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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

२३४ वरिवस्यारहस्ये
इसे 'देवी प्रणव' भी कहा जाता है । इसका अर्थ देखिए । 'ह्रीं' में चार वर्ण हैं—
(१) ह (२) र (३) ई (४) बिन्दु । ये तो स्पष्ट वर्ण हैं किन्तु व्यापक दृष्टि से
देखें तो इसके बारह अवयव हैं—(१) ह (व्योम) (२) र (अग्नि) (३) ई
(वामलोचना) (४) बिन्दु (ं) (५) अर्धचन्द्र (६) रोधिनी (७) नाद (८) नादान्त
(९) शक्ति (१०) व्यापिका (११) समना (१२) उन्मनी । (ह्रीं में नौ नाद भी
अंतर्निविष्ट हैं । अतः इसकी अनन्त महिमा है ।)
५. अथर्वशीर्ष में भी 'ह्रीं' का अर्थ रहस्यात्मक दृष्टि से उद्घाटित किया गया
है जो निम्नानुसार है—
'वियदीकार संयुक्तं वीतिहोत्र समन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्याबीजं सर्वार्थ-
साधकम् ।।' 'देवी बीज' = 'ह्रीं' ।। इस देवी बीज का स्वरूप देखिए—
१. 'वियदीकार संयुक्तं' अर्थात् = 'वियत्' (आकाश) से युक्त एवं 'ईकार' से
युक्त । (वियत् + ईकार से युक्त ।)—अर्थात् 'ह एवं ई' से युक्त ।।
२. 'वीतिहोत्र समन्वितम्'—वीतिहोत्र (अग्नि) से संयुक्त ।। अर्थात् 'र' वर्ण से
युक्त ।
३. 'अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं'—अर्धेन्दु ( ँ ) से सुशोभित देवी-बीज ।।
सारांश—ह + ई + र + ँ (बिन्दु) से युक्त अर्थात् = 'ह्रीं' ।।
इसी गुप्त रीति से 'नवार्ण मन्त्र' को भी व्यक्त किया गया है यथा—
“वाङ्माया ब्रह्मभूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्योऽवामश्रोत्र बिन्दु संयुक्तष्टा तृतीयकः ।।
नारायणेन संमिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः ।
विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ।।''१
अर्थात्—वाक् ('ऐं'), माया ('ह्रीं'), ब्रह्मसू = काम ('क्लीं') 'षष्ठं' (छठवां
व्यञ्जन) = अर्थात् 'चा', 'सूर्य' ('म'), 'अवाम श्रोत्र' = दक्षिणवर्ती कान ('उ'),
'बिन्दु' (अर्थात् अनुस्वार) से संयुक्त (अर्थात् म + उ + अनुस्वार से संयुक्त अर्थात्
'मुं'), 'संयुक्तष्टातृतीयकः'—टकार से तृतीय (अर्थात् 'ड'), 'नारायणेन संमिश्रो' =
'नारायण' (आ) से मिश्रित अर्थात् = ड + आ = 'डा', 'वायु' (मरुत = 'य'),
'अधर' ('ऐ') से युक्त अर्थात् 'यै' 'विच्चेनवार्णकोऽर्थ' अर्थात् अन्त में 'विच्चे'
पद । उपर्युक्त समस्त वर्णों को सङ्गति में बैठाने पर पूरा मन्त्र इस प्रकार बनेगा—
'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।' (नवार्ण मन्त्र) ।।
मन्त्रों को सीधे-सीधे न लिखकर इस प्रकार रहस्यात्मक रीति से उद्घाटित
करने के पीछे तर्क यह था कि कोई अपात्र व्यक्ति इस मन्त्र को न पा जाय
————————————————————————
१. श्रीदेव्यथर्वशीर्षम्

द्वितीयोंऽशः २३५
क्योंकि प्रथमतः तो अपात्र या कुपात्र होने पर इसका जप करना उसके लिए
सर्वविनाश का आमन्त्रण देना होगा और दूसरे यह कि यदि उसकी श्रद्धाभक्ति से
देवता प्रसन्न हो उठा तो मांत्री शक्ति से प्राप्त अचिन्त्य शक्तियों से अपने साथ ही
मानवीय समाज का एवं विश्व का बहुत बड़ा अहित कर सकता है इसीलिए मन्त्रों
को गोपनीय रखने का आदेश बार-बार दिया गया है यथा—
(क) गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः ।
(ख) गोपनीयं मातृजःरवत् ।
(ग) अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरि व पार्वति ।।
(घ) अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।।¹
६. गायत्री के दो रूप हैं । इनमें एक रूप तो अस्पष्ट एवं चारों वेदों
अत्यन्त गोपनीय है—'वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'²
गायत्री मन्त्र का यह रूप (भाग) तो स्पष्ट है—"ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।'
किन्तु गायत्री का यह रूप—'परो रजसेऽसावदोम'—यह चतुर्थ चरण
अस्पष्ट है । 'त्रिपुरातापनीयोपनिषद' में इस मन्त्र को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया
है—"तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् परो
रजसेऽसावदोम ।।'³
गायत्री का जो द्वितीय रूप है वही 'श्रीविद्या' नामक रूप है भास्करराय कहते
हैं—"गायत्र्याः स्पष्टमस्पष्टं चेति पदच्छेद आवृत्या । चरणत्रयम् 'तत्सवितुः । इत्यादि
स्पष्टम् ।' 'परोरजसे सावयोम' इति चतुर्थं चरणं त्वस्पष्टमित्यर्थः । परं श्रीविद्याख्यं
द्वितीयं रूपम् ।।'⁴
'तस्या रूपद्वितयं तत्रैकं यत् प्रपठ्यतेऽस्पष्टम् ।
वेदेषु चतुर्ष्वपि परमत्यन्तं गोपनीयतरम् ।।'⁵
भास्करराय कहते हैं—इस 'श्रीविद्या' को वेद भी गुप्त ढंग से प्रस्तुत करते हैं
यथा—'कामो योनिः कमला' आदि—
"कामो योनिः कमलेत्येवं साङ्केतिकैः शब्दैः ।
व्यवहरति न तु प्रकटं यां विद्यां वेदपुरुषोऽपि ।।'⁶
७. श्रीभास्करराय ने अपने पक्ष की पुष्टि में 'देवीभागवत पुराण' एवं
"त्रिपुरोपनिषद" का नामोल्लेख किया है—
१. रुद्रयामलम् (कुब्जिकास्तोत्र) २. वरिवस्यारहस्यम् (प्रथम अंश)
३. त्रिपुरातापनीयोपनिषद ४. प्रकाश
५-६. वरिवस्यारहस्यम्

२३६ वरिवस्यारहस्ये
‘गायत्र्यर्थस्त्रिपुरोपनिषदिकथितस्तथैव भागवते’१
उन्होंने ‘योगिनीहृदय’ एवं ‘सङ्केतपद्धति’ के भी अनेक उद्धरण प्रस्तुत किये
हैं। ‘योगिनीहृदय’, ‘देवीभागवत’, ‘सङ्केतपद्धति’, ‘वामकेश्वर तन्त्र’, ‘नित्या
षोडशिकार्णव’ एवं अमृतानन्दनाथ को अनेक बार उल्लेखित करके वे उन्हें अपने
पक्ष का समर्थक प्रदर्शित करते हुए दिखाते हैं ।
वे यह भी कहते हैं कि पुराकाल में गायत्री चरणत्रय मात्रवाली थी । यथा—
‘सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात्’२ आचार्य
भास्करराय का कथन है कि उपर्युक्त देवी भागवत के श्लोक के अनुसार गायत्री का
प्रतिपाद्यत्व, आद्या श्रीविद्या के ब्रह्मरूपत्व के प्रतिपादन में ही निहित है ‘अंत्र
ह्याद्यायाः श्रीविद्याया एवं ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं’३ भास्करराय अपनी पुष्टि में
निम्न श्लोक भी प्रस्तुत करते हैं—‘हयग्रीव ब्रह्मविद्या वृत्रवधस्तथा । गायत्र्या च
समारंभस्त द्वै भागवतं विदुः ॥’४
सर्वान्तर्यामि दधद्भगों देवस्य धीति तुर्यार्थः ।
पृथ्वी मही लकारस्तृतीयतुर्याङ्घ्रिबोधिका माया ॥ ६१ ॥
(गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र के वर्णों की परस्पर वाचकता)
(पञ्चदशी मन्त्र का तृतीय वर्ण जो) वर्णमाला के चतुर्थ वर्ण (ई) का प्रतीक
है ‘भगों देवस्य धी’ का वाचक है । इसका अर्थ है—सर्वान्तर्यामी एवं सर्वपोषक
शिव ।। ‘लकार’ पृथ्वी का वाचक है । माया (हीं) (गायत्री के) तृतीय एवं चतुर्थ
चरण का वाचक है ॥ ६१ ॥

