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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 347, कुल 530 में से

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पृष्ठ 347

द्वितीयोंऽशः २४५
परमशिव की पाँच शक्तियाँ हैं—१. चित्शक्ति २. आनन्दशक्ति ३. इच्छाशक्ति
४. ज्ञानशक्ति ५. क्रियाशक्ति। इनका स्वरूप क्या है?
प्रकाशरूपता ही चिच्छक्ति है—'प्रकाशरूपता हि विच्छक्तिः ॥'१ लेकिन
'प्रकाश' क्या है? अनन्योन्मुख विमर्श ही प्रकाश है—'प्रकाशश्च अनन्योन्मुखविमर्शः
अहमिति ॥'२ 'आनन्दशक्ति' क्या है? 'स्वातन्त्र्य ही आनन्द शक्ति है ॥' 'स्वातन्त्र्यं
आनन्दशक्तिः ॥'३ 'इच्छाशक्ति' क्या है ? 'तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः'४ 'ज्ञानशक्ति'
क्या है ? 'आमर्शात्मकता ही ज्ञान शक्ति है' : आमर्शात्मकता ज्ञानशक्ति 'आमर्श'
क्या है ? ईशत्तया वेद्योन्मुखता ही आमर्श है—'आमर्शश्च ईषत्तया वेद्योन्मुखता'५
'क्रियाशक्ति' क्या है? 'सर्वकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥' सर्वाकार योगित्व ही क्रिया
शक्ति है ।६ 'जन्ममरणविचार' नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य की पुष्टि एक साथ करते
हुए कहा गया है कि—"एक एव अस्ति संविदात्मा महेश्वरः । तस्य प्रकाशरूपता
चिच्छक्तिः, स्वातंत्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः, आमर्शात्मकता
ज्ञानशक्ति, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥"७
(क) इस उपर्युक्त श्लोक में आचार्य भास्कर का कथन है कि—
१. वामा, इच्छा, ब्रह्मा, सरस्वती \ \ \ \ \ \ ⎧ ये तीनों शक्तियाँ एवं दम्पत्ति तीनों
२. ज्येष्ठा, ज्ञान, विष्णु, पृथ्वी \ \ \ \ \ \ \ ⎪ कूटो (वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं
३. रौद्री, क्रिया, शिव, पार्वती \ \ \ \ \ \ \ \ ⎨ शक्तिकूट) के प्रतिनिधि या तीनों
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ ⎩ कूटों के वाच्य हैं ।
(ख) भास्करराय फिर कहते हैं कि—पञ्चदशाक्षरी मन्त्र में जो ईकार त्रय है
वह शान्ता एवं अम्बिकारूपा उक्त दम्पतित्रय एवं शक्तित्रय को सङ्केतित करता है ।
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि—'प्रकाश' (शिव) की अंशभूता 'वामा'
'ज्येष्ठा' एवं 'रौद्री' शक्तियाँ ही ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र के रूप में पुरुषाकारित हैं ।
उनकी समष्टि शान्तात्मिका है जो कि तुरीय शक्ति है । विमर्श (शक्ति) की
अंशभूता शक्तियाँ 'इच्छा' 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' रूपा शक्तियाँ हैं । भार्या के रूप में
गृहीत भारती, पृथ्वी एवं रुद्राणी शक्तियाँ स्त्रीरूपा है । उनकी समष्टि जो कि
अम्बिकारूपा है वह 'तुरीय शक्ति' है । यहाँ पर प्रथम दम्पति (मिथुन) त्रय
ईकारविनिर्मुक्त कूटत्रय के वाचक हैं क्योंकि ईकारत्रय का तो 'तुरीयमिथुन' है ।
तीनों भारती आदि, योगिनीत्रय, सकुलादिक साधकत्रय, ब्रह्मादिक उपासक श्रेष्ठ
वीरेन्द्र—हल्लेखा विनिर्मुक्त कूटत्रय द्वारा क्रमानुसार प्रतिपादित हैं । हल्लेखाओं
(ह्रीं, ह्रीं, ह्रीं) का तो शिवशक्ति सामरस्यात्मक चतुर्थ मिथुन है । 'ह्रींकार
उभयात्मकः' ऐसा कहा गया है । वाच्यभूत योगिनी आदि से जन्य एवं युक्त ही

१. तन्त्रसार \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ २. प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (३.१.४)
३-६. तन्त्रसार \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ ७. भट्टवामदेवाचार्य—'जन्ममरणविचार'