वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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‘प्राणविषुवाख्यः’—प्राणविषुव नामक ।। ‘प्राणविषुव’ क्या है?
प्राण, आत्मा एवं मन के पारस्परिक योग को ‘प्राणविषुव’ कहते हैं । ‘योगः
प्राणात्ममनसां विषुव प्राणसंज्ञितम् ।।१’
अमृतानन्दनाथ इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—‘प्राणस्य हकारात्मनो
वाटवात्मनो यष्ठर्मनसश्च संयोगः प्राणविषुवमित्युच्यते ।।२ ‘शैवतन्त्र’ में कहा गया है—
‘शिष्यात्म प्राणमनसां संयोगं प्राणकं बिन्दुः ।।’ आचार्य भास्कर इसकी व्याख्या करते
हुए कहते हैं—‘वस्तुतस्तुमूलाधारे ब्रह्मेति प्रसिद्धस्य खस्य वायु कुण्डली
संयोगात्तद्व्युत्पत्तिः स एव खो नाभिपर्यन्तमागत्य पवनेन मनसा च युज्यते । स एव
हृदयमागतः पवनेन बुद्ध्या च संयुज्यते । अतः स एव स्थानत्रये परा-पश्यन्ती-
मध्यमेति नामत्रयं क्रमेण मजत इति सौभाग्यभास्करे कर्णितमस्माभिः । इदमेव प्राण-
विषुवपद वाच्यमिति स्थानत्रये मिलित्वैका भावनेति ज्ञेयम् ।।'
‘उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम्’३—उन्मनी षष्ठ शून्य है । यह
‘महाशून्य’ कही जाती है ।
स्वच्छन्दागम के मतानुसार शून्यों की स्थिति इस प्रकार है—(१) ‘ऊर्ध्व
शून्य’—शक्तिप्रद जहाँ नादान्त तक निःशेष पाश प्रशान्त हो गए हैं । (२) ‘अधः
शून्य’ = हृदयक्षेत्र; जहाँ अभी तक प्रपञ्चोल्लास नहीं हुआ है । (३) ‘मध्यशून्य’
= कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट एवं ब्रह्मरंध्र ही शक्तिस्थान है । व्यापिनी चतुर्थ
शून्य है । तीन शून्य चल एवं हेय है । ‘समना’ में पञ्चम शून्य एवं ‘उन्मना’ में
षष्ठ शून्य है । ये भी चल एवं हेय हैं । उन्मना में भी यत्किंचित चलत्व है ।
परमशिवाधिष्ठित होने से सभी शून्य सिद्धिप्रद है । स्वच्छन्द शास्त्र के अनुसार ६
शून्यों का त्याग करके सातवें में प्रवेश आवश्यक है । वही वास्तविक परमपद है ।
६ शून्य अवस्थायें हैं—सातवाँ ही योगियों का लक्ष्य है—‘अशून्यं शून्यमित्युक्तं
शून्यं चाभाव उच्यते । अभावः स समुद्दिष्टः यत्र भावाः परं गताः ।।' यह सप्तम
शून्य ही अखण्ड महासत्ता महाशून्य है ।
मन्त्रविषुवमाह—
प्राथमिककूटनादे त्वनाहताद् ब्रह्मरन्ध्रान्ते ।
व्यष्टिसमष्टिविभेदाद् बीजचतुष्कस्य च स्वस्य ।। ४४ ।।
ऐक्येन नादमयताविभावनं मन्त्रविषुवाख्यम् ।
(‘मन्त्रविषुव’ का स्वरूप)
प्रथम कूट के नाद एवं व्यष्टि-समष्टि के भेद से अनाहत से आरंभ करके
ब्रह्मरंध्र तक उत्पन्न होने वाला नाद एवं चारों बीज तथा आत्मा के नादमय
विभावना की ‘मन्त्रविषुव’ संज्ञा है ।। ४४, ४४- ।।'
१. योगिनीहृदय (१८२) २. दीपिका
३. सेतुबन्ध (श्लो० १८५)