  • सरोजिनी *
    ‘पञ्चदशी मन्त्र’ का तृतीय वर्ण वर्णमाला का चतुर्थाक्षर ‘ई’ है ।
    | पञ्चदशी मन्त्र | गायत्रीमन्त्र | समता |
    | :--- | :--- | :--- |
    | ‘ई’ | ‘भर्गो देवस्य धी’ | दोनों मन्त्र एकार्थक |
    | | | हैं—दोनों एक दूसरे के |
    | | | अर्थ के द्योतक हैं ।। |
    | अर्थ सर्वान्तर्यामी सर्वाधार | अर्थ—सर्वान्तर्यामी | पञ्चदशी के ‘ई’ एवं |
    | शिव | एवं सर्वपोषक शिव | गायत्री मन्त्र के ‘भर्गो |
    | ‘तस्माद्भगों देवस्य धीत्ये- | —(गा०मं०) | देवस्य धी’ दोनों का |
    | वमीकारः’ श्रुति = ‘ई’ | ‘ईकारस्याप्येतावानर्थः | एक ही अर्थ है । |
    | | (—भास्कर) | |
    १. वरिवस्यारहस्यम् २. देवीभागवत पुराण
    ३. भास्करराय—‘प्रकाश’ ४. वरिवस्यारहस्यम्

द्वितीयोंऽशः २३७
| 'ल्'—भूमण्डल मेवोक्तं | 'महि' । 'भर्गोदेवस्य | 'ल' 'लं' एवं मही |
| लकारेण (श्रुति) (अर्थात् | धीमहि' का 'महि' । | दोनों पृथ्वी वाचक हैं । |
| महनीया पृथ्वी = पृथ्वी | अर्थ = पृथ्वी | |
| तत्व का बीजाक्षर 'लं') | | |
| = भूमण्डल 'ल' | | |
| ह्रीं (माया बीज) | (गायत्री का चतुर्थ | |
| | चरण) | |
| | 'परोरजसे सावदोम्' | |
'सवितुर्वरेण्यं' = 'ए' ॥ 'सवितुः' = (गा०मं०) प्राणिप्रसवकारण । योनि ।
सविता + वरेण्य = कामेश्वरी । 'ए' = कामेश्वरी ।
'क' = कामेश्वर । 'कं ब्रह्म' । 'तत्' (गायत्री मन्त्र) = ब्रह्म ॥ 'ॐतत्
सदिति' 'धी'—जगदाधार—'दधत्, धत इति धीः ॥ 'धरोधोत्येवं धार्यते ।' (श्रुति) ।
'वरेण्यं' (गा०मं०) श्रेष्ठ । भजनीय । 'धयो यो नः प्रचोदयात्' का अर्थ है—हम
लोगों की 'धी' (बुद्धि) को ध्यानातीत वस्तु, निष्प्रपञ्च विषयों में प्रेरित करें ॥
अर्थात् परात्परतत्त्व विषयक ज्ञान को प्राप्त करने हेतु प्रेरणा प्रदान करें ।
'तुरीयांघ्रिः' = गायत्री का 'परोरजसे सावदोम्' पद है । 'क' = 'कं ब्रह्म' =
ब्रह्म ॥
'क' = 'कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनोऽकामत्वेनोज्जृंभते कामोऽभि-
धीयते तपरिभाषायां कामः ककारं व्याप्नोति' (श्रुति) 'क' = कामेश्वर ॥ 'तत्' =
तदिति ब्रह्म शाश्वतम्' (श्रुति) 'ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥ (गीता)
"सवितुर्वरेण्यम्" = 'श्रेष्ठ भजनीय योनि', जगत् का मूल एवं श्रेष्ठ कारण
= अर्थात् कामेश्वरी ॥
मन्त्र द्वय की समतुल्यता एवं समानार्थकता
| पञ्चदशाक्षरी मन्त्र | गायत्री मन्त्र |
| क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ह्रीं, | “ॐ भूर्भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो |
| स क ल ह्रीं | देवस्य धीमहि धियो यो नः |
| | प्रचोदयात्” |
| प्रथमकूट | |
| १. 'क' (कामनाओं को पूर्ण करने | 'तत्' = ब्रह्म ॥ 'ॐ तत् सदिति' |
| वाला = कामेश्वर) परमात्मा ॥ | |
| २. 'ए' = सरस्वती । त्रिकोण = | 'सवितुर्वरेण्यम्' जीवों की उत्पत्ति करने |
| एकार = (कामेश्वरी) कामेश्वरी 'त्रिकोण | वाली श्रेष्ठ कामेश्वरी ॥ |

२३८ वरिवस्यारहस्ये
शक्तिरेकारेण महाभगगेन प्रसूते |
तस्मादेकार एव गृह्यते ।। |
३. 'ई' = सर्वान्तर्यामी, सर्वाधारशक्ति | 'भर्गो देवस्य धी' = सर्वान्तर्यामी,
| सर्वपोषकशिव ।। 'देव' = सर्वान्तर्यामी
| 'धी' = जगदाधार ।। भर्ग = शिव ।
| ब्रह्मा । आदिम तेज ।। 'धी' में भी
| ईकार स्थित है । 'ई' = तुरीय ।। 'धी'
| = तुरीय ।।
४. 'ल' = पृथ्वी ।। (लकार पृथ्वी | धीमहि ।। मही = पृथ्वी ।। 'मही'—
बीज है ।) ('भूमण्डल मेवोक्तं लकारेण' | महत्व के कारण या काठिन्य के कारण
—श्रुति) | पृथ्वी मही कही जाती है । = 'मही'
| = ५ भूतों का उपलक्षण ।।
५. 'ह्रीं' (माया) । ह = हृदय ।। ही | 'धियो योनः प्रचोदयात्' हम लोगों के
= प्रणव = ब्रह्मा-विष्णु-महेश = (अ) | ध्यान को निष्प्रपञ्च विषय में प्रेरित
(उ) (म) ।। 'हृदयागारवासिनी हृल्लेखा' | करें ।'
(श्रुति) 'इ गतौ' धातु + 'इट किट |
कटी गतौ' |
प्रथमकूट का अर्थ—समस्त जगत् की सृष्टि करने की इच्छा रखने वाला
सिसृक्षारूप कामेश्वर जगत्कारणरूपा कामेश्वरी, शिव, सर्वान्तर्यामी, सर्वाधार,
पञ्चमहाभूतादि के रूप में परिणत, परवस्तु मात्र विषयक निर्विकल्पक ज्ञान जनक
निरञ्जन निर्गुण वेद-प्रोक्त लक्षणों से गम्य शक्ति के द्वारा अगम्य ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा
परतत्व है ।'
द्वितीय कूट एवं तृतीय कूट | गायत्री मन्त्र
पञ्चदशीमन्त्र |
१. 'ह' 'स' 'क' । | 'तत् सवितुः वरेणं'
२. 'ह' | 'भर्गो देवस्य धीः'
१. ॐ तत् सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध स्मृताः ।। (गीता) 'तदिति ब्रह्म
शाश्वतम्' (श्रुति) तत् = 'ब्रह्म' ।। 'क' = ब्रह्म ।। 'कं ब्रह्म' (श्रुति) कामयत इति । कम
(औणादिक) + उः = काम ।। 'कामयते कामी जायते स एव निरंजनोऽकात्वेनोज्जृंभते-
कामोऽभिधीयते । तत्परिभाषायां कामः ककारं व्याप्नोति ।।' (श्रुति) 'काम' = कामेश्वर ।।
'सवितुः' = तु प्रत्यय ।। सवितां प्राणियों के प्रसव का कारण अर्थात् योनि । ऐसा होने
के कारण वह सामान्य तो है नही अतः 'वरेण्य' कहा गया । वरेण्य = श्रेष्ठा भजनीय ।
सविता = कामेश्वरी ।।

