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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 530 में से

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पृष्ठ 287

प्रथमोऽंशः १८५
चक्र
'वाग्भवकूट' 'कामराजकूट' 'शक्तिकूट'
१) त्रैलोक्यमोहन १) सर्वसौभाग्यदायक १) सर्वरोगहर
२) सर्वाशापरिपूरकम् २) सर्वार्थसाधक २) सर्वसिद्धिप्रद
३) सर्वसंक्षोभण भूपुर ३) सर्वरक्षाकर ३) सर्वानन्दमय
षोडशदल, अष्टदल ४) चतुर्दशार, बहिर्दशार, सर्वानन्दमय
अन्तर्दशार ४) अष्टार, त्र्यश्र,
बिन्दु
वाक्चतुष्टय (मातृका)
'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' 'वैखरी'
(मूला) (नाभि) (हृदय) (कण्ठ)
(धार चक्र) (मणिपूरक चक्र) (अनाहत चक्र) (विशुद्ध चक्र)
आनन्दैकघनत्वं यद्वाचामपि न गोचरो नृणाम् ।
तुर्यातीतावस्था सा नादान्तादिपञ्चके भाव्या ॥ ४१ ॥
(तुर्यातीतावस्था का स्वरूप)
(वह) आनन्दैकघन अवस्था जो मनुष्यों की वाणी से परे है 'तुर्यातीतावस्था'
(कहलाती) है । उसकी 'नादान्त' आदि पञ्चवर्णों में भावना करनी चाहिए ॥ ४१ ॥

  • सरोजिनी *
    इस श्लोक में 'तुर्यातीतावस्था' के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है ।
    (१) 'तुर्यातीतावस्था' आनन्दैकघन, अवाङ्मनसगोचर अवस्था है ।
    (२) 'तुर्यातीतावस्था' नादान्त आदि पाँच वर्णों में स्थित है ।
    अवस्थापञ्चकं निरूप्य शून्यषट्कं निरूपयति—
    तार्तीयीके रेफस्थाने बिन्दौ च रोधिन्याम् ।
    नादान्तव्यापिकयोश्चन्द्रकतुल्यानि पञ्च शून्यानि ॥ ४२ ॥
    उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं चिन्त्यं महाशून्यम् ।
    क्रमात् प्राप्तानि सप्त विषुवन्त्याह—
    प्राणात्ममानसानां संयोगः प्राणविषुवाख्यः ॥ ४३ ॥