वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः २५७
'ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः ।। (ई०प्रत्य०) 'ईश्वर' = बहिरुन्मेष ।
'सदाशिव' = अन्तः निमेष ।
३. 'शुद्धविद्या या सद्विद्या तत्त्व' में- 'अहम्' एवं 'इदम्' इन दोनों रूपों में
ऐक्य की प्रतीति रहती है । 'मै = यह हूँ'' यही भावना शुद्धविद्या में जागृत रहती
है । इसमें क्रियाशक्ति को प्राधान्य है ।
४. 'मायातत्त्व' — इस भूमि पूर्वभूमि की ऐक्य प्रतीति पृथक्-पृथक् हो जाती
है । 'अहं' अहं पुरुष रूप में एवं 'इदम्' अंश प्रकृति के रूप में अभिव्यक्त हो
जाता है । यहाँ 'अचित' में प्रमातृत्व का आभास होने लगता है । इस भूमि में
परमेश्वर माया शक्ति द्वारा अपने रूप को आच्छादित कर लेते हैं और पुरुष तत्त्व
के रूप में पृथक हो जाते हैं । परमशिव सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, पूर्ण, नित्य, व्यापक
एवं असंकुचित शक्ति वाला होकर भी स्वेच्छावश 'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' एवं
'नियति' रूप ५ कञ्चुकों से आवेष्टित होकर अभिव्यक्त होता है इन्हीं पाँचों से
आच्छादित होकर यह चैतन्य 'पुरुषतत्त्व' बन जाता है ।
शङ्कराचार्य के कथनानुसार "अहं (अस्मत् प्रत्यय) प्रत्यक् चैतन्य है ।।"
"अहं" = अ = शिव ।। "ह" = शक्ति ।।
'अहं' = अ से लेकर क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग एवं य, व,
र, ल, श, ष, स, ह—पर्यन्त अर्थात् अशब्दादि एवं हकारान्त सम्पूर्ण वर्णमाला
एवं उसके समस्त वर्ण 'अहं' के वाच्य हैं । पाणिनि सूत्र 'आदिरन्त्येन सहेता ।।
२।२।७२' भी आदि (अ) अन्त्य (ह) की अभेदात्मकता एवं सर्वव्यापकता की ओर
इंगित करता है ।
१. क म वर्ग की उत्पत्ति— 'अकार' से ही होती है । हकार एवं विसर्ग भी
अ से ही उत्पन्न होते हैं— 'कवर्गस्य च अकाराज्जन्म द्योतयितुं उक्तम् 'अकुह
विसर्जनीयानां कण्ठः'' इत्यादीनीत्या क वर्ग—हकार—विसर्जनीयानामकाराद-
वोत्पत्तिः ।।'१ हकारात्मिका इस कला से ही सारे वर्ण समुदाय का आविर्भाव होता
हैं— 'हकारात्मा वैसर्गिकी कला जाता, निखिलमेव वर्णजातमुदिम्'२
समस्त प्रपञ्च को प्रत्याहत करके पर प्रमाता एवं मन्त्र वीर्यात्मा अहं परामर्श
सर्वत्र उल्लसित है कहा भी गया है— प्रकाश की आत्मविश्रान्ति ही 'अहं' भाव
है— 'प्रत्याहताशेषविश्वः प्रमात्रैकरूपः परमन्त्रवीर्यात्मा अयमहंपरामर्शः-
'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहंभावो हि कीर्तितः ।। (अजड प०) गुरु कौन है?
'अहंपरामर्श रहस्यविज्ञः गुरुः ।। आदिम अनुत्तर वर्ण (अ) एवं अन्त्य वर्ण 'ह'—
दोनों अहं परामर्शात्मक हैं । इन दोनों से रहित एवं इनकी रहस्यात्मकता के न
होने पर कोई भी मन्त्र साधक के लिए व्यर्थ हो जाता है यथा शरद का बादल
'आदिमान्त्यविहीन नास्तु मन्त्राः स्युः शरदभ्रवत् ।।'३ ऐसे मन्त्र जो अहं परामर्श
१-३. तन्त्रालोक—'विवेक'
१७ वरि.