द्वितीयोंऽशः २३९
| ३. 'सं' 'क' (तृतीय कूट) | उन्हीं तीन पदों एवं ६ वर्णों का बोध कराते हैं । |
| ४. द्वितीयएवं तृतीय कूटों के शेष वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से ही करना चाहिए ॥ | (त्रिपुरोपनिषद एवं देवी भागवत पुराण में गायत्री विद्या का ऐरम ही अर्थ किया गया है । ) |
| ५. द्वितीय कूटस्थ वर्णत्रय त्रिपदी गायत्री के समतुल्य है । | गायत्री त्रिपदी है । पदत्रय युक्ता है 'तत् = ब्रह्म । शिव ॥ 'तदिति परमात्मा' (श्रुति) |
| 'स'—गायत्री के 'सविता' का बोधक है । | 'स': सवितुः ॥ |
| 'क' ............ | 'वरेण्य' |
| 'ह' (तुर्य हकार) ......... | 'भर्गो देवस्य धी' का बोधक । धीत्यन्त गायत्री के अर्थ अर्थ-बोधक । |
| 'स क' (तृतीय कूट) | पञ्चमहाभूतादि एवं आत्मा |
| लकार एवं ह्रीं | |
आद्या श्रीविद्या ब्रह्म है । यही पञ्चदशीमन्त्र एवं गायत्री मन्त्र दोनों में
प्रतिपादित है । 'सर्वचैतन्यां तामाद्यां विद्यां च धीमहि । बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ।'
यह भी समतुल्य दृष्टि रखने के कारण ध्यातव्य है ।
पञ्चदशीमन्त्र के वाग्भवकूट का अर्थ—आचार्य भास्करराय इसका समष्टिगत
अर्थ बताते हुए कहते हैं—
“एवं चायमर्थो गायत्र्याः प्रथमकूटस्य च संपन्नः—सर्वजगत्सिसृक्षारूप
कामनावान् कामेश्वरः जगत्कारणरूपा कामेश्वरी” शिवः सर्वान्तर्यामी सर्वाधारः
पञ्चमहाभूताद्यात्मना परिणतः परवस्तुमात्र विषयक निर्विकल्पकज्ञानजनको निरञ्जनो
निर्गुणो वेदैर्लक्षणया गम्यः शक्त्या त्वगम्यो ब्रह्म विष्णु रुद्रात्मा परतत्वमिति ॥”१
द्वितीयतृतीयकूटयोरर्थमाह—
त्रिपदी त्रिवर्णबोध्या तुर्यस्तदुपरीषदक्षरीगमकः ।
अथ तार्तीये वर्णद्वितयं त्रिपदीषदक्षरीगमकम् ॥ ६२ ॥
(पञ्चदशी एवं गायत्री मन्त्र के वर्णों का अन्तर्संबन्ध)
अक्षरत्रय (ह स क) द्वारा (गायत्री मन्त्र के) तीन वर्णों (तत् सवितुः वरेण्यं)
को (उनके वाचक के रूप में) जानना चाहिए । चतुर्थाक्षर (ह) परवर्ती छः वर्णों
(भर्गो देवस्य धी) का बोधक है ॥ तृतीय कूट के वर्णद्वय (स क) उन्हीं तीन पदों
एवं छः वर्णों को सङ्केतित करते हैं ॥ ६२ ॥

  • प्रकाश *
    त्रिपदी गायत्रीस्थं पदत्रयं विद्याद्वितीयकूटस्थवर्णत्रयेण बोध्यम् । त्र्यवयवका
    वर्णास्त्रिवर्णाः । 'त्रिगुणसचिवः', 'नवरसरुचिराम्', इत्यादिवत् समासः । तत्पदार्थो

२४० वरिवस्यारहस्ये
ब्रह्मशिववाचिहकारस्यार्थः, 'तदिति परमात्मा' इत्यारभ्य 'हकाराक्षरं शिवरूपम्'
इत्याद्युक्त्वान्ते तत्पदव्यावृत्तिमादाय 'शक्तिं दर्शयति' इति श्रुतेः । सकारस्य सविता
अर्थः । ककारस्य वरेण्यमर्थः । तुर्यो हकारस्तदुपरि पदत्रयोपरि विद्यमाना या षडक्षरी
'भर्गो देवस्य धी' इति तदर्थबोधकः । तृतीयकूटे वर्णद्वितयं सकेति । ताभ्यां
धीत्यन्तगायत्र्या अर्थः प्रतिपाद्यः । उभयत्रापि लकारहृल्लेखाभ्यां पञ्चमहाभूताद्यात्मने-
त्यादिरर्थ इत्याह—कूटद्वितय इति । एवं चतुश्चरणाया गायत्र्यास्त्रिरावृत्ताया अर्थस्य
प्रतिपादकं कूटत्रितयमिति । भागवत इति । भगवत्या इदं भागवतम्, तत्र भगवतीपुराण
इत्यर्थः । तस्य हि पुराणस्यादिमः श्लोकस्त्रिचरणः पठ्यते । यथा—
'सर्वचैतन्यरूपां तामाद्यां विद्यां च धीमहि ।
बुद्धिं या नः प्रचोदयात् ॥'
इति । अत्र ह्राद्यायाः श्रीविद्याया एव ब्रह्मरूपत्व गायत्र्यादिप्रतिपाद्यत्वं
विद्याप्रतिपाद्यत्वादिकं च तदर्थव्याख्यानदर्शिनां स्पष्टम् । वस्तुतस्तु
'हयग्रीवब्रह्मविद्या यत्र वृत्रवधस्तथा ।
गायत्र्या च समारम्भस्तद्वै भागवतं विदुः ॥'
इति लक्षणानुगत्येदमेव भागवतपदवाच्यम्, न पुनः 'जन्माद्यस्य यतो ऽन्वयात्'
इत्यादिकम् ॥ ६२-६३ ॥
* सरोजिनी *
'त्रिपदी..............गमकम्' ॥ तुलना कीजिए—

पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
'ह स क' 'त्रिपदी''तत् सवितुः वरेण्यं' ('त्रिवर्ण')
'ह स क' का वही अर्थ है जो कि 'तत् सवितुः वरेण्यं' का अर्थ है ।
पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
:---:---
'ह' (तुर्य) (चतुर्थवर्ण ह)'भर्गो देवस्य धी' ('षडक्षरी')
'ह स क ह ल' में से चतुर्थाक्षर (ह) का वही अर्थ है जो कि गायत्री मन्त्र
के 'भर्गो देवस्य धी' का अर्थ है ।
पञ्चदशीमन्त्रावयवगायत्रीमन्त्रावयव
:---:---
(तृ०कूट के) 'स-क' ('वर्णद्वितयं)'भर्गो देवस्य धी' 'त्रिपदी षडक्षरी'
सारांश—
१. 'ह स क' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'तत् सवितुः वरेण्यं' (गा०मं)
२. 'ह' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'भर्गो देवस्य धी' (गा०मन्त्र)
३. 'स क' (पं०मन्त्र) के समानार्थी = 'भर्गो देवस्य धी' (गा०मन्त्र)

द्वितीयोंऽशः २४१
कूटद्वितये शेषं पूर्ववदुन्नेयमिति तु विद्यायाः ।
गायत्र्यर्थस्त्रिपुरोपनिषदि कथितस्तथैव भागवते ॥ ६३ ॥
(कूटद्वय के शेष अक्षरों के उद्धार की प्रक्रिया एवं गायत्री विद्या की अर्थ-पद्धति)
कूटद्वय (द्वितीय एवं तृतीय) के शेषाक्षरों का उद्धार (भी) पूर्वोक्त रीति से
करना चाहिए । त्रिपुरोपनिषद एवं देवी भागवत पुराण में गायत्री विद्या का अर्थ उसी
प्रकार (इसी के अनुरूप) कहा गया है ॥ ६३ ॥

  • सरोजिनी *
    प्रथमकूट का उद्धार द्वितीय एवं तृतीय कूट की ही रीति से किया जाना
    चाहिए ॥
    अथ योगिनीहृदये कथितान् भावार्थादीन् षडर्थानाह—
    वामेच्छे ब्रह्मभारत्यौ ज्येष्ठाज्ञाने हरिक्षिती ।
    रौद्रीक्रिये शिवापर्णे इत्येतन्मिथुनत्रयम् ॥ ६४ ॥
    त्रिभिः कूटैः क्रमाद्वाच्यमीकारत्रितयेन तु ।
    एतत्त्रयसमष्ट्यात्म वाच्यं शान्ताम्बिकात्मकम् ॥ ६५ ॥
    (युगलत्रय, कूटत्रय एवं ईकारत्रय—एक विवेचन)
    वामा एवं इच्छा से अभिन्न ब्रह्मा एवं सरस्वती, ज्येष्ठा एवं ज्ञान से अभिन्न
    विष्णु एवं पृथ्वी तथा रौद्री एवं क्रिया से अभिन्न शिव एवं पार्वती—ये तीनों
    युगल क्रमशः तीनों कूटों द्वारा सङ्केतित हैं । इन तीन की समष्टियाँ (पुरुष तत्त्व
    एवं नारी तत्त्व निर्मित समष्टित्रय) जो शान्ता एवं अम्बिकारूपा हैं—ईकारत्रय द्वारा
    सङ्केतित हैं ॥ ६४-६५ ॥
  • प्रकाश *
    प्रकाशस्यांशभूता वामाज्येष्ठारौद्र्यः शक्तियस्तिस्रो ब्रह्मविष्णुरुद्राः पुंरूपाः ।
    तत्समष्टिः शान्तात्मिका शक्तिस्तुरीया । विमर्शस्यांशभूता इच्छाज्ञानाक्रियाः शक्तयस्ति-
    स्रस्तद्भार्यात्वेन प्रसिद्धा भारतीपृथिवीरुद्राण्यः स्त्रीरूपाः । तत्समष्टिरम्बिकात्मिका
    शक्तिस्तुरीया । अत्र च प्रथममिथुनत्रयमीकारविनिर्मुक्तकूटत्रयस्य क्रमेणार्थः ।
    ईकाराणां तु तुरीयमिथुनमर्थः । वक्ष्यमाणे शाक्तार्थे त्वेकैकस्मिन्नपि कूटे रेफान्तवर्ण-
    षट्कस्यापि मिथुनत्रयमर्थ इति तस्माद्भेदः । तदुक्तं योगिनीहृदये—
    'अक्षरार्थो हि भावार्थः केवलः परमेश्वरी ।
    योगिनीभिस्तथा वीरैर्वीरेन्द्रैः सर्वदा प्रिये ।
    शिवशक्तिसमायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः ॥'
    इति । व्याख्यातं चेदममृतानन्दयोगिभिः—'भारत्यादिभियोगिनीभिर्ब्रह्मादिभि-
    १६ वरि.

