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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

१६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( २३ ) चापलरहस्य विचार—शत्रु का विमान दिखलाई पड़ने पर अपने विमान के मध्य
केन्द्रस्थ शक्तिपञ्जर की कीली चलाने से एक छोटिकामात्र ( तर्जनी अङ्गुष्ठ ध्वनि—चुटकी—क्षणभर )
काल मे चार हजार सतासी तरङ्गों का वेग उत्पन्न हो जाता है उसके फैलाने से शत्रुविमान के डांवाडोल
होने उलट गिरने का रहस्य है ॥
(२४) सर्वतोमुखरहस्यो नाम--स्वपथे स्वविमानविनाशार्थं परविमान-
शतैरा ( व्रा ?) वृते सति तदा स्वविमानशिरःकेन्द्रकीलीचालन'दनेक-
विमानवत्सर्वतोमुखसञ्चारक्रियारहस्यम् ॥
( २४) सर्वतो मुखरहस्य विचार—अपने मार्ग में अपने विमान के विनाशार्थ दूसरे के
सैकडों विमानों से घिर जाने पर अपने विमान के शिर की कीली ( घुण्डी बटन ) के चलाने से अनेक
विमानों की भांति सब ओर संचार करने का क्रिया रहस्य है ॥
(२५) परशब्दग्राहक रहस्यो नाम--सौदामिनीकलोक्तप्रकारेण विमान-
स्थशब्दग्राहकयन्त्रद्वारा परविमानस्थजनसंभाषणादिसर्वशब्दाकर्षण रहस्यम् ॥
( २५ ) पर शब्दग्राहक रहस्य विचार—'सौदामिनीकला' ( विद्युत्कला पुस्तक ) मे कहे प्रकारा-
नुसार विमानस्थ शब्दग्राहक यन्त्र के द्वारा आकाश के प्रथम मण्डल की परिधि को आरम्भ करके सात
परिधि मण्डलपर्यन्त परविमानस्थ जन सम्भाषण आदि समस्त शब्दों का आकर्षण रहस्य है ॥
(२६) रूपाकर्षणरहस्यो नाम--विमानस्थरूपाकर्षणयन्त्रद्वारा पर-
विमानस्थितवस्तुरूपाकर्षणरहस्यम् ॥
( २६ ) रूपाकर्षणरहस्य विचार—विमान में स्थित रूप का आकर्षण यन्त्रद्वारा परविमानस्थित
वस्तुओं के रूप के आकर्षण का रहस्य है ॥
(२७) क्रियाग्रहणरहस्यो नाम--विमाताधःकीलीचालनाच्छुद्धपट-
प्रसारणं भवति । ईशान्यकोणस्थद्रावकत्रये शक्तिसंयोजनं कृत्वा तच्छक्तिसप्त-
वर्गसूर्यकिरणेषु सन्धांयं पूर्वोक्तशुद्धटल दर्पणाभिमुखीकरणं कृत्वा तन्मुखात्पू-
र्वोक्तशक्तिप्रसारणपूर्वकोध्र्वकीलीचालनद्वाग विमानाधोभागस्थितपृथिव्य (व)
न्तरिक्षेषु यद्यत्क्रियारहस्यान्यन्ये क्रिय (कीय ?) न्ते तत्स्वरूपप्रतिबिम्बं शुद्ध-
पटले मूर्तवच्चित्रित (तो ?) भवति तद्द्वा [द्वा ] रा क्रियाग्रहणरहस्यम् ॥
( २७ ) क्रियाग्रहण रहस्य विचार—विमान के नीचे की कीली-घुण्डी के चलाने से शुद्ध पट
फैल जाता है, ईशान्यकोणस्थ तीन द्रावकों ❊ में शक्तिसंयोजन करके उस शक्ति को सप्तवर्गसूर्यकिरणों
मे सन्धान करके पूर्वोक्त शुद्ध पटल को दर्पण के सामने की ओर करके उसके मुख से पूर्वोक्त शक्ति फैलने
के साथ ऊपर की कीली-धुन्डी चलाने के द्वारा विमान के नीचे के भाग में स्थित पृथिवी, जल, अन्तरिक्ष
में जो जो क्रियारहस्य अन्यों द्वारा किये जाते हैं उनका स्वरूपप्रतिबिम्ब शुद्ध पटल पर मूर्त के समान
चित्रित हो जाता है उसके द्वारा क्रियाग्रहण रहस्य है ॥
❊ ये द्रावक किसी रूप आदि शक्ति के फैलाने वाले द्रावक पात्र साधन प्रतीत होते है ।

विमान के रहस्य ] [ १७
(२८) दिक्प्रदर्शनरहस्यो नाम--विमानमुखकेन्द्रकीलीचालनेन दिशा-
म्पतियन्त्रनालपत्रद्वारा परयानागमनदिक्प्रदर्शनक्रियारहस्यम् ॥
( २८ ) दिक्प्रदर्शन रहस्य विचार—विमानमुखकेन्द्र की कीली चलाने से 'दिशाम्पति' नामक
( दिशाओं के पति ) यन्त्र के नालपत्र के द्वारा दूसरे के यान की आगमनदिशा का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(२६) आकाशाकाररहस्यो नाम--आकाशतन्त्रोक्तरीत्या कृष्णाभ्रवारिणा
पिचुमन्दमूलभूनागद्रावकाभ्या यानावरणअभ्रकपटिकामालिप्य तस्मिन् वायुपथ-
किरणशक्तियोजनद्वारा विमानाकाशाकारवत्प्रदर्शनरहस्यम् ॥
( २६ ) आकाशाकाररहस्य विचार—आकाशतन्त्र में कही रीति के अनुसार कृष्ण अभ्रक जल
तथा पिचुमन्दमूल + और भूनाग × के द्रावक रस से यान के आवरण अभ्रकपटिका को लेप कर देने
से उस वायुपथ में किरणशक्तियोजनद्वारा विमान के आकाशाकार होने का प्रदर्शन रहस्य है ॥
(३०) जलरूपरहस्यो नाम--करकाम्लबिल्वतैलशुल्वलवणधूमसार-
ग्रन्थिकरससर्षपपिष्टमीनावरणाद्रवाणा शास्त्रोक्तप्रकारेण भागाशसम्मेलन कृत्वा
मुक्ताफलशुक्तिका लवणासारे सयोग्य सम्मिलितशक्ति धूमाकार कृत्वा विमाना-
वरणोपरिस्थितकिरणप्रभामुखसन्धी-अन्तर्धाय पूर्वोवत्तधू (क्त अधू?) माकार-
द्रावकेण (के न?) विमानावरणलेपन कृत्वा तदुपरि धूमप्रसारणद्वारा
जलदाकारवद्विमानप्रदर्शनरहस्यम् ॥
( ३० ) जलरूपरहस्य विचार—करकाम्ल ❁ दाडिमाम्ल ( दाडिम का तेजाब ), बिल्वतैल,
शुल्वलवण ( ताम्बे का लवण नीलाथोथा ), धूमसार ( गृहधूम ), ग्रन्थिकरस ( गुगल का द्राव या मण्डूर
और पारा ), सर्षपपिष्ट ( सरसों की पीठी ) मीनावरण ( मछली का आवरण ) इनके शास्त्रोक्त प्रकार से
भागांशों को मिलाकर मुक्ताफलशुक्तिका ( मोती की सीपी ) लवणासार† में संयुक्त करके सम्मिलित शक्ति
को धूमाकार करके विमानावरण के ऊपर रहनेवाली किरणप्रभामुखसन्धि में छिपाकर या लगाकर पूर्वोक्त
धूमाकार के द्रावक द्वारा विमानावरण के ऊपर लेपन करके उसके ऊपर धूम फैलाने के द्वारा जलदाकार
अर्थात् ( मेघाकार ) के समान विमानप्रदर्शनरहस्य है ॥
(३१) स्तब्धकरहस्यो नाम--विमानोत्तरपार्श्वस्थसन्धिमुखनालादप-
स्मारधूम सग्राह्य स्तम्भनयन्त्रद्वारा तद्धूमप्रसारणात् परविमानस्थसर्वजनाना
स्तब्धीकरणरहस्यम् ॥

