वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽश: २५९
मात्रावशेषं ब्रह्मैव भासत ॥'१
२. श्रुतियों में भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा गया है—'यथा प्रियया
संपरिष्वक्तोन बाह्यं किञ्चन वेदनान्तरम्'२
३. यो ब्रह्मरन्ध्रस्थितो बिन्दुः स निःशेषेण न कामालयं प्रविशति किन्त्वंशेन ।
बिन्दुः तुरीय बिन्दुः ।। तदंशो मन्दिरस्थितस्तु कामाख्यो बिन्दुः कामेश्वरः ।।३
४. कामबिन्दोः शोणबिन्दुना सहपरस्परानुपविष्टत्वे बिन्दुद्वयं विसर्गो हकारो
विमर्शः ।। हकार रूपा शक्तिरेव च कला "हकारोऽन्यः कलारूपः ।। सेयं
'कामकला' भवति ।।४
५. मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो ।
हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि. ते मन्मथकलाम् ।।
मुख बिन्दुः कामबिन्दुः ।। कुचयुगं = विमर्शबिन्दु द्वयम् ।। हकारः विमर्शः ।।५
६. पति का पत्नी के साथ संभोग करने से उसका जो शुक्ल बिन्दु पत्नी के
अन्दर प्रवेश करता है पति उसके माध्यम से स्वयं पत्नी के गर्भ में प्रवेश करता
है। 'आत्मा वै पुत्रनामासि' ।। (श्रुति)
७. 'शुक्लबिन्दु' में भार्या का शोणित बिन्दु प्रवेश करता है अतः—
'शुक्लस्यान्तः शोणितबिन्दुरूपेण भार्या प्रविशति' 'यथा हि कश्चित पुरुषः ........
स्त्रीयामुत्पादनशक्तिमालोक्य स्वार्धशरीरात्मकायां भार्यायां स्वयमन्तः प्रविशति
शुक्लरूपेण ।।'
सारांश—१. पुरुष का अपने श्वेत वीर्य द्वारा पत्नी के गर्भ में प्रविष्ट होना ।
२. पत्नी का, अपने गर्भ में पतित पति के शुक्लबिन्दु में अपने लाल रङ्ग
के रज के प्रवेश द्वारा—मानो स्वयं प्रवेश कर जाना ।। 'बिन्दुं रक्तरूपा शक्तिः
प्रविशति ।। तेन संभिन्नो बिन्दुरुच्छूनो भवति ।।
'कामकलाविलास' में कहा गया है—
'सितशोणबिन्दुयुगलं विविक्तशिवशक्तिसंकुचत्प्रसरम् ।
वागर्थसृष्टि हेतुः परस्परानुपविष्टः विस्पष्टम् ।।
बिन्दुरहङ्कारात्मा रविरेतन्मिथुनसमरसाकारः ।
कामः कमनीयतया कला च दहनेन्दुविग्रहौ बिन्दू ।।६
नटनानन्दनाथ कहते हैं—'शब्दोत्पादकोऽनुत्त राक्षराभिधेयः परमेश्वरः स्वात्म-
भूताखिलप्रपञ्च निलयात्मक विमर्शशक्तिमनुप्रविश्य बिन्दुभाव मयते ।। ततः सा विमर्श
शक्तिरपि स्वान्तर्गत प्रकाशमय बिन्दु मनुप्रविशति ।। ततश्च बिन्दुरुच्छूनो भवति ।७
१-५. सेतुबन्ध ६. कामकलाविलास
७. चिद्वल्ली—नटनानन्दनाथ