२४२ वरिवस्यारहस्ये
वीरेन्द्रैः कूटत्रयवाच्यभूतैः 'शिवशक्तिसमष्टिरूपमिथुनेनेकारवाच्यभूतेन चोपलक्षितो
मन्त्रराजो वीरैर्जनितो भावित इत्यर्थः' इति । वस्तुतस्तु, सकलादिनामकास्त्रिविद्या
उपासका वक्ष्यमाणा वीरपदेनोच्यन्ते,
'अहमि प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः ।
पराक्रमपरो भुङ्क्ते स्वात्मानमशिवापहम् ॥'
इत्यादिना परापञ्चाशिकायामन्यत्र च वीरपदस्य साधकपरत्वेनैव निर्वचनात् । अत
एव ब्रह्मादीनामुपासक श्रेष्ठत्वाद्वीरेन्द्रपदवाच्यत्वं सङ्गच्छते । एव च सति तिस्रो
भारत्याद्या योगिन्यस्त्रयः सकलाद्याः साधकास्त्रयो ब्रह्माद्या वीरेन्द्राः कूटत्रयेण
हृल्लेखाविनिर्मुक्तेन क्रमात् प्रतिपाद्याः । हृल्लेखानां तु शिवशक्तिसामरस्यात्मकं चतुर्थं
मिथुनमर्थः, 'ह्रीङ्कार उभयात्मकः' इति वचनात् । वाच्यभूतैर्योगिन्यादिभिर्जनितो युक्तो
मन्त्र इत्यर्थः ॥ ६४-६५ ॥

  • सरोजिनी *
    १. 'वामा + इच्छा' = ब्रह्मा + सरस्वती ॥ २. 'ज्येष्ठा + ज्ञान' = विष्णु +
    पृथ्वी । ३. 'रौद्री + क्रिया' = शिव + पार्वती ॥ ये हैं दिव्य युगल ॥ (दिव्य
    मिथुन) ॥
    (१) वाम-ज्येष्ठा-रौद्री शक्तियाँ—ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र की शक्तियाँ हैं—
    'प्रकाशास्यांशभूता वामा-ज्येष्ठा-रौद्यः शक्तयस्तिस्रो ब्रह्मविष्णुरुद्राः पुंरूपाः ।'१
    १. प्रकाशांशशक्तियाँ—(१) वामा (२) ज्येष्ठा (३) रौद्री
    (ब्रह्मा) (विष्णु) (रुद्र)
    २. विमर्शांशशक्तियाँ—(१) इच्छा (२) ज्ञान (३) क्रिया
    उपरोक्त प्रस्तुत भाव अगले पृष्ठ २४३ पर चित्रित किया गया है ।
    १. 'वामा'— बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी ।
    वामा विश्वस्य वमनादंकुशाकारतां गता ॥२
    २. 'इच्छाशक्ति'—इच्छाशक्तिस्तदा सेयं पश्यन्ती वपुषा स्थिता ।
    ३. 'ज्ञानशक्ति'—ज्ञानशक्तिस्तथा ज्येष्ठा मध्यमा वागुदीरिता ॥
    ४. 'क्रियाशक्ति'— प्रत्यावृत्तिक्रमेणैव शृङ्गाटवपुरुज्ज्वला ।
    क्रियाशक्तिस्तु रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा ॥
    उक्त चार शक्तियाँ एवं पीठ—
    भासनाद्विश्वरूपस्य स्वरूपे बाह्यतोऽपि च ।
    एताश्चतस्रः शक्तयस्तु का पूजा ओम् इति क्रमात् ॥
    १. भास्कराचार्य—'प्रकाश' टीका २. योगिनीहृदय

द्वितीयोऽंशः २४३
व्यापकता के तारतम्य में वाकचतुष्ट्य
पश्यन्तीवाक्
शक्ति → शिव
(विमर्श) (प्रकाश)
मध्यवाक्
बैखरीवाक् परावाक्
प्रकाशांश एवं निष्पत्ति
विमर्शांश का वाकचतुष्ट्य
सामरस्य
चिद्रश्मि (चेतनावाक्)
↓ ↓
प्रकाशांश अम्बिका परावाक् १. अम्बिका + शान्ता → 'परावाक्'
विमर्शांश शान्ता (मूलाधारस्थ)
चिद्रश्मि ↗ ↓ ↓
चिद्रश्मि (चेतनावाक्)
↓ ↓
प्रकाशांश वामा पश्यन्तीवाक् २. वामा + इच्छा → 'पश्यन्तीवाक्'
विमर्शांश इच्छाशक्ति (नाभिस्थ)
चिद्रश्मि ↗ ↓ ↓
चिद्रश्मि (चेतनावाक्)
↓ ↓
प्रकाशांश ज्येष्ठा मध्यमावाक् ३. ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति → 'मध्यमावाक्'
विमर्शांश ज्ञानशक्ति (अनाहत चक्रस्थ)
↓ ↓
चिद्रश्मि ↗ अचेतनवाक्, जड़वाक्,
मृतवाक्, क्षरवाक्, सुषुप्तवाक्
↓ ↓
प्रकाशांश रौद्री वैखरीवाक् ४. रौद्री + क्रियाशक्ति → 'बैखरीवाक्'
विमर्शांश क्रियाशक्ति (कण्ठगत जिह्वागत)
चिद्रश्मि ↗
चिद्रश्मि-शून्य चित्प्रकाश
विरहित = जड़वाक्

२४४ वरिवस्यारहस्ये
('का') = कामरूपपीठ ॥ 'पू' = पूर्णगिरि पीठ ॥ जा = जालंधर पीठ ॥
'ओ' = उड्डीयान, ओड्याण पीठ = 'का पू जा ओ' ॥
'पीठाःकन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः ॥'
इच्छा-ज्ञान क्रिया—शृङ्गाररूपमापन्नमिच्छाज्ञान क्रियात्मकम् ॥
आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि परा सूक्ष्मा
कुण्डलिनी शक्ति शिव के साथ सामरस्यरूपमध्यमन्थक भाव से संघट्टित होकर
उल्लसित होती है । उस उल्लास में तीन शक्तियाँ होती हैं—१. 'इच्छाशक्ति' २.
'ज्ञानशक्ति' ३. 'क्रियाशक्ति' । 'रौद्री शक्ति' को उन्मुद्रित करके कुण्डलिनी ही
'शृङ्गार' रूपा अम्बिकाशक्ति का आश्रय लेकर ओंकार के अवयव 'उ' (ऊकारात्मक)
चन्द्रकला का आकार धारण करती है ।¹ यही 'ज्येष्ठाशक्ति' होती है । (शशि-
बिन्दुओं से कालाग्नि रेफ बिन्दुओं की परम्परा से रेखा निकलती है । इस स्फुरण
से जो वर्णाकृति बनती है वही यह 'अ' अक्षर है ।)²
'अ' का मुख 'वामा' है । उसका सिर रौद्रीशक्ति है । उसकी बाहु 'अम्बिका'
है । उसका आयुध ज्येष्ठा शक्ति है ।
आकारस्य शिरोरौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता ।
अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैवायुध स्मृता ॥'³
'इच्छाशक्ति' स्पन्दात्मिका होती है । इसमें बाह्य औन्मुख्य होता है । इसके
दो प्रकार हैं—१. सर्जन में अनारूषित इच्छामात्र रूपा २. प्रक्षुब्धता के कारण
प्रयत्न-प्रवृत्ता ॥४
'ज्ञानशक्ति'—प्रक्षुब्ध अवस्था के पूर्व स्वात्मनिष्ठ परामर्श था ('एक वीरक
परामर्श') । यह विश्व के कारण रूप में था । उसी परामर्श से विश्वोन्मेष रूप
बाह्यस्पन्द हुआ । उस रूप में अवस्थित उस परामर्श को 'ज्ञानशक्ति' कहते हैं जो
कि पञ्चम बीज के जन्म का कारण है । पर प्रमाता में सिसृक्षा का प्रत्यवमर्श होता
है । यही 'इच्छाशक्ति' है । 'प्रमातुः सिसृक्षात्मा परामर्श उदेति सेय मिच्छाख्या
शक्तिः ॥'५
चिन्ता ही इच्छा की प्रथम 'त्रुटि' है ।६
इच्छाशक्ति में १. सन्निकृष्ट २. विप्रकृष्ट भेद होते हैं । उसी प्रकार ज्ञान शक्ति
में भी दो भेद होते हैं—१. ज्ञेय का अनाधिक्य २. ज्ञेयाधिक्य । उन्मेष शक्ति ही
इच्छा शक्ति है । क्रिया निरञ्जना देवी है—'क्रिया देवी निरञ्जनम्'७ ज्ञानशक्ति
समस्तमन्त्रों की माँ है—"ज्ञानशक्तिः परा सूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः
सर्वमन्त्राणां सर्वत्राणविपत्स्थिता ॥''८