  • आयुर्वेदिक निघण्टुओ में 'पिचुमन्द' नाम की ओषधि नही है किन्तु पिचुमन्द ( निम्ब वृक्ष ) हो या कपास
    की जड ।
    × 'वैद्यक शब्द सिन्धु' कोष में 'भूनाग' केचुआ और सीसे धातु के लिये आया है, हो सकता है यहा सीसे धातु
    का रासायनिक द्राव अभीष्ट हो ।
    ❁ 'करक -दाडिमे, शुल्वं ताम्रे', धूमसार —गृहधूमे, ग्रन्थिक —गुग्गुले मण्डूरे व, रस पारदे (वैद्यक शब्द सिन्धु )
    † आयुर्वेदिक निघण्टुओ मे लवणासार शब्द नही है किन्तु लवण क्षार' है जल से उत्पन्न नमक विशेष के लिये
    आया है । हो सकता है लवणासार से सोडा अभीष्ट हो ।

१८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( ३१ ) स्तब्धकरहस्य विचार—विमान के उत्तर पार्श्वस्थ सन्धिमुखनाल से अपस्मार का धूम
संग्रह करके स्तम्भन यन्त्र द्वारा उस धूम के फैलाने से परविमानस्थ सर्वमनुष्यों के स्तब्ध कर देने जड-
मूच्छित बना देने का रहस्य है ॥
(३२) कर्षणरहस्यो नाम—स्वविमानसंहारार्थं परविमानपरम्परागमने
विमानाभिमुखस्थवैश्वानरनालान्तर्गतज्वालिनीप्रज्वालन कृत्वा सप्ताशीतिलिङ्क-
प्रमाणोष्ण यथा भवेत् तथा चक्रद्वयकीलीचालनात् शत्रुविमानोपरि वर्तुला-
कारेण तच्छक्तिप्रसारणद्वारा शत्रुविमाननाशनक्रियारहस्यम् ॥
( ३२) कर्षणरहस्य विचार—अपने विमान के नाशार्थ दूसरे के विमानयानों के लगातार
आने पर विमान के सामने वाले वैश्वानर नाल के अन्तर्गत ज्वालिनी + जलाकर सतासी लिङ्क (डिग्री)
प्रमाण की उष्णता जिससे हो जावे वैसे दो चक्रों की कीली चलाने के द्वारा शत्रुविमान के ऊपर गोलाकार
से उस शक्ति को फैलाने के द्वारा शत्रुविमान के नाश करने का क्रिया रहस्य है ॥
पञ्चञ्च ॥ अ० १ । सू० ३ ॥
सूत्रशब्दार्थ—और पांच का जानने वाला 'अधिकारी' है ।
बोधानन्दवृत्तिः—
यथारहस्यविज्ञान पूर्वसूत्रे निरूपितम् ।
पञ्चावर्तस्वरूपञ्च तथैवास्मिन्निरूप्यते ॥ १ ॥
एतेनोभयविज्ञानादेव यन्तृत्वतामियात् ।
इतिसूत्रद्वयविचारात्सिद्ध भवति ध्रु ( धृ ? ) वम् ॥ २ ॥
पञ्चावर्तविचारस्तु शौनकोक्तप्रकारत ।
रेखादिपञ्चमार्गानुसारदत्र प्रकीर्त्यते ॥ ३ ॥
रेखापथो मण्डलश्च कक्ष्यश ( ोश ? ) क्तिस्तथैव च ।
केन्द्रश्च ( च्चे ? ) ति विमानाना मार्गा खे पञ्चधा स्मृता ॥ ४ ॥
पूर्वसूत्र में जिस प्रकार रहस्यविज्ञान निरूपित किया गया है उसी प्रकार इस सूत्र में पञ्चावर्त-
स्वरूप (पांच आवर्तों-भँवरों-बवण्डरों का स्वरूप) भी निरूपित किया जाता है । इस भांति दोनों के
विज्ञान से ही विमानचालकता को प्राप्त किया जा सकता है यह बात उक्त दोनों सूत्रों के विचार से
निश्चित सिद्ध हो जाती है । पञ्चावर्त विचार शौनक ऋषि के कहे प्रकार से रेखा आदि पाच मार्गों के
अनुसार यहां वर्णन किया जाता है । रेखापथ, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र ये पांच प्रकार के मार्ग विमानों
के आकाश में बतलाए गये हैं ॥ १–४॥
तदुक्तं शौनकीये—
अथाकाशमार्गान्यनुक्रमिष्यामो रेखामण्डलकक्ष्यशक्ति केन्द्रभेदाद्-भूतशक्ति-
प्रवाहमागण्याकूर्मादावारुणान्त वाणमवष्टभ्यैकचत्वारि ष्ठं श ( रिङ् श )

