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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 530 में से

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पृष्ठ 304

२०२ वरिवस्यारहस्ये

  • प्रकाश *
    शक्तिस्थानादूर्ध्वं पुनरुज्जीवितस्य नादस्य सूक्ष्मतमस्य व्यापिकामुलङ्घ्य
    समनायां लयः शक्तिविषुवमित्यर्थः ॥ ४८ ॥
  • सरोजिनी *
    शक्तिविषुव काल विषुव—प्राण, आत्मा एवं मन के परस्पर योग की
    'प्राणविषुव' एवं नाद को अपनी निजी आत्मा समझकर भावना करना 'मन्त्रविषुव'
    कहलाता है । शक्तिमध्यगत नाद के समना पर्यन्त चिन्तन की 'शक्तिविषुव' कहते
    हैं । शक्ति में नादान्त पर्यन्त मन्त्रावयवों की लय भावना 'प्रशान्तविषुव' है ।
    कालातीत उन्मनापर्यन्त नाद के चिन्तन को 'कालविषुव' कहते हैं ।
    'शैवतन्त्र' में 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' की व्याख्या करते हुए कहा गया
    है—'शक्तिमध्यगतो नादः समनान्तं प्रसर्पति । तच्छक्तिविषुवं प्रोक्तमुन्मन्यां काल-
    संज्ञितम् ।।'१
    आचार्य भास्कर 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को इस प्रकार परिभाषित करते
    हैं—'अथ लीयमानस्य दीपादेः सूक्ष्मीभूय पुनः स्थूलीभावदर्शनान्तदनुसारेण शक्तौ
    लीनस्य नादस्य पुनरुज्जीवनेन व्यापिकामुत्क्रम्य समनायां लय चिन्तनं शक्तिविषुवम् ।
    ततः पुनरुज्जीव्योन्मन्यांलयः 'कालविषुवः' ।२
    आचार्य अमृतानन्दनाथ 'शक्तिविषुव' एवं 'कालविषुव' को परिभाषित करते हुए
    कहते हैं—तदूर्ध्वं शक्तेरूर्ध्वं समनान्तं नादस्य विचिन्तनं 'शक्तिविषुवं । तदूर्ध्वं
    समनाया अप्यूर्ध्वम् । 'नात्र काल कलाभानम्' इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या कालातीतो-
    न्मनान्तं नादस्य विचिन्तनं कालविषुवं ।।३
    'योगिनीहृदय' में 'शक्तिविषुव'—'कालविषुव' की इस प्रकार परिभाषा दी गई
    है—
    'विषुवशक्तिसंज्ञं तुदूर्ध्वं नाद चिन्तनम् ।
    तदूर्ध्वं कालविषुवमुन्मनान्तं महेश्वरि ।।'४
    शक्ति के मध्यगत नाद से समनापर्यन्त चिन्तन को 'शक्ति विषुव' कहते हैं ।
    यहाँ तक काल की क्रीड़ा है क्योंकि समना तक ही काल की सीमा है उसके आगे
    'उन्मना' में नहीं ।
    कालविषुव के बाद 'तत्त्वविषुव' अङ्गीकृत होता है । नाद ही तत्त्व का
    अभिव्यञ्जक है । लेकिन जब तक नाद का वास्तविक अन्त नहीं होता तब तक
    तत्त्व बोध नहीं होता । नादान्त तो दूर की बात शक्ति में या समना में भी नाद
    का अन्त नहीं होता । शाक्त योगी उन्मना को भी नाद का अन्त स्वीकार नहीं
    १. शैवतन्त्र २. भास्कराचार्य—सेतुबन्ध श्लो० १८७
    ३. अमृतानन्दनाथ—'योगिनीहृदयदीपिका' ४. योगिनीहृदय