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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 530 में से

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पृष्ठ 307

प्रथमोऽंशः २०५

  • प्रकाश *
    अवस्थादिचतुष्टये संख्याचतुष्टयस्य क्रमादन्वयः । नादत्रयस्य चक्रत्रयात्मकत्व-
    भावनं प्रागुक्तम् । चक्रसङ्केते त्वन्यदपि त्रयमुक्तम्—चक्रभावनं त्रिविधं सकलं निष्कलं
    सकलनिष्कलं चेति । अकुलसहस्रारं मूलाधारादिपञ्चकं सूक्ष्मजिह्वा भ्रूमध्यं बिन्दुस्थानं
    चेति नवसु स्थानेषु त्रैलोक्यमोहनादिचक्रनवकभावनं सकलम्, बिन्दाद्युन्मन्यन्तं
    तद्भावनं द्वितीयम्, महाबिन्दावेव तद्भावनं तृतीयमिति । मनोर्मन्त्रस्यार्थानिनुसंदधानस्य
    विद्याया अर्णनामक्षराणामष्टपञ्चाशतो मध्य आद्यकूटद्वितयबिन्दादिनवकद्वयप्रहाणेना-
    वशिष्टानां चत्वारिंशतोऽक्षराणामुच्चारणं जपो जपपदवाच्यमित्यर्थः ॥ ५२ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘अवस्था’—अवस्थायें पाँच हैं—(१) जाग्रत (२) स्वप्न (३) सुषुप्ति (४)
    तुरीय, (५) तुरीयातीत । ‘शून्य’—प्रणव रूप मन्त्र के बारह अङ्गों में प्रति द्वितीय
    अङ्ग शून्य कहलाता है । ‘विषुवन्ति’—सात विषुव हैं । यथा—‘प्राणविषुव’,
    ‘मन्त्रविषुव’, ‘नाड़ीविषुव’, ‘प्रशान्तविषुव’, ‘शक्तिविषुव’, ‘कालविषुव’ एवं ‘तत्त्व-
    विषुव’ । ‘चक्र’ नौ हैं—(१) त्रैलोक्यमोहन (२) सर्वाशापरिपूरण (३) सर्वसंक्षोभण
    (४) सौभाग्यदायक (५) सर्वार्थसाधक (६) सर्वरक्षाकर (७) सर्वरोगहर (८)
    सर्वसिद्धिप्रद (९) सर्वानन्दमय चक्र ॥
    ‘चक्राणि’ = १. ‘सकल’ २. ‘निष्कलं’ ३. ‘सकलनिष्कलं’ ॥ अकुल
    सहस्रार, मूलाधारादिपञ्चक, सूक्ष्मजिह्वा, भ्रूमध्य बिन्दु स्थान—नौ स्थानों में—
    त्रैलोक्यमोहनादि चक्र नवक भावन तो ‘सकल’ हैं । बिन्दादि उन्मन्यन्त चक्रों में
    उनका भावन ‘निष्कलं’ है । महाबिन्दु में उनका भावन ‘सकलनिष्कलं’ है ।
    मन्त्रार्थानुसंधानपूर्वक ‘वर्णों’ (अक्षरों), का उच्चारण ‘जप’ कहलाता है किन्तु उसके
    साथ अवस्था, शून्य, विषुव एवं चक्रों का भी ध्यान रखना, आवश्यक होता है ।
    ‘अर्थाश्च’—मन्त्रार्थ के प्रकार पन्द्रह हैं—(१) प्रतिपाद्यार्थ (२) भावार्थ (३)
    संप्रदायार्थ (४) निगर्भार्थ (५) कौलिकार्थ (६) रहस्यार्थ (७) महातत्वार्थ (८)
    नामार्थ (९) शब्दरूपार्थ (१०) नामैकदेशार्थ (११) शाक्तार्थ (१२) सामरस्यार्थ
    (१३) समस्तार्थ (१४) सगुणार्थ (१५) महावाक्यार्थ ॥
    ‘जप’—‘योगिनीहृदय’ में भी जप-विधान है—‘पुष्पाञ्जलिं ततः कृत्वा जपं
    कुर्यात् समाहितः ॥’१ इस ‘जप’ का लक्षण क्या है? ‘समाहितो नियतेन्द्रियों
    नादरूपमन्त्रोच्चारणलक्षणं जपं कुर्यात् ॥’ ‘मन्त्र’ नादरूपात्मक है । अतः
    नादोत्थानपूर्वक मन्त्राक्षरों का उच्चारण ही ‘जप’ है ।२
    ‘योगिनीहृदय’ में जप-विधान में भी शून्यषट्क, अवस्थापञ्चक एवं विषुव
    सप्तक के योग को महत्व दिया गया है—
    १. योगिनीहृदय २. अमृतानन्द—‘दीपिका’