वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
प्रथमोऽंशः ७७
यह मन्त्र समस्त मन्त्रों का मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्र में 'पञ्चदशी'
'श्रीविद्या' आदि के नाम से प्रख्यात है । इसके छः प्रकार के अर्थ हैं—भावार्थ,
वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, लौकिकार्थ, रहस्यार्थ, तत्वार्थ ।¹ इसमें जो 'ह्रीं' अक्षर है वह
देवी का बीज है—यह स्वतन्त्र रूप में एक मन्त्र है—यह मन्त्र देवी प्रणव है—
ओंकारवत व्यापक अर्थों से परिपूरित है । इसका संक्षिप्त अर्थ है—
इच्छा-ज्ञान-क्रिया, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत, शिवशक्तिस्फुरण । इसी
के विषय में 'श्रीदेव्यथर्वशीर्ष, में कहा गया है—'वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्र
समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ।।'
वियत् (आकाश) = 'ह' । 'ईकार' । 'वीतिहोत्र' (अग्नि) अर्थात् 'र' ।
'अर्धचन्द्र' अर्थात् ( ँ ) । 'एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्ध चेतसः । ध्यायन्ति
परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ।।' यह 'ह्रीं' नामक देवी प्रणव 'एकाक्षर ब्रह्म' है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं ² कि यद्यपि 'तन्त्रराजतन्त्र' एवं शङ्कराचार्य की
'सौन्दर्यलहरी' में हादि विद्या का ही 'प्रथमोद्धार दिखाई पड़ता है'—अर्थात् उसको
ही प्राधान्य प्रदान किया गया है तथापि शास्त्रों में तो यह कहा गया है कि—'मन्त्रों
में श्रीविद्या एवं उसमें भी कादि विद्या प्रमुख है'—'श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र
कादिर्यथा परा ।।'
भास्करराय कहते हैं कि विद्याओं में 'कादिविद्या' ही प्रमुख है क्योंकि—
१. श्रीविद्यैव तु मन्त्राणां तन्त्र कादिर्यथा परा'
२. 'यदक्षरैकमात्रेऽपि' (षोडशीघटक)
३. 'यदेकादशमाधारम्' (रहस्यार्थ प्रतिपाद्याक्षरशालित्व के कारण)
४. 'त्रिपुरोपनिषद' के एतन्मूलक एवं प्राधान्यप्रद होने के कारण
५. 'योगिनीहृदय' आदि ग्रन्थों में इसके प्राधान्य के कारण
६. शाङ्खायन श्रुति में 'चत्वार ई विभ्रति' में कादि विद्या को प्राधान्य दिये
जाने के कारण—
७. 'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला
मायया च पुरुच्येषा विश्वमातादिविद्या, —इस शाङ्खायन श्रुति में 'काम'
शब्द के प्रतीकात्मक प्रयोग के कारण 'कादिविद्या' ही अधिक प्रशस्त एवं
प्रमुख है ।
'कादि विद्या'—कामराजविद्या ककादिपञ्चदशवर्णात्मक है । इसीको कादि
विद्या' भी कहते हैं । तन्त्रराज तन्त्र में शिवजी देवी से कहते हैं—'हे देवी पार्वती ।
कादिविद्या तुम्हारा स्वरूप ही है । और उससे सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती
१. 'नित्यषोडशिकार्णव' 'वरिवस्यारहस्यम्'
२. प्रकाश
७८ वरिवस्यारहस्ये
है ।।' कादिविद्या का उद्धार आथर्वणात्रिपुरोपनिषद में—'कामोयोनिः.... विश्वमातादि
विद्या' द्वारा किया गया है ।
'लोपामुद्रा विद्या' ही 'हादिविद्या' है । यह भी पञ्चदशवर्णात्मिका है ।
कामेश्वराङ्कस्थिता कामेश्वरी के पूजामन्त्रों में 'कादि' एवं 'हादि' दोनों विद्याओं से
युक्त नाममन्त्र की योजना प्रचलित है । मनु, चन्द्र, कुबेर, अगस्ति, अग्नि, सूर्य,
इन्द्र, स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा) १० विद्यायें केवल आम्नायपाठ मात्र
में उल्लिखित है । प्रचलित उपासना-पद्धतियों में उनका विशेष उपयोग नहीं है ।
वस्तुतः श्रीविद्या के १२ सम्प्रदाय थे । जो निम्न है—'मनुश्चन्द्रः कुबेरश्च लोपामुद्रा
च मन्मथः । अगस्तिः सूर्यश्च इन्द्रः स्कन्दः शिवस्तथा । क्रोधभट्टारको देव्या
द्वादशामी उपासकाः ॥'
इनमें से मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्ति, अग्नि, सूर्य, इन्द्र,
स्कन्द, शिव एवं क्रोधभट्टारक (दुर्वासा)—सभी बारहों श्रीविद्या के उपासकों का
पृथक्-पृथक् अपना सम्प्रदाय था किन्तु इनमें चतुर्थ और पञ्चम (लोपामुद्रा एवं
मन्मथ) को छोड़कर अन्य सम्प्रदाय प्रचलित नहीं है । इनमें भी 'कामराजविद्या'
(मन्मथ सम्प्रदाय) का ही अधिक प्रसार है । 'त्रिपुरारहस्य' के माहात्म्यखण्ड के
अनुसार कामदेव ने भगवती त्रिपुरा की निर्व्याज, एकनिष्ठ उपासना करके उनसे जो
वर प्राप्त किए उसमें स्वोपासित 'कामराजविद्या' के उपासकों के लिए बहुत अधिक
सुविधायें प्राप्त करा दीं अतः 'कादि विद्या' अधिक प्राधान्य प्राप्त कर गई ।
'कामकलाविलास' के टीकाकार नटनानन्दनाथ ने 'चिद्वल्ली' में कहा है कि—
'इह श्रीविद्यारत्नागमे सन्तानद्वयमस्ति । कामराज सन्तानो लोपामुद्रासन्तानश्चेति ।
कामराजसन्तानक्रमस्तु सकल विद्यानुसन्ध्यविच्छिन्न इति प्राचीनगुरवोऽप्याचक्षते ।
लोपामुद्रासन्तानक्रमस्तु विच्छिन्नतया प्रवर्तत इति वर्णयन्ति ।।' इस प्रकार
नटनानन्दनाथ—(१) 'कामराज विद्या' (कादि विद्या) एवं (२) 'लोपामुद्रा विद्या'
(हादि विद्या) दो का ही उल्लेख करते हैं ।
