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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 530 में से

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पृष्ठ 293

प्रथमोऽंशः १९१

  • प्रकाश *
    प्राथमिककूटनादे बीजचतुष्कस्यैक्यम्, स्वस्यात्मनस्वाधारोत्थितनादेन सहैक्यं न
    प्राथमिकेनानाहतादारब्धेन सह,
    'आधारोत्थितनादे तु लीनं बुद्ध्वात्मरूपकम् ।
    संयोगेन वियोगेन मन्त्राणां महेश्वरि ॥
    अनाहताद्याधारान्तं नादात्मत्वविचिन्तनम् ।
    विषुवम् .............................. ॥'
    इति कादिमतीयवचनात् । संयोगेन समष्ट्या । वियोगेन व्यष्ट्या । चतुर्विधानामिति
    शेषः । आधाराणामन्तो ब्रह्मरन्ध्रम् । आधारान्तान्तमिति तन्त्रेणान्तपदद्वयसत्त्वाद्-
    ब्रह्मरन्ध्रान्तमित्यर्थकत्वेन व्याचक्षते । आ आधारान्तादित्यर्थक आङ्प्रश्लेषे तु सर्वं
    सुस्थम् ॥ ४४, ४४- ॥
  • सरोजिनी *
    मन्त्र सङ्केत एवं मन्त्र के विविध अर्थ—'योगिनीहृदय' के 'मन्त्र-सङ्केत' नामक
    द्वितीय पटल में 'मन्त्रसङ्केत' के नाम से मन्त्रार्थों का निरूपण किया गया है।
    'मन्त्रसङ्केत' के ६ प्रकार हैं—
    (१) मन्त्रसङ्केतस्तस्य नानाकारो व्यवस्थितः ।
    (२) षड्विधस्तं तु देवेशि कथयामि तवानघे ।
    (३) (क) भावार्थ (ख) सम्प्रदायार्थ (ग) निगर्मार्थ (घ) कौलिकार्थ (ङ)
    सर्वरहस्यार्थ (च) महातत्त्वार्थ ॥ योगिनीहृदय (मन्त्रसङ्केत निरूपणम्)
    मन्त्रविषुव का तात्पर्य है अभिव्यज्यमान नाद को जापक की अपनी आत्मा
    मानकर भावना करना ॥
    'योगिनीहृदय दीपिकाकार' कहते हैं—मूलाधारस्थित वाग्भव शिखरवर्तिनं नादं
    हृदयपर्यन्तमुच्चार्य तत्र स्वयं लीनो भूत्वा स्वात्मनस्तन्मयतानुसंधानं मन्त्रविषुव-
    मित्यर्थः ॥'१ मूलाधारस्थित वाग्भवशिखरवर्ती नाद को हृदयपर्यन्त उच्चारित करके
    वहीं स्वयं लीन होकर अपनी आत्मा की उसके साथ की गई तन्मयता का
    अनुसन्धान करना 'मन्त्रविषुव' है ।२ 'शैवतन्त्र' में कहा भी गया है—
    आत्मना नादमध्ये तु लयं सञ्चार्य तत्त्वतः ।
    अकारोकार वर्णादिसंयोगेन वियोगतः ।
    हृदयादि बिलान्तं च विषुवमन्त्र संशकम् ॥३
    हृदय से ब्रह्मरंध्रपर्यन्त इसकी व्याप्ति है—‘‘हृदयाद ब्रह्मरंध्रान्तं विषुवमन्त्र
    संज्ञकम् ॥’’ भास्कराचार्य कहते हैं—'नादं वाग्भवान्त्यस्थानमारभ्य हृदयस्थं कामराज-
    १-२. अमृतानन्द योगी—'दीपिका' ३. शैवतन्त्र