वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः १८९
ईश्वर (बिन्दु)
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शुद्ध विद्या (बिन्दु)
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नाद-ज्येष्ठा बीज-वामा बिन्दु-रौद्री
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ब्रह्मा-इच्छा विष्णु-क्रिया रुद्र-ज्ञान
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ब्राह्मी-क्रिया वैष्णवी-ज्ञान गौरी-इच्छा
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सूर्य-प्राण अग्नि-चिति चन्द्र-मन
(१) ब्रह्म को बिन्दु, शक्ति को कला एवं जीव को नाद समझकर ५ प्रकार
का ऐक्य भी स्थापित किया जाता है।
(क) जीव—ब्रह्मैक्य भाव । (ख) ब्रह्म—सृष्टि-प्रभव ।
(ग) तृतीय—देहाध्यास । (घ) चतुर्थ—प्रलय ।
(ङ) पञ्चम—जीवोत्पत्ति ।
बिन्दु से नाद का सम्बंध न बताने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्म कभी जीव
नहीं बनता, आत्मा सदा ब्रह्मस्वरूप है, जीवभाव एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।
(१) हृल्लेखा के उच्चारण होने पर जो अनुनासिक ध्वनि उक्त ९ स्तरों से
होती हुई उन्मनी में समाप्त हो जाती है । उसके उच्चारण काल की मात्रा उत्तरोत्तर
आधी होती जाती है ।
(२) सभी के योग का काल १/२ मात्रा होता है जो बिन्दु की आधी मात्रा
सहित पूरी एक मात्रा बनती है अर्थात्—
१/२ + १/४ + १/४ + १/१६ + १/३२ + १/६४ + १/१२८ + १/२५६ + १/२५६ = १ मात्रा
(३) पञ्चदशी के ३ अनुस्वार ३ बिन्दु हैं ।
(४) हृल्लेखा, नाद एवं १५ अक्षर १५ कलायें हैं ।
(५) नाद, बिन्दु, कला = ‘त्रिबिन्दु’
(६) श्रीचक्र त्रिधा विभक्त—नाद । बिन्दु । कला ।
(७) बिन्दु को शिवशक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय तो शक्त्यात्म
बिन्दु ही ‘बीजि’ है । दोनों से शब्दब्रह्म, नादोत्पत्ति एवं शब्द से कला (अर्थात्मक
सृष्टि) की उत्पत्ति होती है ॥ ४२ ॥