१. तन्त्रालोक—जयरथकृत टीका 'विवेक' (तृ० आ० श्लोक ६७)
२-७. तन्त्रालोक—'विवेक' ८. नेत्रतन्त्र

द्वितीयोंऽशः २४५
परमशिव की पाँच शक्तियाँ हैं—१. चित्शक्ति २. आनन्दशक्ति ३. इच्छाशक्ति
४. ज्ञानशक्ति ५. क्रियाशक्ति। इनका स्वरूप क्या है?
प्रकाशरूपता ही चिच्छक्ति है—'प्रकाशरूपता हि विच्छक्तिः ॥'१ लेकिन
'प्रकाश' क्या है? अनन्योन्मुख विमर्श ही प्रकाश है—'प्रकाशश्च अनन्योन्मुखविमर्शः
अहमिति ॥'२ 'आनन्दशक्ति' क्या है? 'स्वातन्त्र्य ही आनन्द शक्ति है ॥' 'स्वातन्त्र्यं
आनन्दशक्तिः ॥'३ 'इच्छाशक्ति' क्या है ? 'तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः'४ 'ज्ञानशक्ति'
क्या है ? 'आमर्शात्मकता ही ज्ञान शक्ति है' : आमर्शात्मकता ज्ञानशक्ति 'आमर्श'
क्या है ? ईशत्तया वेद्योन्मुखता ही आमर्श है—'आमर्शश्च ईषत्तया वेद्योन्मुखता'५
'क्रियाशक्ति' क्या है? 'सर्वकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥' सर्वाकार योगित्व ही क्रिया
शक्ति है ।६ 'जन्ममरणविचार' नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य की पुष्टि एक साथ करते
हुए कहा गया है कि—"एक एव अस्ति संविदात्मा महेश्वरः । तस्य प्रकाशरूपता
चिच्छक्तिः, स्वातंत्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः, आमर्शात्मकता
ज्ञानशक्ति, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥"७
(क) इस उपर्युक्त श्लोक में आचार्य भास्कर का कथन है कि—
१. वामा, इच्छा, ब्रह्मा, सरस्वती \ \ \ \ \ \ ⎧ ये तीनों शक्तियाँ एवं दम्पत्ति तीनों
२. ज्येष्ठा, ज्ञान, विष्णु, पृथ्वी \ \ \ \ \ \ \ ⎪ कूटो (वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं
३. रौद्री, क्रिया, शिव, पार्वती \ \ \ \ \ \ \ \ ⎨ शक्तिकूट) के प्रतिनिधि या तीनों
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ ⎩ कूटों के वाच्य हैं ।
(ख) भास्करराय फिर कहते हैं कि—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में जो ईकार त्रय है
वह शान्ता एवं अम्बिकारूपा उक्त दम्पतित्रय एवं शक्तित्रय को सङ्केतित करता है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि—'प्रकाश' (शिव) की अंशभूता 'वामा'
'ज्येष्ठा' एवं 'रौद्री' शक्तियाँ ही ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र के रूप में पुरुषाकारित हैं ।
उनकी समष्टि शान्तात्मिका है जो कि तुरीय शक्ति है । विमर्श (शक्ति) की
अंशभूता शक्तियाँ 'इच्छा' 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' रूपा शक्तियाँ हैं । भार्या के रूप में
गृहीत भारती, पृथ्वी एवं रुद्राणी शक्तियाँ स्त्रीरूपा है । उनकी समष्टि जो कि
अम्बिकारूपा है वह 'तुरीय शक्ति' है । यहाँ पर प्रथम दम्पति (मिथुन) त्रय
ईकारविनिर्मुक्त कूटत्रय के वाचक हैं क्योंकि ईकारत्रय का तो 'तुरीयमिथुन' है ।
तीनों भारती आदि, योगिनीत्रय, सकुलादिक साधकत्रय, ब्रह्मादिक उपासक श्रेष्ठ
वीरेन्द्र—हल्लेखा विनिर्मुक्त कूटत्रय द्वारा क्रमानुसार प्रतिपादित हैं । हल्लेखाओं
(ह्रीं, ह्रीं, ह्रीं) का तो शिवशक्ति सामरस्यात्मक चतुर्थ मिथुन है । 'ह्रींकार
उभयात्मकः' ऐसा कहा गया है । वाच्यभूत योगिनी आदि से जन्य एवं युक्त ही

१. तन्त्रसार \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ २. प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (३.१.४)
३-६. तन्त्रसार \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ ७. भट्टवामदेवाचार्य—'जन्ममरणविचार'

२४६ वरिवस्यारहस्ये
'मन्त्र' हुआ करते हैं । 'योगिनीहृदय' में कहा गया है—अक्षरार्थो हि भावार्थः
केवलः परमेश्वरी । योगिनीभिस्तथा वीरै वीरेन्द्रैः सर्वदा प्रिये । शिवशक्ति
समायोगाज्जनितो मन्त्रराजकः ॥'
एतमेर्वा मनसिनिधायाह—
यद्वा गीःसकलब्रह्मप्रभृतीनां त्रयं त्रयम् ।
त्रिकूटवाच्यं मायायास्तुरीयं मिथुनं मतम् ॥ ६६ ॥
(मिथुनत्रय एवं कूटत्रय में अंतसंबंध)
अथवा भारती एवं अन्य, सकल एवं अन्य, तथा ब्रह्मा एवं अन्य के त्रिकों
का त्रिक ('माया' = 'ह्रीं' शब्द से रहित) कूटत्रय का वाचक है । माया (ह्रींकार)
का (अर्थात् ह्रींकार के द्वारा इंगित) चतुर्थ मिथुन (शिवशक्तिरूप) है !। ६६ ।।

  • प्रकाश *
    अथ वा, वीरपदं योगिनीनामेव विशेषणमतल्लिङ्गम् । अत एव ब्रह्मादीनां
    वीरपतिवाचकवीरेन्द्रपदेन निर्देशः । योगिनीवीरेन्द्रपदाभ्यां च शाक्तार्थे वक्ष्यमाणानां
    षण्णामक्षराणां ब्रह्मभारत्यादिवाचकानां परामर्शः । शिवशक्तिसमायोगपदेन काम-
    कलायाः परामर्शः, तस्यामुभयोगस्यानुपदं वक्ष्यमाणत्वात् । एवं सप्तभिरक्षरैस्त्रिरा-
    वृत्तैर्मन्त्रराजो जनितः प्रादुर्भूत इत्यर्थः एतत्सप्तकपरिणामत्वान्मन्त्रो ऽपि तदात्मकः
    प्रसारपरमार्थन्यायादिति भावः । न च मन्त्रयोत्पत्त्यङ्गीकारे ऽनादित्वभङ्गः, निर्विशेष-
    ब्रह्मातिरिक्तस्य निखिलस्यापि सृष्टिप्रतिपादकशास्त्रप्रामाण्याज्जन्यत्वस्येष्टत्वेन सविशेष-
    शक्तिवदजन्यत्वरूपानादित्वस्यानभिमतत्वात् । प्रवाहानादित्वं तु जन्यत्वाङ्गीकारे ऽपि
    नानुपपन्नम्, कार्यमात्रस्य स्थूलसूक्ष्मरूपद्वयस्वीकारेणोत्पत्तेः पूर्वमपि कारणान्तः
    सूक्ष्मरूपेणावस्थानस्य सत्कार्यवादिरभिरस्माभिरङ्गीकारेणानादित्वप्रतिपादकवचनानां
    तत्परत्वेनाप्युपपत्तेः । प्रथमपक्षद्वये तु जनितपदादेरर्थो न स्वरसः । अत एवोत्तरग्रन्थे
    भारत्यादिसप्तकसमष्टिरूपायाः परदेवताया मन्त्राभेदप्रतिपादनं सङ्गच्छते, वाचकाक्षर-
    समष्ट्यात्मकमन्त्रस्य वाच्यार्थ समष्ट्यात्मकपरदेवताभेदस्य वाच्यवाचकयोरभेदवादि-
    नामस्माकं न्यायसिद्धत्वेन संदर्भशुद्धेः । यथा—
    'तन्मयीं परमानन्दनन्दितां स्पन्दरूपिणीम् ।
    निसर्गसुन्दरीं देवीं ज्ञात्वा स्वैरमुपासते ॥
    शिवशक्त्यात्मसंघट्टरूपे ब्रह्मणि शाश्वते ।
    तत्तथाप्रसराश्लेषशालिन्यैन्द्रोपलक्षिते ॥
    ज्ञातुर्ज्ञानमयाकारकरणात्मनरूपिणीम् ।
    तेषां समष्टिरूपेण परा शक्तिस्तु मातृका ॥'
    इति । तन्मयीं मन्त्रराजाभिन्नाम् । 'आनन्दमयः', 'चिन्मयः', इतिवदभेदेमयट् ।
    अन्ये तु 'तुरीयकूटस्यार्थमाह—तन्मयीमिति । चतुर्थमिथुनवाचकत्रिबीजसमष्टिरूपमन्त्र-

