वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
पृष्ठ 363, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 363द्वितीयोऽंशः २६१
द्वितीयोऽंशः २६१
शंखिनी नाड़ी के शिखर प्रदेश में 'विसर्ग' नामक शक्ति है—उसी के नीचे
सहस्रदल कमल है—
'तदूर्ध्वं शंखिन्या निवसति शिखरे शून्यदेशे प्रकाशं ।
विसर्गाधः पद्मं दशशतदलं पूर्णचन्द्रातिशुभ्रम् ॥'
शंखिनी नाड़ी का शिखर प्रदेश ही 'शून्यस्थान' है । यही स्थान सुषुम्णा का
भी ऊर्ध्व देश है । इसी शून्य प्रदेश में सहस्रार भी स्थित है । इस शून्य प्रदेश के
ऊपर 'विसर्ग' नामक शक्ति का अवस्थान है । सहस्रदलकमल विसर्ग के नीचे है ।¹
इस श्लोक में कहा गया है कि हकार चैतन्य से समन्वित बिन्दुओं का मिथुन
'विसर्ग' कहा जाता है । इन सभी की मिश्रित समष्टि 'रवि' है । इसी 'रवि' को
'काम' भी कहते हैं । 'अकार' चैतन्ययुक्त है । 'अकार' एवं 'हकार' शिव-शक्ति
है । हः शिवो गगनं प्राणः ॥ (मातृकाकोश) 'ह'—ह—व्योम । 'हकाराद् व्योम
सम्भूतम् ॥
अकार एवं हकार का स्वरूप—'अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः
प्रकीर्तितः । अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्नहमि स्फुटम् ॥ गीता में भी कहा गया
है—'अक्षराणामकारोऽस्मि ।।²
'अहं' का अर्थ—१. 'मैं' = अस्मत् प्रत्यय । जीव, शिव ॥ २. 'अ' से
'ह' पर्यन्त समस्त वर्ण माला ॥ ३. 'अ' माने शिव 'ह' माने शक्ति = अर्थात्
शिवशक्त्यात्मक निःशेष सत्ता ॥ ४. 'अकारहकारोभयात्मकत्वं शिव शक्तिद्वयरूपत्वं
चाहं पदस्य निष्कृष्टो अर्थः ॥' 'अहं' का वाच्य क्या है? 'तज्जन्यानां सूक्ष्मादि-
स्थूलान्तानामखिल सृष्टीनामहं पदवाच्यत्वम् ॥³ अर्थात् अहं पद से उत्पन्न समस्त
स्थूल-सूक्ष्म सृष्टि 'अहं' का वाच्य है । 'आदिमो अकारः अन्त्यो हकारः तयोः
समाहारः अहम् ॥ अहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतो
ऽहमुत्तरतोऽहमेवं सर्वम् ॥'⁴
अकारहकारस्वभावा ही कामकला भी है—'एवमकार हकारैकस्वरूपा
कामकला ।।'⁵
चन्द्ररूप 'शुक्लबिन्दु' एवं अग्निरूप 'रक्तबिन्दु'—अर्थात् बिन्दुद्वय—को
'विसर्ग' भी कहते हैं । १. कामबिन्दु २. विसर्ग ३. हार्धकला—से युक्त अखण्ड
पदार्थ 'कामकला' कहलाता है । अकार एवं हकार से उत्पन्न 'कामकला' अहंपद
का वाच्य है ।
योगशास्त्र में कहा गया है कि शंखिनी नाड़ी के शिखर प्रदेश अर्थात्
'शून्यस्थान' (सुषुम्णा का ऊर्ध्व देश) में स्थित सहस्रार के ऊर्ध्व देश में 'विसर्ग'
१. षट्चक्रनिरूपण २-३. भास्करराय—'प्रकाश'
४. छान्दोग्य० ५. भास्करराय—'प्रकाश'