वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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करते। उन्मना के ऊपर—उन्मना को भेद करने के साथ-साथ नाद लीन होता है।
उस स्थिति में तत्त्वबोध या आत्मसाक्षात्कार स्वभावतः होता है। अतः 'तत्त्वविषुव'
को ही चैतन्य का अभिव्यक्ति स्थान कहना सङ्गत है। ६ शून्यों, ५ अवस्थाओं
एवं ६ विषुवों से परे है—विश्व की परम विश्रान्ति या परम शिव की अवस्था।
उन्मना तक सभी मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चरित होने से नाद का अन्त एवं
तत्त्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है।
समनोर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्यात्यन्तं सूक्ष्मतमस्य नादस्योन्मन्यां लयः कालविषुव-
मित्याह—
समनागतमुन्मन्यामेते द्वे शक्तिकालविषुवाख्ये ।
श्रीविद्याकूटावयवेषु ककारादिषून्मनान्तेषु ॥ ४९ ॥
अकुलादिकोन्मनान्तप्रदेशसंस्थेषु सकलेषु ।
अध्युष्ठनिमेषोत्तरसप्तदशाधिकशतत्रयत्रुटिभिः ॥ ५० ॥
उच्चरिते नादे सति तस्यान्ते तत्त्ववेदनं भवति ।
तदिदं चैतन्याभिव्यक्तिनिदानं तु तत्त्वविषुवाख्यम् ॥ ५१ ॥
('तत्त्वविषुव' का स्वरूप)
समना एवं उन्मनी में लयीभूत नाद की इन दोनों अवस्थाओं की आख्या
क्रमशः 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' है। ककार से लेकर उन्मना तक एवं अकुल
से लेकर उन्मना तक प्रदेशों में विद्यमान श्रीविद्याकूटों के भागों (अङ्गों) को व्याप्त
करके समस्त ३१७ त्रुटियों एवं साढ़े तीन निमेषों को व्याप्त करता हुआ नाद
तत्त्वज्ञान का कारण होता है। वह यह शुद्ध चैतन्य की अभिव्यक्ति का मूल हेतु
'तत्त्वविषुव' नाम वाला है ॥ ४९-५१ ॥
- प्रकाश *
उक्तेषु द्वात्रिंशत्पद्मेष्वधस्तनद्वयं चरमं चाकुलपद्मानि । शेषाणि कुलपद्मानि । तेषु
यद्यपि मूलाधाराख्यात् कुलपद्मादेव विद्याक्षराणारम्भः, तथापि चक्रराजस्य
सकलाख्यभावनाया अधस्तनसहस्रदलकमलमारभ्यैव 'अकुले विषुसंज्ञे च' इत्यादिना
चतुःशत्यामुक्तत्वात् कुलाकुलविद्ययोरभेदेन श्रीविद्याया अपि तत आरम्भोक्तिस्तन्त्रेषु ।
अध्युष्ठं सार्धत्रयम् । निमेषो लोचनस्पन्दकालः । तस्य त्रिसहस्रतमो ऽंशस्त्रुटिः,
'स्वस्थे नरे समासीने यावत् स्पन्दति लोचनम् ।
तस्य त्रिंशत्तमो भागस्तत्परः परिकीर्तितः ।
तत्परस्य शतांशस्तु त्रुटिरित्यभिधीयते ॥'
इति वचनात् । एवं च (१०८१७) अयुतोत्तराष्टशतोत्तरसप्तदशत्रुटिपर्यन्तं
विद्यावयवस्थानसंलग्नतापूर्वकं नादोच्चारणे कृते सति, तत्त्वस्य स्वसंविदभेदस्य बोधो
भवति । तदिदमुच्चारणं तत्त्वविषुवम् ॥ - ४९-५१ ॥