द्वितीयोऽंशः २४७
वाच्यमित्यर्थः' इति व्याचक्षते । तन्नातीव संदर्भशुद्धं वाच्यार्थे मयदभावश्चेत्युपेक्ष्यम् ।
स्पन्दः षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणामः, तद्रूपिणीं तदभिन्नाम् । एतेन देवताभिन्नविश्वस्यापि
मन्त्राभेदः सूचितः । अव्याकृतनामरूपप्रपञ्चस्योत्पत्त्युन्मुखतैव स्पन्दोन्मेषव्याकरणादि-
शब्दैर्व्यवह्रियते 'नान्यत् किञ्चन मिषत्', 'नामरूपे व्याकरण्वाणि', 'न खलु कुशलः
स्पन्दितुमपि' इत्यादौ । तेनाव्याकृतनामरूपजगत एव स्पन्द इति प्रायेण तन्त्रेषु
व्यवहारः । इत्थं मन्त्रदेवताजगतामभेदमनुसंदधानो मन्त्रं जपेदिति विधत्ते—स्वैरमुपासत
इति । पञ्चमो ऽयं लकारो लिङर्थे । 'मुखं व्यादाय स्वपिति' इतिवत् समानकालिकत्वे
ऽपि 'ज्ञात्वा' इत्यत्र क्त्वाप्रत्ययः । एवं देवतायां मन्त्राभेदं युक्तिभिः प्रतिपाद्य
मन्त्रपदस्यावयवशक्त्तिरपि समस्तीति प्रदर्शयति—शिवेत्यादिसार्धश्लोकेन । शिव-
शक्त्यात्मनोः संघट्टः सामरस्यं तद्रूपे । शाश्वते ऽनादिनिधने । तस्य प्रथायाः पृथुत्वेन
प्रसरो जगद्रूपः, तदाश्लेषशालिन्यप्यैन्द्रेण जगदैश्वर्येण काकेनेवोपलक्ष्यते, न तु विशिष्टे ।
विषयत्व सप्तम्यर्थः । तथा च सत्यत्वज्ञानत्वाद्युपलक्षितशुद्धब्रह्मैकविषयक-
निर्विकल्पकज्ञानवतः साधकपुंगवस्य ज्ञानमयः स्वसंविद्रूपो ब्रह्मभावो य आकार-
स्तत्करणान्मन्तारमुक्तज्ञानरूपमननशालिनं त्रायते भयजनकद्वितीयपदार्थमात्रनिरासादिति
मन्त्रपदावयवार्थः । तद्रूपिणीमिति विध्यन्तर्गतदेवीपदस्य विशेषणम् । मन्त्र इति पदस्य
देव्यामनुगत्तिमुपपाद्य तत्पदार्थभूतं पञ्चदश्यभिन्नत्वं संमुग्धाकारेण प्रतिज्ञातपूर्वमपि हेतुना
द्रढयति—तेषामिति । तुशब्दो ऽत्र हेत्वर्थकः । यतो भारत्यादीनां समष्टिरूपेणोपलक्षिता
माता, ततस्तस्यां तद्वाचकाक्षरसमष्ट्यात्मकविद्याभेद उपपद्यत इति भावः । अथ वा,
मन्त्रपदस्यावयवशक्त्या प्रवृत्तिमपपाद्य समुदायशक्त्यापि तामुपपादयितुं मन्त्रराज-
पदशक्यतावच्छेदकं भारत्यादिसप्तकसमिष्टत्वं(?) परदेवतायामाह—तेषामिति ।
समष्टीति भावप्रधानो निर्देशः । समष्टित्वेन शक्यतावच्छेदकरूपेण युक्ता यतः
परदेवता, ततो रूढ्यापि मन्त्रराजपदवाच्यत्वं युक्तम् । तेन च तयोरभेदो ऽपि युज्यत
इति भावः ।। ६६ ।।

  • सरोजिनी *
    मिथुनत्रय एवं कूटत्रय में अभेदात्मकता प्रतिपादन
    १. ब्रह्मा और भारती (अर्थात् वामा + इच्छाशक्ति) ┐
    २. हरि और क्षिति (अर्थात् ज्येष्ठा + ज्ञानशक्ति) ├ 'मिथुनत्रय' कहे गए हैं ।
    ३. शिव और अपर्णा (अर्थात् रौद्री + क्रियाशक्ति) ┘
    ३ कूट : १. वाग्भवकूट ┐
    २. कामराजकूट ├ मिथुनत्रय कूटत्रय के वाच्य हैं ।
    ३. शक्तिकूट ┘
    मिथुनत्रय = कूटत्रय ।।
    'कूटत्रयात्मिकां देवीं समष्टिव्यष्टिरूपिणीम्' कहकर कूटत्रय की देव्यात्मकता का
    प्रतिपादन भी किया गया है ।

२४८ वरिवस्यारहस्ये
'वामादिषट्क' = कामकला से अभिन्न है ।
वामादिकामकलान्तसप्तक—मन्त्र से अभिन्न है ।
अमुमेवार्थं सुनिष्कृष्टं श्लोकतो निबध्नाति—
वामेच्छाद्याः षडीकार इति सप्तभिरक्षरैः ।
त्रिरावृत्तैरियं विद्या सञ्जाता तेन तन्मयी ॥ ६७ ॥
वामादिसप्तशक्तीनां समष्टिः परदेवता ।
षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपास्मान्मात्रयापि न भिद्यते ॥ ६८ ॥
(पञ्चदशाक्षरी विद्या का स्वस्वरूप)
यह विद्या सात अक्षरों से निर्मित हुई है । इसमें वामा, इच्छा आदि छः
शक्तियाँ एवं ईकार सम्मिलित हैं जिनकी तीन बार पुनरावृत्ति की जाती है । अतः
(यह विद्या, इनके द्वारा व्यक्तीभूत) उन (शक्तियों) से युक्त हैं ॥ ६७ ॥
(परात्परशक्ति का सप्त शक्तियों एवं छत्तीस तत्त्वों से तादात्म्यभाव)
परदेवता (परात्परशक्ति) वामादिक सात शक्तियों की समष्टि है । और छत्तीस
तत्त्वों का मूर्तिमानस्वरूप है । (यह)मन्त्र किंचिन्मात्रा में भी भिन्न नहीं है ॥ ६८ ॥

  • प्रकाश *
    अस्मात् तन्मन्त्रात्, मात्रयापि लेशेनापि न भिद्यते । मन्त्रे तृतीयवर्णस्य ज्येष्ठा-
    शक्तिवाचकत्वेन वामादिषट्कान्तः पातित्वेनावशिष्टानां हृल्लेखास्थानामेव कामकला-
    नामीकारपदेन परामर्शान्न त्रिरावृत्तैरिति संख्याविरोधः । न च शाक्तार्थेन पौनरुक्त्यम्,
    तत्र वामादिषट्कं कामकलाया अभिन्नमिति वाक्यार्थः, अत्र तु वामादिकामकलान्त-
    सप्तकाभिन्नो मन्त्रः षट्त्रिंशत्तत्त्वाभिन्नमात्रभिन्न इत्यर्थ इति महतो भेदात् । अथ वा,
    शिवशक्तिसमायोगरूपसमष्टिजन्यत्वान्मन्त्रराजः स्पन्दश्च तद्व्यष्टिरूपौ शिवशक्तिमयौ ।
    तेन जगन्मन्त्रदेवीनामभेद इति भावनं भावार्थः । अत एवोपसंहृतं योगिनीहृदये—
    ‘.....................चलतासंस्थितस्य तु ।
    धर्माधर्मस्य वाच्यस्य विषामृतमयस्य च ।
    वाचकाक्षरसंयुक्तैः कथिता विश्वरूपिणी ।
    तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिं तु मातृकाम् ।
    कूटत्रयात्मिकां देवीं समष्टिव्यष्टिरूपिणीम् ।
    आद्यां शक्तिं भावयन्तो भावार्थ इति मन्वते ।'
    इति । पराहंतेत्यादिभावार्थकत्वतलादिवाच्यत्वाद्धर्मः शक्तिः । निर्धर्मकत्वादधर्मः
    शिवः । स्पन्दजननं प्रति शक्तिबहिर्भूतस्य शिवस्याक्षमत्वादन्वयव्यतिरेकयोराचार्य-
    भगवत्पादैः सौन्दर्यलहर्या प्रथमश्लोके तथैव तद्व्याख्यानकर्तृभिश्च प्रदर्शितत्वाच्च शक्तेः