'कामराज विद्या' (कादि विद्या)—यह विद्या ककारादिपञ्चदशवर्णात्मिका है
इसीलिए इसका नाम 'कादिविद्या' है । 'लोपामुद्रा' ऋग्वेद के अन्यतम ऋषि हैं
(ऋग्वेद १।१७९।१-२) ।
पञ्चदशाक्षरी विद्या—
(क) 'वाग्भवकूट' (आद्य खण्ड) : क ए ई ल ह्रीं ।—कादि विद्या ।
(प्रथम खण्ड)
(ख) 'कामकूट' : ह स क ह ल ह्रीं । हादि विद्या (द्वितीय खण्ड)
(ग) 'शक्तिकूट' : स क ल ह्रीं । सादि विद्या (तृतीय खण्ड)
१. 'लोपामुद्राविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
२. 'क्रोधमुनिविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
प्रथमोऽंशः ७९
३. 'मानवीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह
ल ह्रीं ।
४. 'चान्द्रीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह स क
ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
५. 'कौबेरीविद्या'—ह, स, क, ह, ल, ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह, स, क,
ह, ल, ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह, स, क, ह, ल, ह्रीं ।
६. 'अगस्त्यविद्या'—ह ह स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं ।
७. 'नन्दिविद्या'—ह, ह, स क ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल
ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं ।
८. 'प्रभाकरीविद्या'—क ए ल ह्रीं, ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह
ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, ह स स क ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
९. 'षण्मुखीमुद्रा'—ह्रीं, क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, सोहं
क्लीं हंसः, ह्रीं, हंसः सोहं हंसः । ह्रीं क्लीं हंसः, क्लीं लं ह्रीं, ह स
क ह ल ह्रीं, सोहं क्लीं हंसः ह्रीं हंसः, सोहं हंसः ह स क ए ल ह्रीं
ह स ह स क ह ल ह्रीं ह स स क ल ह्रीं ।
१०. 'वैष्णवी विद्या'—ह स क ए ल ह्रीं, ह स ह स क ह ल ह्रीं, ह स
स क ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, क ए ई ल ह्रीं,
ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल
ह्रीं, स क ल ह्रीं ।
११. आदिविद्या (शक्ति-शिव विद्या)—(१) क ए ई ल ह्रीं (वाग्भवकूट)
(२) ह स क ह ल ह्रीं (कामकूट) (३) स क ल ह्रीं, (शक्तिकूट)
द्वादशविद्यायें—शक्तिशिव विद्या । लोपामुद्रा विद्या । क्रोधमुनिविद्या । मानवी
विद्या । चान्द्री विद्या । कौबेरी विद्या । अगस्त्य विद्या । नन्दि विद्या । प्रभाकरी
विद्या । षण्मुखी विद्या । परमशिव विद्या । वैष्णवी विद्या ॥
श्री विद्या का उपासना क्रम
काली क्रम सुन्दरी क्रम तारा क्रम
(कुण्डलिनी क्रम, (हंस क्रम, (समवरोधिनी क्रम,
कादिविद्या, हादिविद्या, सादिविद्या,
सत्वगुण प्रधान) रजोगुण प्रधान ।) तमोगुण प्रधान)
दश महाविद्यायें—'काली तारा षोडशी च बगला भुवनेश्वरी । धूमा छिन्ना च
मातङ्गी भैरवी कमलात्मिका ॥'
८० वरिवस्यारहस्ये
(१) 'कादि विद्या'—'क' से प्रारंभ (२) 'हादि विद्या'--'ह' से प्रारंभ (३)
'सादिविद्या'—'स' से प्रारंभ । पञ्चदशाक्षरी मन्त्र के ३ ककार + २ हकार =
('शिववर्ण') शेष बीजाक्षर = ('शक्ति वर्ण') ३ ह्रींकार (शिवशक्त्यात्मक) ।
('पञ्चदशीविद्या' = षोडशी 'विद्या' = पञ्चदशाक्षरी विद्या ।)
विद्यावर्णानुद्धरति—
क्रोधीशः श्रीकण्ठारूढः कोणत्रयं लक्ष्मीः ।
मांसमनुत्तररूढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ॥ ९ ॥
शिवहंसब्रह्मवियच्छक्राः प्रत्येकमक्षरारूढाः ।
द्वितीयीकं कूटं कथितं तत् कामराजाख्यम् ॥ १० ॥
शिवतो वियतो मुक्तं तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।
हृल्लेखानां त्रितयं 'कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ॥ ११ ॥
(कूटत्रय का स्वरूप)
(क) वाग्भव कूट का स्वरूप—'क ए ई ल'-ह्रीं—
श्रीकण्ठ (अ) से समन्वित क्रोधीश (क), कोणत्रय (त्रिकोण = त्रिभुज 'ए'),
लक्ष्मी (ई), अनुत्तर (अ) एवं मांस (ल) से युक्त प्रथम कूट 'वाग्भवकूट' कहा गया
है ॥ ९ ॥
(ख) कामराज कूट का स्वरूप— 'ह स क ह ल'-ह्री—
शिव (ह), हंस (स्), ब्रह्मा (क्), वियत् (ह), एवं शक्र (ल्),
(वर्ण-समुदाय) अक्षर (अ) से समन्वित होकर द्वितीय कूट 'कामराजकूट' कहा गया
है ॥ १० ॥
(ग) शक्ति कूट का स्वरूप—'स क ल-ह्रीं'—
शिव (ह) एवं वियत् (ह) से विरहित यही ('कामराज कूट') 'शक्तिकूट' नाम
वाला तृतीय (कूट) है । तीनों कूटों में अन्त में हृल्लेखा त्रिक जोड़ लेना चाहिए
(अर्थात् प्रत्येक कूट के अन्त में 'ह्रीं' जोड़ लेना चाहिए) ॥ ११ ॥
- प्रकाश *
क्रोधीशो ब्रह्मा च ककारः । श्रीकण्ठोऽनुत्तरमक्षरं चाकारः । तमारूढस्तेन
युक्तः । कोणत्रयं योनिः । लक्ष्मीः कमला । मांसं शक्रश्चेन्द्रः । शिवो वियच्च हकारः ।
हंसः सकारः । अक्षरसमूहात्मकत्वात् कूटत्वव्यपदेशः ॥ ९-११ ॥ - सरोजिनी *
उपर्युक्त श्लोक त्रय में पञ्चदशी (पञ्चदशाक्षरी । षोडशी) मन्त्र एवं उसके कूटों
का विवरण प्रस्तुत किया गया है जो इस प्रकार है—
left: त्र.
