वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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रहित हैं या मूल कारण ज्ञान शून्य हैं साधक के लिए सिद्धिप्रद नहीं होते । 'आदि
मान्त्यविहीनानि मन्त्राणि च तथैव च । निष्कलानि भवन्त्येवं पिवतो मृगतृष्णिकाम् ॥
कोई पुरुष सन्तानेच्छावश अपनी उत्पादन शक्ति (अपने शरीर के अर्धभाग
रूपा भार्या) में स्वयं अपने बिन्दु (शुक्र) के द्वारा प्रवेश कर जाता है—('शुक्ल
बिन्दु' के माध्यम से प्रवृष्टि हो जाता है)१—'शुक्लबिन्दु' एवं पुरुष में तत्त्वतः कोई
भेद नहीं रहता अतः पति ही पत्नी द्वारा पुत्र बनकर जन्म लेता है उसके बाद उस
शुक्लबिन्दु के भीतर भार्या का 'शोणितबिन्दु' भी प्रविष्ट हो जाता है । इससे दोनों
मिलकर बिन्दु फूल उठता है । यह 'वटोदुम्बरादिबीजस्थानीय' होता है । उसके बाद
बीज से निकलने वाले अंकुर की भाँति कालान्तर में सन्तानोत्पत्ति हो जाती है ।
यह उसी प्रकार है यथा सूर्याभिमुख दर्पण के भीतर प्रविष्ट किरणों से एवं
बाह्यकिरणों के सङ्कलन से कुड्य आदि में तेजो बिन्दु उत्पन्न हो उठता