  • विद्युन्मय बत्ती प्रतीत होती है ।

पांच आवर्त्त ] [ १६
र्कोदये ( ये ? ) कपञ्चाशल्लक्षनवसहस्राष्टशतसंख्याकानि भवन्ति तेषु भूरादि
सप्तलोकविमानास्सञ्चरन्तीति ॥
यह बात शौनकीय शास्त्र में कही है—
अब आकाशमार्गों को कहेंगे। रेखा, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र के भेद से भूतशक्तिप्रवाह-
मार्ग कूर्म से लेकर अरुण पर्यन्त ( आकूर्मार्दो आ अरुणान्तं' इस प्रकार पदच्छेद होने पर ) या कूर्म से
लेकर वरुणपर्यन्त (आकूर्मार्द् आ वारुणान्तं' पदच्छेद होने पर ❀ ) बाण ( आयतन ) का अवष्टम्भन
करके इक्तालीस से इक्यावन लक्ष नौ सहस्र आठ सौ होते हैं। उनमें 'भू' आदि सातलोकरूपविमान
सञ्चार करते हैं ॥
एतेषु सूत्रोक्तपञ्चमार्गभेदा यथाक्रमम् ।
यथोक्त धुण्ढिनाथेन तथैवात्र निरूप्यते—
रेखामार्गास्सप्तकोटित्रिलक्षाष्टशतास् (ना ?) स्मृता ।
+द्वाविंशत्कोट्यष्टलक्षद्विशत मण्डले क्रमात् ॥ १ ॥
द्विकोटिनवलक्षत्रिशत कध्ये निरूपिता ।
दशकोट्येकलक्षत्रिशत शक्तिपथेरिता ॥ २ ॥
त्रिशल्लक्षाष्टसाहस्रद्विशत केन्द्रमण्डले ।
एव रेखादिकेन्द्रान्तमण्डलेषु यथाक्रमम् ॥ ३ ॥
वाल्मीकिगणितान्मार्गसंख्या श्लोकैर्नि (नि ?) रूपिता ।
इनमें सूत्रोक्त पांच मार्गभेद यथाक्रम धुण्ढिनाथ ने जैसे कहा है यहा निरूपित किया जाता है—
'रेखामार्ग' सात कोटि तीन लाख आठसौ कहे गये हैं, बाईस कोटि आठ लाख दो सौ 'मण्डल'
में क्रम से, दो कोटि नौ लाख तीन सौ 'कक्ष्य' में कहे हैं, दश कोटि एक लक्ष तीन सौ 'शक्तिपथ' में
कहे हैं, तीन लाख आठ सहस्र दो सौ केन्द्रमण्डल में इस प्रकार 'रेखामार्ग' से लेकर 'केन्द्र' तक मण्डलों
में क्रमानुसार वाल्मीकि गणित से मार्ग संख्या श्लोकों से बतलाई गई है ॥ १–३ ॥
एतेषु यानसञ्चारमार्गनिर्णयमुच्यते ॥—
प्रथमायाश्चतुर्थान्त मार्ग [र्गा?] रेखापथे क्रमात् ।
भुवर्लोकसुवर्लोकमहलोकनिवासिनाम् ॥ १ ॥
विमानसञ्चारमार्गा इति शास्त्रेषु वर्णिता ।
जनो लोकविमानाना गमने मार्गनिर्णय ॥ २ ॥
द्वितीयाद्यापञ्चमान्तमु (त उ ?) क्ता कक्ष्यपथे क्रमात् ।
प्रथमाद्याषडन्तास्स्यु (ता स्यु ?) मार्गाश्शक्तिपथे क्रमात् ॥ ३ ॥
तपोलोकविमानानामिति शास्त्रविनिर्णय ।
तृतीया (य्या ?) येकादशान्ता ब्रह्मलोकनिवासिनाम् ॥ ४ ॥
❀ इस पक्ष मे 'वारुण' में 'वा' लेखकदोष या स्वार्थ मे अण् से आकार है ।

  • 'द्वाविंशत्' इत्येतत्पद चिन्त्यम् । द्वात्रिंशत् इत्यनेन भवितव्य किंवा द्वाविंशति' इत्यस्य इकारलोप
    आर्षश्छन्दस्संख्यापूर्त्यर्थत्वाच्छान्दसो वा ।

२० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानसञ्चारमार्गाः प्रोक्ताः केन्द्रपथे क्रमात् ।
वाल्मीकिगणितेनैव गणितागमपारगैः ॥ ५ ॥
विमानानां यथाशास्त्रं कृतो (तं ?) मार्गविनिर्णयः ।
अथावर्त निर्णय —
आवर्ताश्च ॥ अ० १ । सू० ४ ॥
एवमुक्त्वा विमानानां पञ्चमार्गान्यथाक्रमम् । ‡
अथेदानों तदावर्तनिर्णयस्सन्निरूप्यते ॥ ६ ॥
आवर्ता (तं ?) बहुधा प्रोक्ता मार्गसंख्यानुसारतः ।
तेषु यानपथावर्ता पञ्चवैवेति विनिर्गिता ॥ ७ ॥
इनमें यान संचारमार्गों का निर्णय कहा जाता है—
प्रथम से आदि करके चतुर्थ तक मार्ग रेखापथ में क्रम से 'भुव' लोक, 'सुवः' लोक 'महः'
लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग इस प्रकार शास्त्रों में वर्णित हैं, 'जनः' लोक विमानो के गमन
में मार्ग निर्णय है । द्वितीय से आदि करके पञ्चम तक कक्ष्यापथ में क्रम से कहा है । प्रथम से आदि
कर छ तक मार्ग शक्तिपथ में क्रम से कहे हैं । 'तपः' लोक विमानों का है यह शास्त्रनिर्णय है तृतीय से
आदि करके एकादश तक 'ब्रह्म' लोक निवासियों के विमान सञ्चार मार्ग केन्द्रपथ में क्रम से कहे हैं ।
इस प्रकार वाल्मीकि गणित से ही गणित शास्त्र के पारंगत विद्वानों ने विमानों का मार्गनिर्णय शास्त्रा-
नुसार किया है ॥ १-५ ॥
आवर्त निर्णय—
इस प्रकार विमानों के पांच आवतों को क्रमानुसार कहकर अब इस समय उन आवर्तों
का निर्णय निरूपति किया जाता है । मार्गसंख्या के अनुसार आवर्त बहुत कहे हैं उनमें यानपथ के आवर्त
पांच ही निर्णय किये हैं ॥ ६-७ ॥
तदुक्तं शौनकीये—
प्रवाहद्वयससर्गादावर्त्तनमिति तान्यनुक्रमिष्याम । रेखापथे शक्त्यावर्तन
मण्डले वातावर्तन कक्ष्ये किरणावर्तन शक्तिपथे शैत्यावर्तन केन्द्रे घर्षणावर्तन-
मित्यवर्ता पञ्चधा भवन्तीति । आवर्ता पञ्चसु पञ्चेति हि ब्राह्मणम्† ।।
यह यह शौनकीय ग्रन्थ में कही है—
दो प्रवाहों के संसर्ग—संघर्ष से आवर्त—होते हैं, उन्हें यहां कहेंगे । रेखापथ में शक्त्यावर्त,
मण्डल में वातावर्त, कक्ष्य में किरणावर्त, शक्तिपथ में शैत्यावर्त, केन्द्र में घर्षणावर्त । इस प्रकार
आवर्त पाँच प्रकार के हैं । आवर्त पांच में पांच हैं ऐसा ब्राह्मण ग्रन्थ में कहा है ।
एव रेखादिमार्गेषु शक्तिद्वयसमाकुलात् ।
आवर्ताः सम्प्रजायन्ते खेटयानविनाशकाः ॥
इस प्रकार रेखा आदि मार्गों में दो शक्तियों के टक्कर से आवर्त उत्पन्न हो जाते हैं जो कि
विमानयानों के विनाशक बन जाते हैं ।
‡ यहा 'मार्गाणि' नपुसक लिङ्ग के इकार का लोप छन्दः पूर्ति के लिये पूर्व के समान है ।
† लुप्तब्राह्मणम् ।