Here, it is clearly त् and त: चित्त. Let's look really closely:
च + ि = चि
then त्त: vertical stem with the horizontal curved hook of double t. There is no right leg or left slant. But wait, is there an aa matra? No, it ends at the stem. Wait, could it be चित्त or चित्रा? It definitely looks like चित्त (or maybe typo in the printed book for चित्रा, but we transcribe what is printed: चित्त).
At the very bottom left:
६ वरि.
(This is the signature/quire mark: 6 Vari. meaning Varivasyarahasya, 6th gathering).
Wait! Let's decide on the transcription format:
Should we use Markdown columns, or transcribe column-by-column?
Column-by-column is so much cleaner, readable, and standard for vertical columns!
Let's see:
Header:
प्रथमोऽशः ८१
Then Column 1, Column 2, Column 3.
Wait, let's clearly label them so that the table structure is fully preserved:
(१) वाग्भवकूट
...
[L..] ### (२) (कामराजकूट)
...
[L..] ### (३) शक्तिकूट)
...
Wait, or can we present it as a table using markdown?
Wait!
८२ वरिवस्यारहस्ये
चान्द्रखण्ड का 'ह्रीं' = चित्रा ॥
भगवती का त्रिखण्डात्मक रूप
| खण्ड | मन्त्र का भाग | मन्त्र का भाग | षड् कमलों का भाग | कुण्डलिनी भाग |
|---|---|---|---|---|
| सोमखण्ड | शक्तिकूट | शिव के ४ चक्र | आज्ञा एवं विशुद्ध | सोमकुण्डलिनी |
| सूर्यखण्ड | कामकूट | चतुर्दशार एवं बहिर्दशार | हृदय एवं मणिपूर | सूर्य कुण्डलिनी |
| अग्निखण्ड | वाग्भवकूट | अन्तर्दशार, अष्टार, बिन्दु | स्वाधिष्ठान एवं मूलाधार सहितं त्रिकोण | अग्निकुण्डलिनी |
| (१) वाग्भव कूट : आग्नेय : भगवती का मुख है । | ||||
| (२) कामकला कूट : सौर : भगवती का कण्ठ से कटिपर्यन्त रूप है । | ||||
| (३) शक्ति कूट : चान्द्र : भगवती का कटि के नीचे का भाग है जो कि | ||||
| सृजन शक्ति का रूप है । | ||||
| (क) प्रथम कूट : वाग्भव कूट : ११ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक | ||||
| १७, श्लोक ३१, (१०) | ||||
| (ख) द्वितीय कूट : कामराज कूट : ११ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । | ||||
| श्लोक १७ (१० १/२) | ||||
| (ग) तृतीय कूट : शक्ति कूट : ८ १/२ मात्रा काल—एक लव कम । श्लोक | ||||
| १८ एक लव कम । (८ १/२) | ||||
| श्रीविद्या का मन्त्र पंद्रह अक्षरों का है अतः इस मन्त्र को 'पञ्चदशी' कहते | ||||
| हैं । उसमें १६वाँ बीज और लगा देने से वही 'षोडशीविद्या' बन जाती है । | ||||
| 'कूट' एवं विद्या— | ||||
| पञ्चदशीमन्त्र के (१) प्रथम पञ्चाक्षर = 'वाग्भवकूट' कहलाते हैं । | ||||
| (२) द्वितीय षडाक्षर = 'कामकलाकूट' कहलाते हैं । | ||||
| (३) अन्तिम अक्षरचतुष्टय = 'शक्तिकूट' कहलाते हैं । |
प्रथमोंऽशः ८३
(१) ‘कादिविद्या’ मूल विद्या है । कामदेव ने इसी मूल ‘कादिविद्या’ की
उपासना की थी । इसी विद्या के आधार पर (२) अन्य ११ विद्यायें प्रचलित हुईं ।
अगस्त मुनि की पत्नी लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु, अगस्त्य,
सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र एवं कामदेव—सभी ने
अपने-अपने इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न-भिन्न विद्याओं का रूप दिया और
वे विद्यायें उन ऋषियों एवं देवों के नाम से प्रसिद्ध हुईं ।
प्रणव एवं देवी प्रणव में साम्य—
उद्गीथोपासना में उपासित प्रणव एवं देवी प्रणव (ह्रीं) में ऐकात्म्य है । प्रणव
का स्वरूप निम्नांकित है ।
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्द्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २२५ ॥
कौण्डिली व्यापिनी शक्तिः समनैकादशी स्मृता ।
उन्मना च ततोऽतीता तदतीतं निरामयम् ॥
(स्वच्छन्द तन्त्र : ४ पटल)
ॐ
के १२ अवयव
१. अकार —————————————
२. उकार —————————————
३. मकार —————————————
४. बिन्दु —————————————
५. अर्द्धचन्द्र —————————————
६. निरोधिनी —————————————
७. नाद —————————————
८. नादान्त —————————————
९. शक्ति —————————————
१०. व्यापिनी —————————————
११. समना —————————————
१२. उन्मना —————————————
८४ वरिवस्यारहस्ये
'पञ्चदशाक्षरी' मन्त्र या 'पञ्चदशी विद्या' (पञ्चदशाक्षरी विद्या)—
१. स्वरूप—'क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं ।'
२. प्रादुर्भाव-स्रोत—'कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्र-
मिन्द्रः ।'
३. निहित वर्ण—इसमें वर्ण निहित हैं इसीलिए इसे 'पञ्चदशाक्षरी' कहते
हैं ।
४. मूल वर्ण—पुनरावृत्ति-रहित वर्णों की दृष्टि से इस मन्त्र में निम्न ७ वर्ण
मात्र स्थित हैं—'क' 'ए' 'ई' 'ल' 'ह्रीं' 'ह' 'स' ।
५. वर्ण-सङ्घटन—(क) तीन ककार (ख) एक एकार (ग) एक ईकार (घ)
तीन लकार (ङ) तीन ह्रींकार (च) दो हकार (छ) दो सकार ।
६. पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण—'ए' 'ई' । इसमें भी 'ह्रीं' में निहित ईकार को
ध्यान में रखा जाय तो ईकार चार हो जायेंगे अतः पुनरावृत्ति-शून्य वर्ण
मात्र एक ही शेष रह जाएगा और वह है 'ए' ।
७. कूट—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में तीन कूट हैं—(१) वाग्भवकूट (२) कामराज
कूट (३) शक्तिकूट ।
८. कूटों की वर्ण संख्या—(क) 'वाग्भव कूट' (पाँच) + (ख)
'कामराजकूट' (छः) + (ग) 'शक्तिकूट' (चार) = १५
१०. नाद समन्वित एवं आत्मप्रतिष्ठित सूक्ष्म वर्णों सहित वर्ण संख्या—
(क) 'वाग्भवकूट' = १८
(ख) 'कामराजकूट' = २२
(ग) 'शक्तिकूट' १८
महायोग = (१८ + २२ + १८) = ५८
'प्रथमेऽष्टादश वर्णा द्वाविंशविरक्षराणि मध्ये स्युः ।
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं सङ्घातेनाष्ट पञ्चाशत् ।।
११. वर्ण-संख्या ५८ कैसे?
