैं—शब्दार्थ (Interpret°kion of
word) हैं । शब्द (कारण) जगत् (कार्य) हैं । “ये ये यद्यज्जनकास्तेषां तेषां त
एवार्थाः ॥’’—जो जो वर्ण जिनके-जिनके उत्पादक हैं वे ही उनके-उनके उत्पन्न
(उत्पाद्य) पदार्थ भी हैं । चूँकि ‘कारण’ ही ‘कार्य’ के रूप में उत्पन्न होता है अतः
विश्व के समस्त अर्थों का मूल कारण अक्षर (शब्द) होने के कारण सारे अर्थ
उसके विवर्त हैं—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्द तत्त्वं यदक्षरं ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
अक्षर या शब्द उपादान कारण है और पदार्थ एवं पदार्थमय जगत् उसके
कार्य हैं । यहाँ तक कि जगत् का परात्पर, तत्वातीत परब्रह्म एवं उसकी शक्ति भी
अक्षर ही है—
‘अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ।
हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ॥’१
‘अ’ = प्रकाश = परमशिव ‘ह’ = कला विमर्श शक्ति ‘अ’ ही समस्त
वर्णसमुदाय एवं पदार्थ-जगत् का कारण है । ‘परात्रिंशिका’ एवं शब्दसृष्टिवाद—
‘परात्रिंशिका’ की दृष्टि के अनुसार ‘अहं’ शब्द की आद्य, ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति के
साथ ही अ से ह तक की समस्त मातृकाओं का आविर्भाव हुआ ।
(क) ‘अहं’—अ से ह = (अर्थात् समस्त स्वर एवं समस्त व्यञ्जन रूप
अशेष मातृकाओं का जन्म ॥)
(ख) इसके बाद ‘इच्छाशक्ति’ में शाखायें निकली—१. ज्ञानशक्ति २. क्रिया
शक्ति ।
१. ज्ञानशक्ति—अन्तःकरण चतुष्टय एवं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
२. क्रियाशक्ति—दस प्राण एवं पाँच कर्मेन्द्रियाँ
‘अहं’ = वर्णमाला का सार (निचोड़) = यही अहं ही है ‘प्रथमस्पंद’
भैरवी भगवान् भैरव से प्रश्न करती है कि—‘ओ प्रपञ्च के स्वामी अनुत्तर
शब्द तत्त्व का क्या महत्व है? यह ज्ञानाप्ति में सहायक कैसे बनता है?
साधक उसके द्वारा तुमसे ऐकात्म्य कैसे अधिगत करता है? परमशिव रुद्र
कहते हैं—वर्णमाला के दो भेद हैं—(क) स्वर (२) व्यञ्जन ।
३. ‘अ’ से ‘अनुस्वार’ तक के अशेष वर्ण—पन्द्रह तिथियाँ
४. ‘क’ से ‘म’ तक के अशेष वर्ण—पृथ्वी से पुरुष तत्त्व तक के समस्त
पच्चीस तत्त्वों का जन्म ॥
१. संकेतपद्धति