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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 530 में से

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पृष्ठ 362

२६० वरिवस्यारहस्ये
स्फुरत्तात्मक लहरी से युक्त, पारमार्थिक प्रकाश रूप उस अहमात्मक बिन्दु से,
इच्छा, ज्ञान एवं क्रियास्वरूप मातृत्रयात्मक अनन्त सृष्टि उद्भूत हुई है । यथा
सूर्याभिमुख दर्पण में अन्तःप्रविष्ट किरणों द्वारा दोनों ओर से प्राप्त किरणों के
सम्मेलन से, भित्ति परतेजोबिन्दुविशेष प्रादुर्भूत होता है उसी प्रकार प्राणियों के
अदृष्टवश अपने में उपसंहृत विश्व की रचना की इच्छा से प्रकाशरूप ब्रह्म, अपनी
शक्ति को देखने के लिए अभिमुख होकर उसके अन्तराल में तेजरूप से प्रविष्ट
होकर शुक्लबिन्दु का रूप ग्रहण करता है । फिर उस बिन्दु में रक्तरूपा शक्ति
प्रविष्ट होती है जिससे कि संमिश्रित बिन्दु यत्किंचित अभिवृद्धि करता है । वही
'हार्धकला' रूप पदार्थ विशेष के रूप में परिचित होता है । वह बिन्दु, समष्टि रूप
से एक एवं स्फुट शिवशक्तिसामरस्य नामक अग्नीषोमात्मक 'काम' 'रवि' आदि कहा
जाता है । व्यष्टि रूप में वे दो रहते हैं । 'शुक्लबिन्दु' चन्द्रमा एवं रक्त बिन्दु
अग्नि है । इस बिन्दुद्वय को विसर्ग भी कहते हैं । सूर्य रात्रि को अग्नि में तथा
अमावस्या को चन्द्र में प्रवेश करता है । समष्टि बिन्दु की इसीलिए 'रवि' आख्या
है ।
१. 'काम' नामक बिन्दु २. 'विसर्ग' ३. 'हार्धकला'—इन तीन अवयवों से
युक्त एक अखण्ड पदार्थ अण् आदि प्रत्याहार के सदृश 'कामकला' कहा जाता है।
यही सम्पूर्ण सृष्टि का बीज है । 'कामकला' तुरीय (चतुर्थ) बिन्दु मूलभूत ब्रह्म है ।
चतुर्थ बिन्दुरूप एवं शून्यस्वरूप अकार एवं हकार से उत्पन्न 'कामकला' अहं कही
जाती है । 'अहं' पद का अर्थ है—अकार हकारोभयात्मकता एवं शिवशक्तिद्वय-
रूपता। 'अहं' = अखिल सृष्टि का वाचक है । विश्वात्मारूप प्रकाश ही 'अहं' है ।
'कामकला' में पहले तुरीय बिन्दु, उसके नीचे 'काम' नामक 'बिन्दु' उसके
नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय एवं उसके नीचे 'हार्धकला' स्थित है । तुरीय एवं विसर्ग
के मध्य चैतन्यरूप से अकार एवं हकार स्थित हैं । ये 'अ' एवं 'ह' वैखरी रूप
से नहीं प्रत्युत् पर एवं परा मातृकारूप शून्याकार सदृश स्थित हैं । ये अ + ह
कुटिलात्मक हैं । सृष्टि की माता वक्रा वामा शक्ति कुटिला है । काम + विसर्ग या
अकार + हकार कुण्डलिनी के प्रतिबिम्ब हैं । अकार + हकार कुण्डलिनी से
अभिन्न हैं । पर ब्रह्म के दो रूप हैं—१. अर्थ २. शब्द अ + ह = शिवशक्ति;
अकुल + कुण्डलिनी ॥
अहन्तामय त्रिबिन्दु तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा 'कामकला' त्रिगुणात्मक त्रिकोणरूप में
परिणत हो जाती हैं और जगन्माता बनती हैं । १. शुक्ल २. रक्त ३. मिश्र बिन्दु
(बिन्दुत्रय) सिंघाड़े के आकार का त्रिकोण है ।
बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्म शृङ्गारं विद्धि सुन्दरम् ।
मिश्रं शुक्लं च रक्तं च पुराणं प्रणवात्मकम् ॥१
'विसर्ग'—विसर्ग शब्द अनेकार्थक है । योग के अनुसार 'महानाद' के ऊपर
१. कामकलाविलास