द्वितीयोंऽशः २४९
कारणतावच्छेदकत्वं कारणत्वं भवचक्रात्मकस्पन्दं प्रति स्वीकार्यम् । तेन जनन-
मरणादिक्लेशमयसंसारजनकत्वाद्विषं शक्तिः । तद्विनिर्मोकादमृतं शिवः । तदुभयस्य
वाच्यस्य वाचके ये अक्षरे वक्ष्यमाणरीत्या हकाराकाररूपे, ताभ्यां व्यस्ताभ्यां
तदुभयसमावेशरूपकामकलाक्षरेण चास्य चलतासंस्थितस्य नश्वरतायुक्तस्य जगतः,
प्रकृतत्वान्मन्त्रराजस्य च सम्यक्परिणामपरिणामिभावेन युक्तेः संबन्धादेषां१ विद्या
विश्वरूपिणी कथिता, एकाकारेणोत्पन्नयोरभेदादिति२ शिवशक्तिसामरस्यरूपस्य
पराशक्तिजगदम्बादिपदवाच्यस्य कारणस्य कार्याभ्यां विश्वविद्याभ्यामभेदं सूचयं-
स्त्रयाणामभेदमुपसंहरति तेषामित्यादिनेति तदर्थः । अस्मिन् पक्षे योगिन्यादिभिर्भावित
इति शेषपूरणेनोपक्रमश्लोकार्थो वर्णनीयः । भावार्थस्वरूपं तु शिवशक्तिसमायोग-
जन्यत्वादिकमात्रम्, न पुनर्योगिन्यादेर्जनककोटौ निवेशः । अक्षरार्थत्वं च तादृशाक्षर-
द्वयजन्यत्वादेवेति दिक् । अत्रेदमवधेयम् — इयं सृष्टिः परब्रह्मपरिणाम इति पूर्वमुक्तम्,
सा च सृष्टिर्द्विधा, अर्थमयी शब्दमयी चेति । चक्रमयी देहमयी चेति सृष्टिद्वयं तु
बालक्रीडनकार्थं स्थूलगृहसमानाकारत्वेन सूक्ष्मगृहनिर्माणतुल्यमर्थसृष्टावेवान्तर्गतम्, न
पुनरत्यन्तं भिद्यते । सा च द्विविधापि सृष्टिः समकालीनोत्पत्तिका समकालीना-
भिवृद्धि-शालिनी च, यथा बीजादङ्कुरतच्छाया । तत्र च छायादर्शनेन वृक्षानुमिति-
रनुभवसिद्धा । स च छायायां वृक्षसमानाकारत्वं वृक्षाविनाभावं च विना अनुपपन्नेति
तद्द्वयमपि तत्र कल्प्यम् । प्रत्यक्षसंवादविषयश्च तद्वच्छब्दः सर्वो ऽप्यर्थाविनाभूतः,
अर्थज्ञानजनकज्ञानविषयत्वात् 'वागर्थाविव संपृक्तौ' इत्याद्यभियुक्तोक्तेश्च । तथार्थ-
समानाकारो ऽपि । तथा हि—यावन्तः शब्दे ऽवयवास्तावन्त एवार्थे तज्ज्ञाने
चाभ्युपेयाः । 'चैत्रस्तण्डुलं पचति' इत्यत्र चैत्रपदं सुप्रत्ययस्तण्डुलपदमम्प्रत्ययः
पचिधातुस्तिप्रत्ययश्चेति षडवयवात्मकस्य शब्दसमूहस्य चैत्रः कर्तृत्वं तण्डुलः कर्मत्वं
तेजःसंयोगः कृतिश्चेति विशकलिताः षडर्थाः । तेषां च परस्परसमभिव्याहारस्य तु
परस्परसंबन्धविशेषोऽर्थः । तत्तत्पदार्थविशिष्टा भावनैव वाक्यार्थ इति मीमांसकाः ।
तत्तदितरव्यावृत्तिर्वाक्यार्थ इत्यपि केचित् । एवं तज्ज्ञानमपि षट् पदार्थांस्तत्संबन्धादींश्च
विषयीकुर्वत् तत्समानाकार भवति अन्यथा ज्ञानानां परस्परवैलक्षण्यानुपपत्तेः ।
अन्तःकरणपरिणामविशेषरूपे ज्ञाने तत्तदाकारत्वेन परिणतवकल्पनसंभवाच्च । अत
एव 'चैत्रस्तण्डुलं पचतीत्याकारकं ज्ञानम्' इत्येव सकलतान्त्रिकाणां निराकारवादिना-
मपि व्यवहारः । अनयोः सृष्ट्योर्ज्ञानजनकं तु मन एव । तच्च शब्द श्रोत्रेन्द्रियद्वारैव
गृह्णाति, अर्थं तु कञ्चन साक्षात् कञ्चन चक्षुरादिद्वारेति विशेषः । ते च द्वे अपि सृष्टी
स्थूलसूक्ष्मसूक्ष्मतरसूक्ष्मतमभेदात् प्रातिस्विकं चतुर्विधे । श्रोत्रमनसोस्त्वर्थान्तःपातित्वादेव
चातुर्विध्यम् । एवं च स्थूलश्रोत्रेण स्थूलशब्दश्रवणात् स्थूलार्थस्य स्थूलमनसा ज्ञानम्,
सूक्ष्मश्रोत्रेण सूक्ष्मशब्दश्रवणात् सूक्ष्मार्थस्य सूक्ष्ममनसा ज्ञानमित्यादि द्रष्टव्यम् ।

...Wait, what is line 12? Let's read line 12 from the scan:ब्रह्मैव । तच्चप्रकthen spaceशैकाकारस्यार्थादत्यन्तभिन्नस्य शब्दब्रह्मादिपदनिर्देशविशेषस्याभावात्Wait, look at line 12: Is thatतच्च प्रकाशैकाकारस्यार्थादत्यन्तभिन्नस्य? Wait! Look at the words: तच्च प्रकाशैकाकारस्य- the 'ा' between 'क' and 'श' is broken/missing, soतच्चप्रक शैकाकारस्यorतच्च प्रकाशैकाकारस्य? Wait, why does it say प्रकाशैकाकारस्यार्थादत्यन्तभिन्नस्य? Wait, in line 12, is it प्रकाशैकाकारस्यorप्रकाशैकस्वरूपस्य? Wait, it says: ...र्थादत्यन्तभिन्नस्य(arthād atyantabhinnasya) Then:शब्दब्रह्मादिपदनिर्देशविशेषस्याभावात्! Wait, look at: शब्दब्रह्मय दिपद...- no, look at the character after 'ह्म': It is 'ा' with a smudge or 'ादिपद'! Yes,शब्दब्रह्मादिपदनिर्देशविशेषस्याभावात्. Wait, look at line 13: ‘अनिर्देश्यम्’, ‘अग्राह्य