विमानविध्वंसक आवर्त ] 32,622 54/274 [ २१
उक्तं हि मार्गनिबन्धने—
लहयोर्वहयोश्चैव यहयोरहयोस्तथा ।
महयोरन्तरालेषु शक्त्यावर्ता इतीरिता. ।। १ ।। (लल्लकारिका)
लकारेणात्र भूप्रोक्ता हकारादम्बरं स्मृतम् ।
प्रोक्तास्तयोरन्तराले रेखामार्गा (ग ?) स्त्वनेककः ॥ २ ॥
शक्त्यावर्तास्तेष्वनन्तास्स (न्ता स ?) भवन्त्य ( बर्त्य ? ) तिवेगत ।
तैर्भूलोकविमानानां विनाश इति निश्चितः ॥ ३ ॥
अम्बरे वणिते स्याद्वहकारात्मना क्रमात् ।
तयोर्मध्ये मण्डलाख्यमार्गा प्रोक्ता विशेषतः ॥ ४ ॥
वातावर्तास्तेष्वनन्तास्स भवन्त्यतिवेगतः ।
लोकत्रयविमानानां विनाशस्तेषु वणितः ॥ ५ ॥
तथैव यहवर्णाभ्यां वाय्वाकाशे निरूपिते ।
तयोर्मध्ये कक्ष्यार्मास्त्वनेकास्सप्रकीर्तिताः ॥ ६ ॥
भवन्ति किरणावर्तास्तेष्वंशुना प्रवाहतः ।
जनो लोकविमानाना विनाशस्तत्र वर्णितः ॥ ७ ॥
‘मार्गनिबन्धन’ में कहा है—
ल, ह के व, ह के य, ह के तथा र, ह के म, ह के अन्तरालों में शक्त्यावर्त होते हैं ऐसा
कहा है । ‘ल’ से भूमि कही है ‘ह’ से अम्बर समझा गया, इन दोनों के अन्तराल में रेखामार्ग अनेक
हैं । शक्त्यावर्त उनमें अनेक अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं । उनके द्वारा भूलोकविमानों का विनाश
निश्चित हो जाता है । दो अम्बर व, ह से क्रमशः कहे हैं उनके मध्य में मण्डलनामक मार्ग विशेषतः
कहे गये हैं । उनमें अनन्त आवर्त अतिवेग से उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें तीनों लोकों के विमानों का
विनाश वर्णन किया है । इसी प्रकार य, ह वर्ण से वायु आकाश निरूपित किये हैं, उनके मध्य में कक्ष्य
मार्ग अनेक हैं । उनके अन्दर किरणावर्त अंशुओं के प्रवाह से हो जाते हैं वहां ‘जन.’ लोक विमानों का
विनाश वर्णन किया है ॥ १—७ ॥
रवर्णेन रवि प्रोक्तो हवर्णादम्बरं स्मृतम् (तं ?) ।
तयोर्मध्ये शक्तिमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ॥ ८ ॥
शैत्यावर्तास्तेषु शक्तिससर्गादतिवेगतः ।
सम्भवन्ति विशेषेण खेटयानविनाशकाः ॥ ९ ।
महामार्तण्डशक्तित्वप्रवाहाशो मकारतः ।
हकारेणाम्बरञ्चैव वर्णितं स्याद्यथाक्रमम् ॥१०॥
तयोर्मध्ये केन्द्रमार्गा बहुधा सम्प्रकीर्तिताः ।
भवन्ति घर्षणावर्तास्तेषु नानामुखाः क्रमात् ॥११॥

ब्रह्मलोकविमानानां विनाशस्तैर्निरूपितः ।
शैत्योष्णशक्तिन्यूनातिरिक्ताभ्यां मार्गसन्धिषु ॥१२॥
'र' वर्ण से रवि कहा है 'ह' वर्ण से आकाश बतलाया गया, दोनों के मध्य में शक्तिमार्ग
बहुत कहे हैं। उनमें शैत्यावर्त अतिवेग से शक्तियों के संसर्ग से विशेष करके उत्पन्न हो जाते हैं जो
विमानयानों के नाशक होते हैं। महामार्तण्ड शक्तिश्च प्रवाहांश 'म' से लिया गया है और 'ह' से
आकाश यथाक्रम से वर्णित किये गये हैं। उन दोनों के मध्य में केन्द्रमार्ग प्राय कहे हैं, उनमें घर्षणावर्त
नानाप्रकार के क्रम से होते हैं। उनसे ब्रह्मलोक विमानों का विनाश शैत्य-उष्णशक्तियों के न्यूनाधिक
होने से मार्गसन्धियों में निरूपित किया गया है ॥ ८–१२ ॥
प्रवाहद्वयसंयोगवेगादावर्तनं क्रमादिति ।
एवं रेखादिमार्गेषु आवर्तस्सन्निरूपिता ॥ १३ ॥
तैर्विनाशो विमानानामिति शास्त्रविनिर्णयः ।
पूर्वसूत्रोक्तद्वात्रिंशद्रहस्यज्ञानवत्क्रमात् ॥ १४ ॥
मार्गावर्तस्वरूपे च सूत्राभ्यां