ह्रीं में १२ वर्ण कहाँ से आ गए ? उत्तर—
हृल्लेखायाः स्वरूपं तु व्योमाग्निर्वाम लोचना । ┐
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यो नाद नादान्त शक्तयः ।। │ ह्रींकार में
व्यापिका समनोन्मन्य इति द्वादश संहति । ┤ निहित १२
बिन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते ।। ┘ वर्ण
प्रथमोऽंशः ८५
पञ्चदशी मन्त्र में वर्ण-संघटन
वाग्भवकूट : कामराजकूट : शक्तिकूट :
(१८ वर्ण) (२२ वर्ण) (१८ वर्ण)
क(१) + अ(१) + ह(१) + अ(१) + स(१) + अ(१) +
ए(१) + ई(१) + स(१) + अ(१) + क(१) + अ(१) +
ल(१) + अ(१) + क(१) + अ(१) + ल(१) + अ(१) +
ह्रीं(१२) ह(१) + अ(१) + ह्रीं(१२)
ल(१) + अ(१) +
ह्रीं(१२)
६ + १२ = १८ १० + १२ = २२ ६ + १२ = १८
१८ + २२ + १८ = ५८
ह्रींकार में निहित
१२ वर्ण
देवी प्रणव
१. ह ─────────────────────────┐
२. र ─────────────────────────┤
३. ई ─────────────────────────┤
४. बिन्दु ────────────────────────┤
५. अर्द्धचन्द्र ────────────────────┤
६. रोधिनी ──────────────────────┤ ह्रीं
७. नाद────────────────────────┤
८. नादान्त ─────────────────────┤
९. शक्ति ──────────────────────┤
१०. व्यापिका ────────────────────┤
११. समना ─────────────────────┤
१२. उन्मना ─────────────────────┘
'प्रणव' = ओंकार । ओंकार जीवों का प्राण है ।¹
──────────────────────────────────────────
१. नेत्र तन्त्र
८६ वरिवस्यारहस्ये
[तालिका : संहार क्रम एवं सृष्टि क्रम]
| संहार क्रम | सृष्टि क्रम |
|---|---|
| अ ↓ | उन्मना ↓ |
| उ ↓ | समना ↓ |
| म ↓ | व्यापिनी ↓ |
| बिन्दु ↓ | शक्ति ↓ |
| अर्धचन्द्र ↓ | नादान्त ↓ |
| रोधिनी ↓ | नाद ↓ |
| नाद ↓ | रोधिनी ↓ |
| नादान्त ↓ | अर्धचन्द्र ↓ |
| शक्ति ↓ | बिन्दु ↓ |
| व्यापिनी ↓ | मकार ↓ |
| समना ↓ | उकार ↓ |
| उन्मना | अकार |
| [मध्य चक्र : द्वादश कला वृत्त (बाह्य से अन्तर्मुख)] | |
| १. अकार | |
| २. उकार | |
| ३. मकार | |
| ४. बिन्दु | |
| ५. अर्धचन्द्र | |
| ६. रोधिनी | |
| ७. नाद | |
| ८. नादान्त | |
| ९. शक्ति | |
| १०. व्यापिनी | |
| ११. समना | |
| १२. उन्मना | |
| केन्द्र : ॐ | |
| अधोभाग पार्श्व-द्वय : (वाम) ॐ | (दक्षिण) ॐ |
| [अधोवर्ती सोपान-चित्र (संहार-सृष्टि क्रम)] | |
| संहार क्रम ← ———————————————— → सृष्टि क्रम | |
| ( मुक्ति क्रम ) | ( बन्धन क्रम ) |
| [ आरोह क्रम ↗ ] ------------------------- [ अवरोह क्रम ↘ ] | |
| ↗ | महाबिन्दु |
| ↗ | उन्मना १२ ↑ |
| ↗ | समना ११ ↑ |
| ↗ | व्यापिनी १० ↑ |
| ↗ | शक्ति ९ ↑ |
| ↗ | नादान्त ८ ↑ |
| ↗ | नाद ७ ↑ |
| ↗ | रोधिनी ६ ↑ |
| ↗ | अर्धचन्द्र ५ ↑ |
| ↗ | बिन्दु ४ ↑ |
| ↗ | मकार ३ ↑ |
| ↗ | उकार २ ↑ |
| अकार १ ↑ | ↓ १ अकार |
प्रथमोऽंशः ८७
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
कूटत्रय का उच्चारण काल
(मात्राकाल जो जप के लिए नियत है)
१. प्रथमकूट = १० मात्राएँ
२. द्वितीयकूट = साढ़े दस मात्राएँ
३. तृतीयकूट = एक लव कम उन्तीस मात्राएँ
मन्त्राविर्भाव
क ए ई ल ह्रीं पञ्चदशी विद्या
(प्रथम कूट) (पञ्चदशाक्षरी मन्त्र)
वाग्भव कूट
ह स क ह ल ह्रीं
(मध्य कूट) कामराज कूट
स क ल ह्रीं
(अन्तिम कूट) शक्ति कूट
[चक्र-केन्द्र एवं वृत्त: क ए ई ल ह्रीँ / ह स क ह ल ह्रीँ / स क ल ह्रीँ — पञ्चदशाक्षरी श्रीविद्या]
कूटों के प्रत्येक अक्षर में—ब्रह्मा-भारती, विष्णु-पृथ्वी, रुद्र-रुद्राणी अधिपति निवास करते हैं ।
'पञ्चदशी मन्त्र' की स्थिति एवं स्वरूप—
(१) प्रथम कूट—प्रलयाग्नि के समान भासित होने वाला । अनाहत स्पर्शी ।
(मूलाधार से अनाहत तक व्याप्त)
(२) द्वितीय कूट—कोटि सूर्यवत भासमान । आज्ञाचक्र स्पर्शी । (अनाहत से
आगे से प्रारंभ होकर आज्ञा चक्र तक व्याप्त)
(३) तृतीय कूट—कोटि चन्द्रों के समान भासमान । (आज्ञा चक्र से आरम्भ
करके उन्मना एवं महाबिन्दु तक ।)
'सुषुम्नानाड़ी' के मूलाग्र भागों में दो 'सहस्रदल कमल' स्थित हैं । मध्य में
अष्टदल आदि तीस कमल स्थित है ।¹ मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत,
विशुद्ध आज्ञा नामक ६ कमल हैं ।
१. स्वच्छन्द तन्त्र
८८ वरिवस्यारहस्ये
श्रीविद्या के विभिन्न रूप
श्रीविद्या के विभिन्न स्वरूप विभिन्न सम्प्रदायों को दृष्टि में रखने पर
श्रीविद्या के विभिन्न स्वरूप इस प्रकार निर्मित होंगे—
[चक्रान्तर्गत विद्या-मन्त्र-स्वरूप :]
१. वैष्णवीविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
२. षण्मुखीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं...