एवान्ते यस्येति विग्रहप्रदर्शनपूर्वकं हकारविशिष्टादकारादिति व्याचक्षते । तन्मते हकारे
शून्यत्वलाभो दुर्घटः । अत्रायं सृष्टिक्रमः—यथा हि कश्चित् पुरुष उत्पत्स्यमानपुत्राद्य-
दृष्टवशादुत्पादनेच्छाविशिष्टः स्वीयामुत्पादनशक्तिमवलोक्य स्वार्धशरीरात्मिकायां
भार्यायां स्वयमन्तः प्रविशति शुक्लरूपेण, 'पतिमेकादशं कृधि', 'आत्मा वै
पुत्रनामासि' इति श्रुतेः । प्रवेश्यमानस्य स्वभिन्नत्वात् स्थूलतरभेदाक्रान्तत्वाच्च नाभैद-
मानम् । ततस्तस्य शुक्लस्यान्तः शोणितबिन्दुरूपेण भार्या प्रविशति । तेन च स
बिन्दुरुच्छूनो भवति । स एष वटोदुम्बरादिबीजस्थानीयः । तस्मादङ्कुर-
विशेषाद्युत्पत्तिक्रमेण कालान्तरे पुत्राद्युत्पत्तिरिति । यथा वा सूर्याभिमुखदर्पणे तदन्तः
प्रविष्टकिरणादुभयकिरणसङ्कलनरूपस्तेजोबिन्दुविशेषः कुड्यादौ प्रादुर्भवति, तथा
प्राण्यदृष्टवशात् स्वान्तःसंहतविश्वसिसृक्षया प्रकाशरूपं ब्रह्म स्वीयां शक्तिमवलोकयितुं
तदभिमुखोभूय तदन्तस्तेजोरूपेण प्रविश्य शुक्लबिन्दुभावमयते । ततस्तं बिन्दुं रक्तरूपा
शक्तिः प्रविशति । तेन संमिश्रबिन्दुरुच्छूनो भवति । तत्र च हार्दकलारूपो ऽप्येकः
पदार्थविशेषो भवति । स पुनर्गुरुमुखादेवावगन्तव्यः, न पुनः पुस्तके लेख्यः । स च
बिन्दुः समष्टिरूपेणैकः स्फुटशिवशक्तिसामरस्यनामा 'कामो रविरग्नीषोमात्मकः'
इत्यादिशब्दैर्व्यवह्रियते । व्यष्टिरूपेण द्वयम् । तत्र शुक्ल इन्दू रक्तो ऽग्निरिति
बिन्दुद्वयात्मकत्वाद्विसर्ग इति च व्यवह्रियते । अत एव च रवे रात्रावग्नावमावास्यायां
चन्द्रे च प्रवेशस्य श्रुत्यादिसिद्धत्वात् समष्टिबिन्दो रवित्वम् । एवं च कामाख्यो बिन्दु-
र्विसर्गो हार्दकला चेति त्र्यवयवक एकः पदार्थो ऽणादिप्रत्याहारवत् कामकलेत्युच्यते ।
इदमेव च १समस्तसृष्टिबीजम् । अत एवाकारहकारयोर्मध्ये सर्ववर्णपाठः । ळकारस्य
लकारादभिन्नत्वात्, क्षकारस्य कषयोगरूपत्वान्न तद्बहिर्भावः शङ्क्यः । एतन्मूलभूतं
ब्रह्म तु तुरीयबिन्दुरित्युच्यते । तद्रूपाभ्यां शून्यस्वरूपाभ्यामकारहकाराभ्यामुत्पन्ना
कामकला व्यक्ताव्यक्तविलक्षणा अहंपदवाच्या । अकारहकारोभयात्मकत्वं शिवशक्ति-
द्वयरूपत्वं चाहंपदस्य निष्कृष्टो ऽर्थः । अत एव तज्जन्यानां सूक्ष्मादिस्थूलान्तानामखिल-
सृष्टीनामहंपदवाच्यत्वम् । यथा ह्युदुम्बरपदवाच्यबीजाज्जनितानां परस्परविलक्षणानामपि
पर्णकाष्ठकुसुमफलक्रिमीणां सर्वेषामुदुम्बरत्वम्, 'उदुम्बरपर्णम्', 'उदुम्बरक्रिमिः',
इत्यादिव्यवहारात् । तथा च श्रुतयः—'ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्; तदात्मानमेवावेदहं
ब्रह्मास्मीति' इति बृहदारण्यके; 'त्वं वा अहमहं वै त्वम्' इत्याैतरेयके; 'कस्त्वमित्यह-
मिति होवाच त्वमेवेदं सर्वं तस्मादहमिति सर्वाभिधानम्' इति तापनीये । पाणिनिनाप्य-
स्मच्छब्दस्य सर्वनामतोक्ता । तत्रैवान्यत्र 'तद्वा एतद्ब्रह्माद्वयम्' इत्यादिना ब्रह्मस्वरूपम-
भिधाया तदुपासनां पूर्णाहंभावभावनारूपां विस्पष्टम् 'हंसः सोऽहम्' इत्यादिना
विदधाति । तन्त्रकारस्त्वतिरहस्यत्वाद् गुरुचरणैकलभ्यः । उक्तं च कादिमते—
'बन्धनं योनिमुद्राया मन्त्राणां वीर्ययोजनम् ।
गुरोर्लक्षणमेतावदादिमान्त्यं तु वेदयेत् ॥'
इति । आदिमो ऽकारः, अन्त्यो हकारः, तयोः समाहारः 'अहम्' ।
बिन्दुलाभायैवेत रेतरयोगद्वन्द्वपरित्यागेन समाहारद्वन्द्वोक्तिः । छान्दोग्ये ऽपि 'अहमेवाध-
स्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतो ऽहमुत्तरतो ऽहमेवेदं सर्वम्' इति ।
१. समष्टि

२५२ वरिवस्यारहस्ये
विरूपाक्षपञ्चाशिकायामपि—
'स्वपरावभासनक्षम आत्मा विश्वस्य यः प्रकाशो ऽसौ ।
अहमिति स एक उक्तोऽहंतास्थितिरीदृशी तस्य ॥'
इत्यादीनि परःसहस्रं वचनानि । एतादृशस्याहंपदार्थस्य यथा ऽहमिति पदं वाचकं
तथोत्तमपुरुषैकवचनमपि वाचकम् । तस्य च परस्मैपदात्मनेपद भेदेन द्वैविध्ये ऽपि मिप
दृष्टश्रैकारत्वेनानुगमादित्वमेव शक्ततावच्छेदकम्, 'अन्यायश्चानेकशब्दत्वम्' इति
न्यायात् । तस्य च धातूत्तरत्वेनोत्तमपुरुषत्वादिना वोपस्थितिः पदार्थस्मारकत्वे तन्त्रम् ।
एर्णलादावपि लुप्तस्य स्मरणम्१ । तदभावे शक्तिभ्रमाद्बोध इत्यादि यथायथमूह्यम् । तत्र
चाकारहकारयोरवयवयोर्दर्शने ऽपि शास्त्रप्रामाण्यात् सूक्ष्मरूपौ तौ स्त इति
स्वीकार्यम् । तस्यैव च हार्दकलायोगे दीर्घतापि संपद्यत इति तुरीयस्वरस्य कामकला

द्वितीयोऽंशः २५३
रूपा सृष्टिरित्यर्थः । तद्रूपं व्योम हकार इत्यर्थो युक्तः, ‘हः शिवो गगनं प्राणः’ इति
मातृकाकोशात् । मध्यम इत्यस्य द्विरन्वयः । तत्रैकं पदं मन्त्रपिण्डेन सह सामानाधि-
करण्येनान्वेति, अपरं वैधिकरण्येन । मध्यमकूटस्य मध्यमव्यञ्जने । द्वितीयंहकार
इत्यर्थः, द्वितीयगेषु सप्तसु व्यञ्जनेषु तस्य चतुर्थत्वेन मध्यमत्वात् । तत्र स्थिता ।
स्त्रीलिङ्गाच्छक्तिर्विशेष्या । तृतीयकूटे तु सकारे ऽकारो मूलबीजीय इत्याह—
राहुकूटेति । लघुषोढान्यासान्तर्गतग्रहन्यासे राहोः शषसहाख्यवर्णचतुष्टयसहितस्य वक्त्रे
न्यासः, ‘वक्त्रे शादिचतुर्वर्णैः सहितं राहुमेव च’ इति वचनात् । तेन शादिचतुष्कं राहु-
कूटम् । तत्र द्वयादिद्भिन्नो ऽद्वयस्तृतीयः सकारः । तस्मिन् स्फूर्जच्छोभमानम् । नपुंसक-
लिङ्गबलाद् ब्रह्म विशेष्यम् । शिव इत्यर्थः । इत्यलमतिरहस्यार्थप्रकाशनेन ॥ ६७-६८ ॥

  • सरोजिनी *
    ‘सप्तभिरक्षरैः’—‘पञ्चदशाक्षरी विद्या’ जिसमें १५ वर्ण हैं वह अक्षर-पुनरावृत्ति
    से रहित गिनने पर मात्र ७ वर्णों से ही निर्मित हुए हैं—
    (क) पञ्चदशीविद्या के १५ अक्षर—
    ‘क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं’ = १५ वर्ण
    (५) (६) (४)
    (ख) पञ्चदशी विद्या में मात्र ७ अक्षर—
    क, ए, ई, ल, ह, स, ‘ह्रीं’ = ७ वर्ण
    (ग) सावृत्तिपूर्ण वर्ण—१३ वर्ण
    क ए ई ल ह्री, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्री । में ‘क’ = ३ बार
    आया । ‘ल’ = ३ बार आया । ‘ह’ = २ बार आया । ‘स’ = २ बार आया ।
    ‘ह्री’ = ३ बार आया ।
    सारांश—(क) ए, ई, = २ वर्णों की पुनरावृत्ति नहीं हुई ।
    (ख) १३ वर्णों की पुनरावृत्ति हुई ।
    (ग) वैसे तो ‘ह्री’ में ‘इ’ है अतः उसे भी मान लिया जाय तो ‘ई’ की
    पुनरावृत्ति = ४ बार हुई ।
    (घ) इस दृष्टि से ‘ए’ (वाग्भव बीज = सरस्वती बीज) ही ऐसा वर्ण है जो
    आवृत्ति से पूर्णतया मुक्त है ।
    ‘पञ्चदशी’ के इन अक्षरों में वामा, इच्छा आदि ६ शक्तियाँ एवं ईकार
    सम्मिलित हैं । अतः इन वर्णों में इन शक्तियों का निवास है अर्थात् वर्णाक्षरों के
    साथ शक्तियों की अभेदात्मकता है ।
    ‘तेन तन्मयी’—मन्त्रों में शक्तियाँ निवास करती हैं । पञ्चदशी मन्त्र के इन ७
    अक्षरों में ७ शक्तियाँ निवास करती हैं ।