प्रथम अध्याय: चालक-लक्षण, वस्त्र-आहार एवं मार्ग-विभाग

विमान के अङ्ग ] [ २३
यथा सर्वाङ्गसंयुक्तो देहस्स (ह स ?) वार्थसाधने ।
समर्थस्स्या (र्थ स्या ?) द्विमानश्च सर्वाङ्गैस्सयुतस्तथा ॥२॥
विश्वक्रियादर्पणयन्त्रमारभ्य यथाविधि ।
एकत्रिशद्विमानाङ्गस्थानान्युक्तानि भूरिश ॥ ३ ॥
तानि सर्वाणि विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् ।
छायापुरुषशास्त्रोक्तप्रकारेणात्र वर्ण्यते ॥ ४ ॥
विमानाङ्ग निर्णय :—
शास्त्र में समस्त विमानों के अङ्गाङ्गी भाव से स्फुट यानवेत्ता कुशल विद्वानों ने विमाना-
कार के निर्णय में कहा है कि जैसे सब अङ्गों से युक्त देह सर्वार्थ साधन में समर्थ होता है इसी प्रकार
विमान भी सब अङ्गों से युक्त होकर समर्थ होता है । यथाविधि विश्वक्रियादर्पण यन्त्र को आरम्भ करके
इकत्तीस विमानाङ्ग स्थानों को अधिक करके या उत्तमता से कहा है उन सबको विधिवत् सङ्क्षेप से
यथाक्रम छायापुरुषशास्त्र में कहे प्रकार से यहां वर्णित किया जाता है ॥ १–४ ॥
आदौ विश्वक्रियादर्शस्थानमित्यभिधीयते ।
शक्त्याकर्षणदर्पणस्थान च तत × परम् ॥ ५ ॥
परिवेषस्थानमुक्त विमानावरणोपरि । ☸
अङ्गोपसंहारयन्त्रस्सप्तमे बिन्दुकीलके ॥ ६ ॥
स्याद्विस्तृतक्रियास्थान रेखैकादशमध्यगे ।
वैरूप्यदर्पणस्थान पद्मचक्रमूख तथ। ' ॥ ७ ॥
शिरोभागे विजानीयाद्विमानस्य बुधः (धै ?) क्रमात् ।
कण्ठे तु कुष्ठिणीशक्तिस्थानमित्युच्यते बुधै । ८ ॥
पुषि्पणीपिञ्जुलादर्शस्थान दक्षिणकेन्द्रके ।
वामपार्श्वमुखे नालपञ्चकस्थानमुच्यते ॥ ६ ॥
आदि में विश्वक्रियादर्शस्थान कहा जाता है इसके आगे शक्त्याकर्षण स्थान कहा है ।
परिवेषस्थान ( परिधिस्थान ) विमानावरण के चारों ओर या ऊपर विमान के अङ्गों का सङ्कोचनयन्त्र
सातवें बिन्दुकील में । विस्तृत क्रियास्थान ग्यारहवीं रेखा के मध्य में होना चाहिये, वैरूप्यदर्पणस्थान
तथा पद्मचक्र मुख ये दोनों विमान के शिरोभाग में बुद्धिमान् क्रमश जाने । विमान के कण्ठ में
कुष्ठिणीशक्तिस्थान होना बुद्धिमानों ने कहा है । पुषि्पणीपिञ्जुलादर्श स्थान दक्षिणकेन्द्र में तथा नाल
पञ्चकस्थान ( पांच नालों का स्थान ) वाम पार्श्व में कहा जाता है ॥ ५–६ ॥
गुहागर्भादर्शयन्त्रस्थान कुक्षिमुखे क्रमात् ।
तमोयन्त्रस्य सस्थान भवेद् वायव्यकेन्द्रके ॥ १० ॥
पञ्चवातस्कन्धनालस्थान पश्चिमकेन्द्रके ।
रौद्रीदर्पणसस्थान वातस्कन्धाख्यकीलकम् ॥ ११ ॥
अध केन्द्रे विजानीयाद्विमानस्य यथाक्रमम् ।
शक्तिस्थान विमानस्य मुखदक्षिणकेन्द्रयो ॥ १२ ॥
× च तदनन्तरम् ( क्वचित् ) ।

  • यहां 'विमानावरणतोपरि' मे विमानावरणात परि न होकर विमानावरणत उपरि' भी हो सकता है विसर्ग
    लोप हो जाने पर त-उ की सन्धि छन्दपत्ति के लिये समझना चाहिये ।

