वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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प्रथमोऽशः १८७
- सरोजिनी *
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के तृतीय कूट—'स क ल ह्रीं' के रेफ, बिन्दु, रोधिनी,
नादान्त एवं व्यापिका में पाँच शून्य अवस्थित हैं । ये उसी प्रकार स्थित हैं जैसे
कि मोर के पङ्खों में चन्द्राकार आकृति ॥
'स क ल ह्रीं' के 'रेफ', 'बिन्दु', 'रोधिनी', 'नादान्त' एवं 'व्यापिका' में ५
शून्यों की अवस्थिति ।
महानाद या नादान्त—ये ब्रह्म का प्रथम क्रियात्मक विकास कहा जा सकता
है । 'नाद' वह स्वरूप है जो सारे विश्व को नादान्त से भरे हुए हैं । यह नादान्त
की पूर्णावस्था है । निरोधिनी नाद की वह अवस्था है जिसमें बिन्दु को विकसित
करने की क्षमता रहती है । नाद की सूक्ष्मावस्थायें भी हैं—इनमें निष्कल उन्मनी
अन्तिम है—
नाद की अवस्थायें
| प्रथमा-वस्था | द्वितीया-वस्था | तृतीया-वस्था | चतुर्थ अवस्था | पञ्चम अवस्था | छठवीं अवस्था | सातवीं अवस्था | आठवीं अवस्था | नवीं अवस्था |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| 'बिन्दु' | 'अर्धचन्द्र' | 'रोधिनी' | 'नाद' | 'नादान्त' | 'शक्ति' | 'व्यापिका' | 'समना' | 'उन्मना' |
बिन्दु के बाद शक्तियाँ सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप धारण करती चली जाती हैं और
अन्त में उन्मनी अवस्था (अनुत्पन्न निस्पंद वाक्) आ जाती है । 'उन्मनी' =
कारणरूपा शक्ति की अवस्था है । इस अवस्था में—काल, कला, देवता आदि
किसी का भी आभास नहीं रह जाता । यह 'स्वनिर्वाणपद' है—निर्विकल्प निरञ्जन
शिवशक्ति है । १ "Unmani is Nirākār and Nirucchār soundless and
without ulterance defined by any adjective, being beyond mind and
speech and universe" २ यह अवाङ्मनसगोचरा, निराकार, निरुच्चार, निरूप
अवस्था है ।
कुछ तांत्रिकों ने बिन्दु से भी ३ नादों की उत्पत्ति बतायी है—ये निम्न हैं—
(१) 'सूक्ष्मवाद' (२) 'अक्षरनाद' (३) 'वर्णनाद' । (क) 'सूक्ष्मनाद' = अचिन्त्य,
अभिधेय बुद्धिका कारण एवं बिन्दु का प्रथम प्रसार है । (ख) 'अक्षरनाद' = यह
सूक्ष्मनाद का कार्य है और परामर्श ज्ञान समन्वित है । (ग) 'वर्णनाद' = इसकी
उत्पत्ति आकाश एवं वायु से होती है । कुण्डलिनी भी नादरूपा है । नाद-बिन्दु ।
बिन्दु = वेदान्त का ईश्वर । 'नाद' शक्ति का एक रूप है । बिन्दु भी शक्ति का
एक रूप है । नाद-बिन्दु में क्रिया शक्ति है ।
१-२. गारलैण्ड ऑफ लेटर्स (आर्थर एवेलॉन)