३. नन्दिविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं...
४. कौबेरीविद्या : ह स क ल ह्रीं सोऽहं क्रीं हंसः ह्रीं हंसः सोऽहं हंसः ह स क ए ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
५. मानवीविद्या : ह स क ल ह्रीं क्रीं लँ ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सोऽहं क्रीं हंसः ह्रीं हंसः सोऽहं हंसः...
६. लोपामुद्रा विद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
७. शक्तिशिवविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं...
८. आदिविद्या : क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं
९. क्रोधमुनीविद्या : ह स क ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
१०. चान्द्रीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं
११. अगस्त्य विद्या : क ए ई ल ह्रीं ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं
१२. प्रभाकरीविद्या : ह स क ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं क ए ई ल ह्रीं
१३. परमशिवविद्या : सो हं
[चक्र-निर्देशित विद्या-नामावली :]
वैष्णवीविद्या
षण्मुखीविद्या
नन्दिविद्या
कौबेरीविद्या
मानवीविद्या
लोपामुद्रा विद्या
शक्तिशिवविद्या
आदिविद्या
क्रोधमुनीविद्या
चान्द्रीविद्या
अगस्त्य विद्या
प्रभाकरीविद्या
परमशिवविद्या
विद्या कादि विद्येति-> wait,शांभवी विद्या कादि विद्येति Line 3:वा । हादिविद्येति वा सादि Line 4:विद्येति वा रहस्यमोमो Line 5:'वाचि प्रतिष्ठा ।।'२ Wait, why does line 4 sayरहस्यमोमो? Wait, look at line 4: विद्येति वा रहस्यमोमो Wait, is the last letterमो? Let's look at मो: मwith anेand anा=मो. The next letter: मwithो? Wait! Could it be रहस्यमोम्? Look at the letter: It has म, and then on top an ो? No, wait! Could it be रहस्यमोमित्योम्? No, there are only two syllables after रहस्य: मोand... Wait, is that a virama? Look at:म+ो=मो. Wait, is it रहस्यमोम्with a halanta? Wait, why would halanta have a vertical bar? Wait, in Hindi/Sanskrit fonts,मwith halanta isम्`.
Here, the
९० वरिवस्यारहस्ये
* प्रकाश *
व्योम हकारः केवलो न त्वकारविशिष्टः । अग्नी रेफस्तादृशः । वामलोचने-
कारः१ । बिन्द्वादयो नवापि सूक्ष्मसूक्ष्मतरासूक्ष्मतमकालैरुच्चार्या ध्वनिविशेषाः, वर्ण-
विशेषा वा । न च ककारादिवत् स्पष्टमनुच्चार्यत्वात् तन्त्रीस्वरतुल्यत्वेन श्रूयमाणत्वाच्चा
कारप्रत्ययाद्यभावाच्च ‘बीजबिन्दुध्वनीनां च त्रिकूटेषु ग्रहात्मिका’ इत्यादौ ध्वनिपदेनैव
तन्त्रेषु व्यवहाराच्च न वर्णत्वमर्धचन्द्रादेरिति वाच्यम्, अनुस्वारविसर्गादावुक्तहेतु-
सत्त्वेऽपि वर्णत्वस्येष्टत्वात् । कथमन्थथा ‘त्रिषष्टिश्चतुःषष्टिर्वा वर्णाः शंभुमते मताः’ इति
प्रतिज्ञाय ‘अनुस्वारो विसर्गश्च—’ इति परिगणनं शिक्षायां सङ्गच्छेत ? न च तादृश-
संख्याविरोधादेव नात्र वर्णत्वम्, तत्र स्पष्टोच्चार्याणामेव गणनात् । न च ताल्वादि-
परिगणितस्थानानभिव्यङ्ग्यत्वात्र वर्णत्वम्, तदनभिव्यङ्ग्यत्वस्य पश्यन्त्यादावव्याप्तेः,
‘चत्वारि वाक्परिमिता पदानि इति श्रुत्या वर्णसमूहात्मकपदत्वस्य स्पष्टमुक्तत्वाच्च । अत
एव चतुःशतीशास्त्रे नादस्यार्थवर्णनं सङ्गच्छते । न च रथघोषवत् पदार्थस्मारकत्वोप-
पत्तिः; तत्र हि तत्कालकरणीयत्वसम्बन्धेन माहेन्द्रस्तोत्रोपाकरणस्य स्मृतिविषयताया
वाचनिकत्वेन रथघोषसामान्यस्य लौकिकादिसाधारणस्य स्मारकत्वाभावेन तस्य तत्र
शक्तेरयोगात्, प्रकृते तु न तथेति वैषम्यात्; ‘हल्लेखात्रयसंभूतैस्तिथिसंख्यैस्तथाक्षरैः’
इत्यादौ प्रतिहल्लेखं हकाररेफेकारानुस्वारनादपञ्चकमिति पञ्चदशाक्षराणीत्युक्त्या, नादे-
ऽक्षरत्वव्यवहारस्यासकृद्योगिनीहृदये,
‘भूमिश्चन्द्रः शिवो माया शक्तिः कृष्णाध्वमादनौ ।
अर्धचन्द्रश्च बिन्दुश्च नवार्णो मेरुरुच्यते ।
महात्रिपुरसुन्दर्या मन्त्रा मेरुसमुद्भवाः ॥’
इति ज्ञानार्णवादावप्यसकृद्व्यवहारस्य दर्शनाच्च । ध्वनिपदेन व्यवहारस्तु तत्तुल्य-
त्वाल्लक्षणया ध्वनिपर्यायनादपदवाच्यत्वात्रेयार्थरूपलक्षणया वा नेय इति दिक् । एवं च
प्रथमतृतीयकूटे अष्टादशवर्णात्मके; मध्यमकूटं तु चतुरधिकम्; संहत्याष्टपञ्चाश-
द्वर्णात्मिका विद्येति सिद्धम् । यद्यपि बिन्दुविनिर्मुक्तानामष्टानामेव नादसंज्ञा मन्त्रशास्त्रे,
तथापि व्यवहारसौकर्याय तत्सहितानामेव सात्र कृतेति ध्येयम् ॥ १२-१३ ॥
