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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 530 में से

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२५६ वरिवस्यारहस्ये
एवं 'हकार' से युक्त शिवशक्ति सामरस्य वाला परब्रह्म है। 'अहं' रूप परप्रमाता के
परामर्श का ही यह उदय है। उसी की महत्ता से वाच्य वाचक रूप सृष्टि का
अवभास होता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—
'अक्षर ही परब्रह्म है। उसका 'स्व' भाव ही अध्यात्म है ॥'१
यल्लोहित तदग्निर्यद्वीर्यं सूर्यैन्दुविग्रहम् ।
अ इति ब्रह्म परमं तत्संघट्टोदयात्मकम् ॥ २२७ ॥२
'अकार' एवं 'हकार' एकत्र अवस्थित हैं। इसमें विभाजन नहीं होता। जैसे
वायु एवं आकाश' यह 'अ' रूप शिव (पर प्रमाता) ५० वर्णों में भी व्याप्त है।
यह अनुत्तरकर्ता है।
“अकारश्च हकारश्च द्वावेतावेकतः स्थितौ ।
विभक्ति र्नयोरस्ति मारुताम्बरयोरिव ॥”३
यह अनुत्तर परमेश्वर का ही शाक्त विसर्ग है जो कि 'हकार' पर्यन्त स्थूल रूप
से प्रस्फुरित है। वहाँ से इसके प्रत्यावर्तन की स्थिति में शिव, बिन्दु