२४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
शब्दकेन्द्रमुखस्थानं वामभागे निरूपितम् ।
विद्युद्द्वा (द्वा?) दशकस्थानं विमानेशान्यकोणके ॥१३॥
गुहागर्भदर्श यन्त्र का स्थान कुक्षिमुख में क्रमश: कहा है, तमोयन्त्र (अन्धकार करनेवाले
यन्त्र ) का स्थान वायव्य केन्द्र में होना चाहिये । पञ्चवातास्कन्धनाल का स्थान पश्चिम केन्द्र में हो ।
रौद्रीदर्पण स्थान वातस्कन्ध नामक कील में विमान के अध केन्द्र में यथाक्रम जानना चाहिये । शब्द
केन्द्रमुख स्थान बाम भाग में निरूपित किया है बारह विद्युत् का स्थान विमान के ऐशानीकोण में होना
चाहिये ॥ १०–१३॥
प्राणकुण्डलिसंस्थानं यानमूले निरूपितम् ।
भवेच्छक्त्युद् गमस्थानं नाभिकेन्द्रे तथैव च ॥१४॥
वक्रप्रसारणस्थानं विमानाधारपार्श्वके ।
मध्यकेन्द्रे भवेच्छक्तिपञ्जरस्थानकीलकम् ॥ १५ ॥
स्थानं शिरःकीलाख्यं भवेद्यानशिरोपरि । ❋
शब्दाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं पश्चिमपार्श्वके ॥ १६ ॥
रूपाकर्षणयन्त्रस्य स्थानं यानभुजे क्रमात् ।
पटप्रसारणस्थानं यानाधोभागमध्यमे ॥ १७ ॥
प्राणकुण्डलीस्थान ( गतियन्त्र ) यान के मूल में निरूपित किया है तथा शक्त्युद्गमस्थान
नाभिकेन्द्र में कहा है । वक्रप्रसारण स्थान विमानाधारपार्श्व में और शक्तिपञ्जरस्थान कील मध्य केन्द्र में
होना चाहिये । शिरःकील नामक स्थान यान के शिर के ऊपर हो, शब्दाकर्षण यन्त्र का स्थान पश्चिम
पार्श्व में होना चाहिये । पटप्रसारणस्थान यान के अधोभाग के मध्य में होना चाहिये ॥ १४-१७॥
दिशाम्पतियन्त्रस्थानं वामकेन्द्रभुजे विदुः ।
पट्टिकाक्रमसस्थानं (न ?) यानावरणमध्यमे ॥ १८ ॥
विमानस्योपरि सूर्यस्य शक्त्याकर्षणपञ्जरम् ।
अपस्मारधूमस्थानं सन्धिनालमुखोत्तरे ॥ १९ ॥
अधोभागे स्तम्भनारुख्ययन्त्रस्थानमितीर्यते ।
वैश्वानराख्यनालस्य स्थानं नाभिमुखे विदुः ॥ २० ॥
इत्येकत्रिंशत्तिकस्थाननिर्णयः परिकीर्तितः ।
दिशाम्पति (दिशाओं के पति) यन्त्र का स्थान वामकेन्द्रभुजा में जानें पट्टिकाभ्रक
(अभ्रक की पट्टिका) का स्थान यानावरण के मध्य में होना चाहिये । विमान के ऊपर सूर्य की शक्ति
को आकर्षण करने वाला पञ्जर हो, अपस्मार धूम का स्थान सन्धिनालमुख के उत्तर भाग में होना
चाहिये । अधोभाग में स्तम्भन नामक यन्त्र का स्थान कहा गया है और वैश्वानर नामक नाल का स्थान
नाभिमुख में जाने ॥ यह एकत्तीस अङ्गस्थानों का निर्णय कहा ॥ १८-२० ॥
—:०:—
❋ 'शिरोपरि' में 'शिर -उपरि' विसर्गलोप होकर सन्धि छन्द की पूर्ति के लिये है ।

कापी संख्या २—
अथ वस्त्राधिकरणम् ।
अब वस्त्र का अधिकरण प्रस्तुत करते हैं ।
यन्तृप्रावरणीयौ पृथक् पृथगृत्तुभेदात् ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० वृ०
वस्त्रप्रबोधकपदान्यन्तॄ णामृतुभेदतः ।
उक्तानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् तेषामर्थो विविच्यते ॥ १॥
धारणाच्छादनवस्त्रप्रभेदो यन्तॄणा क्रमात् ।
सूत्रादिमपदेनोक्त द्वितीयपदतस्तथा ॥ २ ॥
तेषा सस्कारतद्वर्णगुणजात्यादय स्मृता ।
सूत्रतृतीयपदत कालभेदो निरूपित ॥ ३ ॥
इत्थ सूत्रार्थमुक्तवाथ विशेषार्थो निरूप्यते ।
अनन्तसूर्यकिरणशक्तिवैचित्र्यभेदत ॥ ४ ॥
वसन्ताद्याष्षडृतव प्रभवन्त्यदितेर्मुखात् ।
यजुराण्यके सूर्यानन्तत्वप्रतिपादने ॥ ५ ॥
यद् द्याव इन्द्र ते † शतमितिवाक्याच्छ्रु तिर्जगौ ।
ऋतुभेद से विमानचालक यात्रियों के वस्त्रों के प्रबोधक पद तीन सूत्र में कहे हैं उनके
अर्थ का विवेचन किया जाता है । यात्रियों के पहिनने और ओढने का वस्त्रभेद क्रम से सूत्र के
आदिम पद से कहा दूसरे पद से संस्कार उसके वर्ण गुण जाति आदि कहे हैं, तीसरे पद से कालभेद
कहा है इस प्रकार सूत्रार्थ कह कर विशेष अर्थ निरूपित किया जाता है, अदिति-व्यात अग्नि के मुख
से एवं अनन्त सूर्यकिरण शक्तियों की विचित्रता के भेद से वसन्त आदि छः ऋतुएं होती हैं । यजुर्वेद
के आरण्यक में सूर्य किरणों की अनन्तता प्रतिपादन होने से “यद् द्याव इन्द्र ते शतम्” ( तै० आ० १ ।
७ । ५) हे इन्द्र सूर्य तेरी किरणें सैकड़ों सहस्रों हैं † । इस प्रकार वाक्य श्रुति ने गान किया-कहा
है ॥ १-५ ॥
† “शत बहुनाम” ( निघ० )