* सरोजिनी *
हल्लेखायाः = हल्लेखा का । व्योम = ह । अग्नि = र । वाम-लोचना
= ई । ‘बिन्दु’ अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं
उन्मनी—ये नौ अवयव प्रणव, महामन्त्र, मन एवं चक्र के अङ्गभूत हैं ।
आचार्य भास्करराय ‘सेतुबन्ध’ में कहते हैं कि—‘स्वच्छन्दतन्त्र’ में कहा गया
है कि मूलाधार की कर्णिका के मध्य में ‘वह्नि बिम्ब’ है एवं स्वाधिष्ठान की
कर्णिका में ‘हल्लेखा’ का अवस्थान है—‘स्वच्छन्द तन्त्रे मूलाधारे कर्णिकायां
बह्निबिम्बस्य कथनात् स्वाधिष्ठानकर्णिकायां हल्लेखारूप शक्तेरवस्थानम् ॥’
१. वामलोचनमीकारः
प्रथमोऽंशः ९१
'हल्लेखा' 'ह्रीं' (ह, र, ई एवं अनुस्वार) की भी द्योतिका है। 'हल्लेखा'
का ऊर्ध्व बिन्दु 'बिन्दु' है। १ प्रथम कूट में जो हल्लेखा है उसके अन्तर्गत ही
'कामकला' है। उसमें गुरुमुखैकवेद्या जो सर्पयोग मार्ग के अनुसार 'षडदल कमल'
के ऊपर मूलाधार और उसके ऊपर शक्ति या 'हल्लेखा' का स्थान है। यह
अनङ्गादि देवताओं से परिवेष्टित है और आधार कमल से ढाई अङ्गुल ऊपर नील
वर्ण की कर्णिका के भीतर प्रतिष्ठित है। 'हल्लेखा' से दो अङ्गुल ऊपर स्वाधिष्ठान
कमल का स्थान है। इसके बाद क्रमशः मणिपूर, अनाहत, 'विशुद्ध', लम्बिकाग्र
(अष्टदल कमल) और अन्त में आज्ञाचक्र है। आज्ञाचक्र के ऊपर बिन्दु से उन्मना
पर्यन्त प्रणव की भूमिकाओं के रूप में निम्न भूमियाँ स्थित हैं—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
निरोधिका, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका (यापिनी) समना और उन्मना। २ आचार्य
शङ्कर ने 'हल्लेखा' की व्याप्ति के विषय में इस प्रकार लिखा है—
'सचराचरस्य जगतो मूलत्वान् मूलताऽस्य बीजस्य ।।' और 'हल्लेखा' के ज्ञान
का फल इस प्रकार निरूपित किया है—यां ज्ञात्वा सकलमपास्य कर्मबंधं, तद्विष्णोः
परमपदं प्रयाति लोकः । तामेतां त्रिजगति जन्तुजीवभूतां, हल्लेखां जपत इति
नित्यमर्चयीत् ।।३
'स्वच्छन्द संग्रह' में 'हल्लेखा' का इस प्रकार विवरण प्रस्तुत किया गया है—
'आधारपङ्कजस्योर्ध्वं सार्द्धद्वयङ्गुले कोपरि। तैजसं साष्टपत्रञ्च पीतकर्णिकया युतम्।
हल्लेखाकर्णिका मध्ये स्थितानङ्गादि देवता। एतस्माद द्वयङ्गुलादूर्ध्वे स्वाधिष्ठानं
षडरकम् ।'४
┌─────────────────────────┐
│ प्रणव के बारह अवयव │
└────────────┬────────────┘
↓
┌───┬───┬───┐ ┌───┬───────┬───────┬───┬──────┬─────┬──────┬─────┬─────┐
↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓ ↓
१ २ ३ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९
अ उ म बिन्दु अर्द्धचन्द्र रोधिनी नाद नादान्त शक्ति व्यापिनी समना उन्मना
┌ १. जाग्रत् ┐ └───────────────────────────────────────────────────┘
│ २. स्वप्न् │ (३ अवयव) (९ अवयव)
└ ३. सुषुप्ति ┘
(तुरीय एवं तुरीयातीत अवस्थाओं के द्योतक ३ + ९
= १२ अवयव = प्रणवावयव ॥)
द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम, द्वादश—ये छः अवयव 'शून्य' कहलाते हैं।
१. गोपीनाथ कविराज—'भारतीय संस्कृति और साधना'; (पृ० ४०)
२. तत्रैव; (पृ० ३३६) ३. प्रपञ्चसारतन्त्र (चतुर्थ पटल)
४. स्वच्छन्दतन्त्र
९२ वरिवस्यारहस्ये
(क) द्वितीय, चतुर्थ, षष्ठ, अष्टम, दशम शून्य = ‘अवान्तर शून्य’।
(ख) द्वादश शून्य (उन्मना) = ‘महाशून्य’।
(ग) सुषुप्तिभावना का स्थान भ्रूमध्य स्थित बिन्दु में है। इस बिन्दु को
‘हल्लेखा’ का ऊर्ध्व बिन्दु जानना चाहिए।
(घ) अर्द्धचन्द्र, रोधिनी एवं नाद—इन तीन मन्त्रावयवों में ‘तुरीय’ की भावना
करना उचित है।
(ङ) नादान्त से शक्ति। व्यापिनी, समना एवं उन्मना में ‘तुरीयातीत अवस्था’
व्याप्त है। उन्मना से परे किसी प्रकार की अवस्था नहीं है। ‘बिन्दु’ मात्रा से
मात्राहीन की ओर जाने का द्वार है जहाँ ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान एकाकार हो जाते हैं,
उन्मना पर्यन्त सम्पूर्ण मन्त्रावयव १०८१७ बार उच्चारित होने पर नाद का अन्त
एवं तत्वज्ञान का उदय होकर परमपद की प्राप्ति होती है। समना में भी ‘नाद’ का
अन्त नहीं होता। शाक्त योगियों के मतानुसार ‘उन्मना’ में भी नाद का अन्त नहीं
होता। उन्मना में काल तो नहीं है फिर भी वह परमतत्त्व नहीं है। जब तक नाद
का अन्त नहीं होता तब तक तत्वबोध नहीं हो पाता। उन्मना का भेदन होने के
बाद ही ‘नाद’ का अन्त होता है।१
