वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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नामक शक्ति है । इसी 'विसर्ग' के नीचे १००० दलों वाला कमल है—
'विसर्गाधः पद्मं दशशतदलं पूर्णचन्द्रातिशुभ्रम्'१ ब्रह्मरंध्र का ऊर्ध्वदेश ही
'विसर्ग' है ।२
'अहं' एवं 'कामकला'—'अहं' 'सङ्केतपद्धति' में 'अहं' की व्याख्या इस
प्रकार की गई है—
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ।
हकारोऽन्त्यः कलारूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तित ॥
अहं का स्वरूप—
'अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परम शिवः ॥
हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ।
अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्नहमि स्फुटम् ॥'
श्रीकृष्ण ने अपने को अक्षरों में अकार कहा है—'अक्षराणामकारोऽस्मि'
'कामकला'—भास्करराय कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्याभिमुख दर्पण में
उसके भीतर प्रविष्ट किरणों से दो किरणों के सङ्कलन रूप 'तेजोबिन्दु' विशेष
कुड्यादि में प्रादुर्भूत हो जाता है उसी प्रकार प्राणी अदृष्ट के कारण स्वान्तःसंहत
विश्व की सिसृक्षा द्वारा प्रकाशरूप ब्रह्म अपनी स्वयं की शक्ति को देखने के लिए
उसके अभिमुख होकर तदन्तस्तेज रूप में प्रवेश करके शुक्लबिन्दु भाव प्राप्त करता
है और उसके अनन्तर उस बिन्दु में रक्तरूपा शक्ति प्रवेश करती है । उससे
'संमिश्रबिन्दु' उच्छून (फूला हुआ) हो जाता है । वहाँ 'हार्दकला' के रूप में एक
पदार्थ विशेष उत्पन्न हो जाता है । वह गुरुमुखमात्रैक अवगन्तव्य है । वह बिन्दु
समष्टिरूप से एक है—स्फुट है और शिव शक्ति सामरस्य रूप 'काम'-'रवि'—
'अग्निषोमात्मक रवि' कहा जाता है । व्यष्टि रूप में वह दो है । एक रूप है
शुक्ल इन्दु । दूसरा है—रक्त बिन्दु या अग्नि । “बिन्दु” द्वयात्मक होने के कारण
'विसर्ग' कहा जाता है । समष्टि बिन्दु रवि है क्योंकि श्रुतियों में कहा गया है
कि—“रवे रात्रावग्नावमावास्यायां चन्द्रे च प्रवेशस्य” । इस प्रकार १. काम नामक
बिन्दु २. विसर्ग ३. हार्दकला—इन तीन अवयवों से 'कामकला' का आविर्भाव
होता है । यही है 'समस्त सृष्टि बीज' कहलाता है । ('कामकला' = 'समस्त सृष्टि
बीज') ॥ 'अकार हकारयोर्मध्ये सर्ववर्णपाठः' 'अहं'—अ से 'ह' तक की समस्त
वर्णमाला ॥ एतन्मूल ब्रह्म—'तुरीयबिन्दु' कहलाता है ।३
'कामकला' एवं 'अहं' में सम्बन्ध—'तद्रूपाभ्यां शून्य स्वरूपाभ्यामकार
१. षट्चक्रनिरूपण (पूर्णानन्दयति) २. सर्पेण्टपावर—सर जॉनवुडरफ
३. वरिवस्यारहस्यम्—'प्रकाश'