२६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तस्मादनन्तसूर्याणामंशुशक्तिसमाकुलात् ।
विषामृतविभागेन भिद्यन्ते ऋतुशक्तयः ॥ ६ ॥
छेदिनी रक्तपामेधस्सिराहार्यादय क्रमात् ।
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतूना विषशक्तय ॥ ७ ॥
त्वङ् मांसमेधामज्जास्थिस्नायुरक्तरसादिकान् ।
वेरबीजान् नश्यन्ति खपथे यानयन्तॄणाम् ॥ ८ ॥
तस्मात्तद्वेरबीजादिरक्षणार्थं कपर्दिना ।
ऋतुशक्त्यनुसारेण वस्त्रभेदा निरूपिता ॥ ६ ॥
अत. अनन्त सूर्यों के शक्तिसमूह से विष और अमृत के विभाग से ऋतुशक्तियां भिन्न-भिन्न
हो जाती हैं । छेदिनी अङ्गछेदन करनेवाली, रक्तपा-रक्त पीनेवाली, मेधा-मद मांस चिकनाई सिरा आहार
वाली क्रम से सख्या में ऋतुओं की विषशक्तियां है जो कि आकाशमार्ग में विमानयात्रियों के त्वचा
मांस मेद मज्जा-चर्बी हड्डी नाडो रक्त सिरा आदि वेर वोजों-शरीर के तत्त्वों को नष्ट करती हैं । अत
शरीर के तत्त्वों की रक्षा के अर्थ कपर्दी ने ऋतुशक्ति के अनुसार वस्त्रों के भेद निरूपित किये हैं ।६-६।
उक्तं हि पटसंस्काररत्नाकरे—कहा ही है पटसंस्कार रत्नाकर ग्रन्थ में—
पट्टकार्पासशैवाललोमाभ्रकत्वगादिकान् ।
सप्तविंशतिसंस्कारशुद्धानभ्रकवारिणा ॥ १० ॥
क्षालयित्वात् तान् सर्वान् यन्त्रे संधाय शास्त्रत ।
गालवोक्तविधानेन तन्तून् सम्यक् प्रकल्पयेत् ॥ ११ ॥
केतकीवटतालार्कनारिकेलशणादय ।
तत्तच्छुद्धिप्रकारेण शोधयित्वाष्टवारत ॥ १२ ॥
एकोनविंशत्संस्कारैस्सस्कृत्य विधिवत् क्रमात् ।
तत्तद्वल्कलमादाय यन्त्रे तन्तुमुखाभिधे (दे?) ॥ १३ ॥
समग्रैणाथ संधायं तन्तून् कृत्वा यथाविधि ।
गालवोक्तेन मार्गेण कुर्याद् वस्त्राण्यथाक्रमम् ॥ १४ ॥
पश्चाद् वस्त्रान् समाहृत्य पञ्चतैलेस्तु पाचयेत् ।
अतसीतुलसीधात्रीशमीमालुरुचक्रिकाः ॥ १५ ॥
रेशम, रुई, जलकाई, बाल, अभ्रकपरत आदि को २७ संस्कार शुद्ध करे हुओं को अभ्रक-
जल या कपूरजल या नागरमोथे के जल से प्रक्षालित करके सबको शास्त्र से यन्त्र में रखकर गालव
की विधि से धागों को बनावे । केतकी—केवड़ा, ( बांस केवड़ा) वड़, ताड़, आक, नारियल, सण आदि
उस उसके शुद्धिप्रकार से ८ वार शोध कर १६ संस्कारों से विधिवत् करके उसके उस उसके वक्कल
लेकर तन्तुमुख नामक यन्त्र में रखकर तन्तुओं को बनाकर गालव के कहे मार्ग से वस्त्र यथाक्रम करे
पश्चात् वस्त्रों को लेकर पांच तेलों से पकावे जो कि पांच तैल हैं अलसी,'तुलसी, आमला, शमी, मालु-
काली तुलसी, रुचिका-सरसों ॥ १०—१५ ॥

वस्त्राधिकरण ] [ २७
एतदोषधिबीजानां तैलात् सप्ताहमातपे ।
प्रत्यहं पञ्चधाताप्त्वा शुष्कं कृत्वा ततं परम् ॥ १६ ॥
गोपीलाक्षाचण्डमुखीमधुपिष्टाभ्रकासमम् ।
सम्मेल्य एणाक्षारेण बृहन्मूषामुखे क्रमात् ॥ १७ ॥
सम्पूर्य विधिवत् सर्वं कूर्मव्यासटिकान्तरे ।
निधाय त्रिमुखीभस्त्राद् धमनेच्छिञ्जीरवेगत ॥ १८ ॥
तन्मध्येऽगस्तिपत्राणां रसप्रस्थाष्टकं न्यसेत् ।
माक्षिकाभ्रकसिञ्जीरवज्रटङ्कणवाकुटै ॥ १९ ॥
तैलमाहृत्य विधिवत् तस्मिन् पश्चान्नियोजयेत् ।
पश्चात् संगृह्य तत्काञ्जं गर्भतापनयन्त्रके ॥ २० ॥
सन्ताप्य तत्तैललिप्तवस्त्राण्यथ समाहरेत् ।
इन ओषधियों के बीजों के तैल से सप्ताहभर धूप में प्रतिदिन पांच बार तपाकर सुखाकर
गोपी-गोपिका-कृष्ण सारिवा, लाख चण्डमुखी-इमली, मधु, पिष्ट-तिल की खल, अभ्रक ये समान लेकर
एणक्षार ?-ऐणाक्षार हरिणशृङ्ग भस्म के क्षार से मिला कर बड़ी मूषा (कृत्रिम बोतल) के मुख में भर
कर कूर्मव्यासटिका-कछवे के आकारवाले कुण्ड के अन्दर रखकर तीन मुखवाली भस्त्रा से सिञ्जीर ? के
वेग से धमन करे। उसके मध्य मे अगस्त्य वृक्ष के पत्तों का ८ सेर रस डाल दे स्वर्णमाक्षिक अभ्रक
सिञ्जीर ? थूहर, सुहागा, वाकुट-वाकुची ? या बाकुज-वकुल का फल वस्तुओं से विधिवत् तैल लेकर उस
में डाल दे पश्चात् लेकर गर्भगत यन्त्र में उनके काञ्ज ?-रस तपाकर उस तैल से लिप्त वस्त्र लेले ॥१६-२०
अग्निमित्रोक्तविधिना पटजात्यनुसारत ।
ऋतुधर्मानुसारण कवचादीन् प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
तत्तत्कालोचितान् वस्त्रकवचादीन् यथाक्रमम् ।
यानयन्त्रत्वाधिकारवरिष्ठेभ्यो मनोहरान् ॥ २२ ॥
दत्त्वा स्वस्त्ययनं कृत्वा रक्षाकरणपूर्वकम् ।
पश्चात् सम्प्रेषयेद् यानयन्त्रकर्माणि हर्षत ॥ २३ ॥
सर्वदोषविनाशस्स्यात् तत्पट्टैर् बलवर्धनम् ।
मेधोवृद्धिर्धातुवृद्धि रङ्गपुष्टिरजाड्यता ॥ २४ ॥
अग्निमित्र की कही विधि में पट जाति के अनुसार ऋतु धर्मानुसार कवच आदि बनावें, उस
उस काल के योग्य वस्त्र कवच आदि यथाक्रम मनोहर विमानचालन अधिकार में श्रेष्ठों के लिये देकर
स्वरूपयन रक्षाकरणपूर्वक करके उन्हें हर्ष से विमानचालन के कार्य में प्रेरित करे, सर्व दोषों का विनाश
हो उन वस्त्रों से विमानयात्रियों का बल बढ़े, मेधा बढे, धातु वृद्धि हो अङ्ग पुष्टि स्फूर्ति अङ्गरक्षण आदि
हो ॥ २१–२४ ॥