‘विश्वचक्र’ (अकुल से महाबिन्दु पर्यन्त समस्त अवान्तर चक्रों की समष्टि ही
विश्वचक्र है।)
(१) अकुल से आज्ञा चक्र तक के अंश = ‘सकल’
(२) बिन्दु से उन्मना तक के अंश = ‘सकल निष्कल’
(३) उन्मना के बाद महाबिन्दु अंश = ‘निष्कल’
‘महाबिन्दु’ = विश्वातीत परमेश्वर या शिवशक्ति का आसन) ।। ‘महाबिन्दु’
ही सदाशिव है। इसके ऊपर चिच्छक्ति क्रीडा करती है।
प्रणव के द्वादश अवयव हैं—(१) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के द्योतक—
अकार, उकार, मकार (२) तुरीय, तुरीयातीत के द्योतक—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र,
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना, उन्मना।
बिन्दौ तदर्धे रोधिन्या नादे नादान्त एवं च।
शक्तौ पुनर्व्यापिकायां समनोन्मनि गोचरे ॥
महाबिन्दौ पुनश्चैवं त्रिधा चक्रं तु भावयेत् ॥२
‘नेत्रतन्त्र’ के अनुसार प्रणव की निम्न कलायें हैं—(१) अकार (२) उकार
(३) मकार (४) बिन्दु (५) अर्द्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त (९)
व्यापिनी (१०) शक्ति (११) समना (१२) उन्मना—
१. गोपीनाथ कविराज—‘भारतीय संस्कृति और साधना’; (पृ० ३३८-३३९)
२. योगिनीहृदय । (चक्र संकेत)
प्रथमोऽंशः ९३
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥ २१ ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समनाश्रेति सामया ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥ २२ ॥१
अकार, उकार, मकार, बिन्दु आदि द्वादश कलाओं के द्वारा ओंकार पृथ्वी से
लेकर शिव पर्यन्त समस्त तत्त्वों एवं भुवनों को आकलित करता है क्योंकि—'ओम्
इत्येतदक्षरमिदं सर्वम्' प्रणव समस्त प्राणियों का प्राण है, उनका जीवन है—
'प्रणवः प्राणिनां प्राणो जीवनं सम्प्रतिष्ठितम् ।
गृह्णति प्रणवः सर्वं कलाभिः कलयेच्छिवम् ॥२
क्या 'बिन्दु' अर्द्धचन्द्र, रोधिनी आदि वर्ण या अक्षर हैं—भास्करराय
'वरिवस्यारहस्यम्' में कहते हैं कि यद्यपि ककारादि वर्णों की भाँति इनका स्पष्ट
उच्चारण तो संभव नहीं है तथापि ये उक्त बिन्दु आदि नव कलायें सूक्ष्म, सूक्ष्मतर
एवं सूक्ष्मतम काल द्वारा उच्चरित ध्वनि विशेष या वर्ण विशेष हैं । 'योगिनीहृदय'
में भी नाद को अक्षर स्वीकार किया गया है । इसी आधार पर पञ्चदशाक्षरी मन्त्र
में ५८ वर्णों की संहति स्वीकार की गई है ।३
नव नादों का समष्टिगत नाम—बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद नादान्त,
शक्ति, समना एवं उन्मना—इन नवों का समष्टिगत नाम 'नाद' है । बिन्दु से
उन्मनापर्यन्त नव कलाओं की समुदित संज्ञा 'नाद' है । भास्करराय कहते हैं कि
यद्यपि आठ कलाओं का नाम ही 'नाद' है । किन्तु व्यवहार सौकर्य के लिए
'बिन्दु' को भी मिलाकर नौ कलाओं को भी 'नाद' कहा जाता है ।
कलाओं (नादों) की मात्रायें—कमलपुष्प को सुई से एकबारगी छेद करने
पर प्रत्येक दल के भेदन में जितना समय लगता है उसे 'लव' कहते हैं । इससे
अधिक सूक्ष्म काल नहीं होता । २५६ लवों की एक मात्रा होती है ।
उच्चारण-काल—(१) बिन्दु का १२८ लव (२) अर्द्धचन्द्र का ६४ (३) रोधिनी
का ३२ (४) नाद का १६ (५) नादान्त का ८ (६) शक्ति का ४ (७) व्यापिका
का २ (८) समना १ लव (९) उन्मना—सर्वथा कालहीन ॥४ 'योगिनीहृदय' में
'उन्मना' को भी कालात्मक स्वीकार किया गया है—'शक्त्यादीनां तु मात्रांशो
मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ॥' 'सेतुबंध' में भास्करराय ने इस श्लोक की व्याख्या करते
हुए कहा है कि जिस तरह 'समना' में काल होता है उसी प्रकार 'उन्मना' में भी
काल होता है—"यथा समनायाः कालः तथैवोन्मनी काल ।।"
१-२. नेत्रतन्त्र ३. प्रकाश
४. प्रकाश 'बिन्दु' से लेकर समना पर्यन्त समस्त कलाओं की मात्रा अपनी
पूर्ववर्ती कला से उत्तरोत्तर आधी होती जाती है यथा—बिन्दु की मात्रा से
आधी मात्रा अर्द्धचन्द्र में अर्द्धचन्द्र से आधी मात्रा रोधिनी में, रोधिनी से
आधी मात्रा नाद में, नाद की मात्रा से आधी मात्रा नादान्त में आदि ।।
९४ वरिवस्यारहस्ये
| नादों का क्रमाङ्क | ९ नाद या प्रणव के अवयव | स्थान | कलाएँ | अवस्था | आकार | उच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि) | पूर्ण ध्वनि की मात्रा | आकार का स्पष्टीकरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ४ | बिन्दु | आज्ञा चक्र के ऊपर ललाट में | ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती, सुप्रभा, विमला, शिवा | सुषुप्ति | १२८ लव | १/२ | दीप के सदृश वृत्ताकार | |
