वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः २०७
‘शून्यषट्कं तथा देवि! ह्यवस्थापञ्चकं पुनः ॥ १०६ ॥
विषुवं सप्तरूपं च भावयन् मनसा जपेत् ॥¹
जप के अङ्ग
५ अवस्थाएँ ६ शून्य ७ विषुव ९ चक्र १५ मन्त्रार्थ वर्णोच्चारण
आदि विद्या के
आन्तरिक अङ्ग
विद्या के वर्णों की संख्या | उद्धार | काल (मात्रा) | उच्चारण | स्थान | प्रयत्न | रूप | विभिन्न आकार स्थितियाँ आदि
आदि विद्या के
बाह्य अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
‘मन्त्र’ = वाचक । देवता = (वाच्य) ॥
‘सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी’ (‘ललिता सहस्रनाम’) ‘परावाक्’
चैतन्यरूपा है—पराप्रत्यकचितिरूपा । पश्यन्ती परदेवता । मध्यमा वैखरी रूपा
भक्तमानस हंसिका ॥ (ल०स०) ‘मन्त्र’ अपने मूल स्वरूप में परावाक् के रूप में
रूपान्तरित हो जाते हैं इसीलिए मन्त्रों को चैतन्य की किरणें कहा गया है—
‘‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥’’ जहाँ चैतन्यत्व नहीं वहाँ मन्त्रत्व नहीं ।
१. ‘विज्ञान भैरव’ में जप की दृष्टि—‘विज्ञानभैरव’ में मन्त्राक्षरों के उच्चारण
की अखण्ड आवृत्ति को ही ‘जप’ का पर्याय स्वीकार न करके जप के वैज्ञानिक
स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है—
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ १४२ ॥²
१. योगिनीहृदय २. विज्ञान भैरव (शिव)