वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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२४४ वरिवस्यारहस्ये
('का') = कामरूपपीठ ॥ 'पू' = पूर्णगिरि पीठ ॥ जा = जालंधर पीठ ॥
'ओ' = उड्डीयान, ओड्याण पीठ = 'का पू जा ओ' ॥
'पीठाःकन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः ॥'
इच्छा-ज्ञान क्रिया—शृङ्गाररूपमापन्नमिच्छाज्ञान क्रियात्मकम् ॥
आचार्य अभिनवगुप्तपादाचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि परा सूक्ष्मा
कुण्डलिनी शक्ति शिव के साथ सामरस्यरूपमध्यमन्थक भाव से संघट्टित होकर
उल्लसित होती है । उस उल्लास में तीन शक्तियाँ होती हैं—१. 'इच्छाशक्ति' २.
'ज्ञानशक्ति' ३. 'क्रियाशक्ति' । 'रौद्री शक्ति' को उन्मुद्रित करके कुण्डलिनी ही
'शृङ्गार' रूपा अम्बिकाशक्ति का आश्रय लेकर ओंकार के अवयव 'उ' (ऊकारात्मक)
चन्द्रकला का आकार धारण करती है ।¹ यही 'ज्येष्ठाशक्ति' होती है । (शशि-
बिन्दुओं से कालाग्नि रेफ बिन्दुओं की परम्परा से रेखा निकलती है । इस स्फुरण
से जो वर्णाकृति बनती है वही यह 'अ' अक्षर है ।)²
'अ' का मुख 'वामा' है । उसका सिर रौद्रीशक्ति है । उसकी बाहु 'अम्बिका'
है । उसका आयुध ज्येष्ठा शक्ति है ।
आकारस्य शिरोरौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता ।
अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैवायुध स्मृता ॥'³
'इच्छाशक्ति' स्पन्दात्मिका होती है । इसमें बाह्य औन्मुख्य होता है । इसके
दो प्रकार हैं—१. सर्जन में अनारूषित इच्छामात्र रूपा २. प्रक्षुब्धता के कारण
प्रयत्न-प्रवृत्ता ॥४
'ज्ञानशक्ति'—प्रक्षुब्ध अवस्था के पूर्व स्वात्मनिष्ठ परामर्श था ('एक वीरक
परामर्श') । यह विश्व के कारण रूप में था । उसी परामर्श से विश्वोन्मेष रूप
बाह्यस्पन्द हुआ । उस रूप में अवस्थित उस परामर्श को 'ज्ञानशक्ति' कहते हैं जो
कि पञ्चम बीज के जन्म का कारण है । पर प्रमाता में सिसृक्षा का प्रत्यवमर्श होता
है । यही 'इच्छाशक्ति' है । 'प्रमातुः सिसृक्षात्मा परामर्श उदेति सेय मिच्छाख्या
शक्तिः ॥'५
चिन्ता ही इच्छा की प्रथम 'त्रुटि' है ।६
इच्छाशक्ति में १. सन्निकृष्ट २. विप्रकृष्ट भेद होते हैं । उसी प्रकार ज्ञान शक्ति
में भी दो भेद होते हैं—१. ज्ञेय का अनाधिक्य २. ज्ञेयाधिक्य । उन्मेष शक्ति ही
इच्छा शक्ति है । क्रिया निरञ्जना देवी है—'क्रिया देवी निरञ्जनम्'७ ज्ञानशक्ति
समस्तमन्त्रों की माँ है—"ज्ञानशक्तिः परा सूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः
सर्वमन्त्राणां सर्वत्राणविपत्स्थिता ॥''८
१. तन्त्रालोक—जयरथकृत टीका 'विवेक' (तृ० आ० श्लोक ६७)
२-७. तन्त्रालोक—'विवेक' ८. नेत्रतन्त्र