| ५ | अर्धचन्द्र<br>अर्द्धेन्दु | बिन्दु के ऊपर | रुन्धती, रोधनी, रौद्री, ज्ञानबोधा, तमोपहा, निरोधिका | तुर्यावस्था | ६४ लव | १/४ | आधे चन्द्र के समान | |
| ६ | निरोधिका | अर्धचन्द्र के ऊपर | इन्धिका, दीपिका, रोचिका, मोचिका | ३२ लव | १/८ | त्रिकोणाकृति : चन्द्रिका की भाँति | ||
| ७ | नाद | निरोधिका के ऊपर | ऊर्ध्वग | १६ लव | १/१६ | दो बिन्दुओं के मध्य पद्मराग मणिवत दण्ड के समान | ||
| ८ | नादान्त | नाद के ऊपर | सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता, अमृतसंभवा, व्यापिनी | ८ लव | १/३२ | वाम भाग में बिन्दु एवं हल के समान : तड़ित के समान |
प्रथमोऽंशः ९५
| नादों का क्रमाङ्क | ९ नाद या प्रणव के अवयव | स्थान | कलाएँ | अवस्था | आकार | उच्चारण काल (काल की मात्रा या अवधि) | पूर्ण ध्वनि की मात्रा | आकार का स्पष्टीकरण |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | शक्ति | नादान्त के ऊपर | व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता, अनाथा, अनाश्रिता | ४ लव | १/६४ | जिसमें दो तिरछे बिन्दु हों। वामबिन्दु से एक रेखा निकल रही हो। दक्षिण बिन्दु शिरा शून्य | ||
| १० | व्यापिनी (व्यापिका) | शक्ति के ऊपर | सर्वज्ञा, सर्वगा, दुर्गा, सवना, स्पृहणा, धृति | २ लव | १/१२८ | बिन्दु से निकलता हुआ त्रिकोण | ||
| ११ | समना | व्यापिनी के ऊपर | १ लव | १/२५६ | ऊर्ध्व एवं अधोभागस्थ बिन्दुद्वय से संयुक्त रेखाकृति | |||
| १२ | उन्मना | समना के ऊपर | कालहीन | १/५१२ | ऊर्ध्वबिन्दु से हीन | |||
| ० | नौ कलाएँ |
९६ वरिवस्यारहस्ये
'बिन्दु'—'योगिनीहृदय' के अनुसार 'बिन्दु' दीपक के समतुल्य प्रकाशमान है
और यह ललाट में गोलबिन्दी के रूप में स्थित है । इसका उच्चारण-काल
अर्द्धमात्रा है । ह्रस्व स्वर का उच्चारण-काल 'मात्रा' कहलाता है और इसका आधा
काल अर्धमात्रा है जो कि बिन्दु के उच्चारण में प्रयुक्त होता है ।१
ह्रस्व का उच्चारण-काल एक मात्रा, दीर्घ का उच्चारण-काल दो मात्रा, प्लुत
का उच्चारण-काल तीन मात्रा एवं व्यञ्जन का उच्चारण-काल अर्धमात्रा हुआ करता
है—
'एक मात्रो भवेद्ध्रस्वो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते ।
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यञ्जनं त्वर्धमात्रकम् ॥'
'मात्रा लध्वक्षरस्य कालः । तद्विगुणो गुर्वक्षरस्य । अतएव कामकला कमला
त्रिकोणा योनिश्च द्विमात्रा । हल्लेखायां द्वयोर्व्यञ्जनयोरे का मात्रा कामकलाया द्वे मात्रे
इति तिस्रः । बिन्दोरपि व्यञ्जन त्वादर्धमात्रा ॥'२
'बिन्दु' भाल के मध्य वृत्ताकार रूप से दीप की भाँति देदीप्यमान है—रहता
है—'मध्येकालं बिन्दुदीप इवाभाति वर्तुलाकारः ॥'३ अमृतानन्द कहते हैं—
'दीपाकारोऽर्धमात्रोच्चारणकालो वृत्त सन्निवेशो बिन्दुः इति ॥'४ 'योगिनीहृदय' में बिन्दु
की व्याख्या केवल इस प्रकार की गई है—'दीपाकारो' । अर्थात् बिन्दु दीपक के
आकार का है—दीपक की जैसी कान्ति या भासन वाला है । बिन्दु आदि नव के
समूह को 'नाद' कहा जाता है । (व०र०)
बिन्दु का विस्तार—'स्वच्छन्द तन्त्र' में 'बिन्दु' के विस्तार के विषय में इस
प्रकार कहा गया है—"बिन्दावरणमूर्ध्वतः । 'सूर्यकोटि प्रतीकाशमतिदीप्तं महद्गुणम् ।
तन्मध्येशतकोटीनां संख्या योजनपङ्कजम् । तत्कर्णिकायामासीनः शान्त्यतीतेश्वरः प्रभुः ।
पञ्चवक्त्रो दशभुजो विद्युत्पुञ्जनिभा कृतिः । निवृत्तिश्चं प्रतिष्ठा च विद्या शान्ति
सुक्रमात । परिवार्य स्थिता श्चैताः शान्त्यतीतस्य सुन्दरि । वामभागे समासीना
शान्त्यतीता मनोन्मनी । पञ्चवक्त्रधराः सर्वा दसबाह्निन्दु शेखराः । बिन्दुत्वं
समाख्यातं कोट्यर्बुद शतैर्वृतम् ॥'"५
बिन्दु को दीपाकार इसलिए कहा गया है क्योंकि दीपक का भासन जैसा
होता है वैसा ही बिन्दु का होता है—'दीपाकारो दीपकस्य यादृशं भासनं
तादृशम ।'’६ दीपस्यैवाकारः कान्तिर्यस्य स दीपाकारः ॥७ (१) निवृत्ति (२) प्रतिष्ठा
(३) विद्या (४) शान्ति—ये तत्पुरुष की कलायें हैं । इनका स्थान भ्रू मध्य है और
यह बिन्दुरूप ईश्वर तत्व में स्थित हैं । 'इन्दु' फिर 'बोधिनी' फिर 'नाद' फिर
१. भास्करराय—वरिवस्यारहस्यम् २. भास्करराय—'प्रकाश'
३. वरिवस्यारहस्यम् ४. दीपिका
५. नेत्रतन्त्र ६. दीपिका
७. सेतुबन्ध