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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 530 में से

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पृष्ठ 303

प्रथमोऽंशः २०१
विस्तार और व्यापकता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
सृष्ट्युन्मुखीशब्द
धारा—
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
सोहं पुरुष का शब्द ——
सत्त पुरुष का शब्द —
(केन्द्र से बाहर की ओर प्रवाहित)
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
बन्धन क्रम
भीतर से बाहर की ओर प्रवाहित
→ → → → →
सूक्ष्मता और अन्तर्मुखता की दृष्टि से शब्द-स्तर (नाद-स्तर)
जीव और मन का शब्द ———————
वैराट पुरुष का शब्द ——————
माया और ब्रह्म शब्द —————
ब्रह्म शब्द ————
पारब्रह्म का शब्द ———
प्रलयोन्मुखीशब्द धारा—
सोहं पुरुष का शब्द ——
(केन्द्र की ओर प्रवाहित)
सत्त पुरुष का शब्द —
अननुमेय, अत्यन्त गुप्तशब्द —
मुक्ति-क्रम
बाहर से भीतर की ओर प्रवाहित
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