२८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
आहाराधिकरणम् ।
भोजन का अधिकरण ।
आहारः कल्पभेदात् ॥ अ० १ सू० ७ ॥
बो० वृ०
यन्तॄणामाहारभेदनिर्णयार्थं पदद्वयम् ।
सूत्रेऽस्मिन् कथितं सम्यक् तदर्थस्सम्प्रचक्षते ॥ २५ ॥
कल्पशास्त्रोक्तरीत्यात्र ऋतुकालानुसारतः ।
यन्तॄणामाहारभेदास्त्रिविधा इति निर्णता ॥ २६ ॥
चालक यात्रियों के आहारभेद के लिये इस सूत्र में दो पद कहे हैं उनका अर्थ कहा जाता
है, कल्पशास्त्र में कही रीति से यहां ऋतुकाल के अनुसार चालक यात्रियों के आहारभेद तीन प्रकार के
निर्णीत किए हैं ॥ २५—२६ ॥
तदुक्तमशनकल्पे—यह भोजनकल्प ग्रन्थ में कहा है—
रसवर्गे माहिषीया धान्येष्वाढकशालीको ।
मासेष्वाविक (कि ?) मास च वसन्तग्रीष्मयोरिति ॥२७॥
रसेषु गव्यसम्बन्धा धान्ये गोधूममुद्गकाः ।
मासेषु कालज्ञानीय वर्षाशरदृतावपि ॥ २८ ॥
रसेष्वजा रसाश्चैव धान्येषु यवमुद्गकाः ।
मासेषु कलविंकाश्च हेमन्तशिशिरे क्रमात् ॥ २६ ॥ इत्यादि
विनामिषं द्विजातीनां भुक्तिस्सममितीरितम् ।
दुग्ध वर्ग में भैंस के दूध धान्य में अरहर शाली चावल मांसो में भेड़ का मांस भोजन है
वसन्त और ग्रीष्म ऋतु में । दुधों में गौ के दूध धान्य में गेहूं मूंग मांस में कालज्ञानीय-मुर्गे का मांस
वर्षा और शरद् ऋतु में । दूधों में बकरी के दूध धान्यों में जौ मूंग मांसों में चिड़िया कबूतर का मांस
हेमन्त शिशिर ऋतु में क्रम से हैं । द्विजों का मांस के बिना भोजन समान कहा है ॥ २७—२६ ॥
विषनाशास्त्रिभ्यः ॥ अ० १ सू० ८ ॥
बो० वृ०
सूत्रे पदद्वयं प्रोक्तं विषनाशार्थबोधकम् ।
तदर्थं सम्प्रवक्ष्यामि समासेन न विस्तरात् ॥३०॥
पञ्चविंशतिसंख्याका ऋतुजा विषशक्तय ।
पूर्वोक्ताहारभेदेन विनाशं यान्ति नान्यथा ॥३१॥
सूत्र में विषनाशार्थ बोधक दो पद कहे हैं उनके अर्थ संक्षेप से कहूंगा विस्तार से नहीं ।

आहाराधिकरण ] [ २६
ऋतु से उत्पन्न होने वाली २५ विषशक्तियां हैं जो पूर्व कहे आहार के भेद से विनाश को प्राप्त हो
जाती हैं अन्यथा नहीं ॥ ३०–३१ ॥
तदुक्तं विषनिर्णयाधिकारे—वह कहा है विषनिर्णयाधिकार में—
ऋतवष्षड्विधास्तेषा कालशक्त्यादय क्रमात् ।
बहुधा सम्प्रभिद्यन्ते रयवारुणचापलात् ॥३२॥
मरुच्चापलशक्त्य शशतैक तद्गदेव हि ।
वारुणायाप्योडशैकभागाशस्सप्तमेन्तरे ॥३३॥
सम्मेलन यदि भवेत् तदानन्तप्रकारत ।
सिनीवालीकुहूर्योगाद् विषामृतप्रभेदत ॥३४॥
प्रभिद्यन्ते बिशेषेण ऋतूना कालशक्तय ।
यास्सिनीवालिसंग्रस्तास्सर्वामृतशक्तय ॥३५॥
कुहूसंग्रसिता यास्स्युस्तास्सर्वा विषशक्तय ।
सप्तकोट्यष्टपञ्चाशल्लक्षसप्तशतामृता ॥३६॥
तावन्त्येव विषा प्रोक्ता वाल्मीकिगणितोदिता ।
भेदिन्याश्चास्तेषु ? पञ्चविंशास्स्युर्विषशक्तय ॥३७
ऋतुकालानुसारेण यन्त्रदेहविनाशका ।
तन्नाशश्चाहारभेदादिति शातातपोऽब्रवीत् ॥३८॥ इति
तस्मादाहारभेदोस्मिन् सूत्रे त्रेधा निरूपित ।
तत्सेवनात् कायपुष्टिर्यन्तॄणा प्रभवेद् ध्रुवम् ॥३६॥
ऋतुएं छ प्रकार की हैं उनकी कालशक्ति आदि कम से वरुण—आकाश में फैले जल के वेग
की चपलता से बहुत भेदों में होते हैं उसी प्रकार मरुत्-आकाशीय वायु की चपलशक्ति के भाग १०१ हैं,
वारुण शक्ति के १६ अंश (सौ) सातवें अन्तर में हैं सम्मेल यदि हो तो तब अनन्त प्रकार से हो,
सिनीवालीपूर्वा अमावस्या और कुहू—उत्तरा अमावस्या के योग से विष अमृत के भेद से भिन्न-भिन्न
हो जाती है । जो तो सिनीवाली से सम्बन्ध रखती हुई हैं वे सब अमृत शक्तिया हैं और जो कुहू
से संग्रस्त हैं वे सब विषशक्तियां हैं । सात करोड़ अठावन लाख सात सौ अमृत शक्तियां हैं और
उतनी ही विष शक्तिकां वाल्मीकि गणित से कही हुई हैं, उनमें भेदिनियां २५ विषशक्तियां हैं
जो ऋतुकालानुसार चालक यात्रियों के देह का विनाश करने वाली है। उनका नाश आहारभेद से
हो जाता है ऐसे शातातप के पुत्र शातातप ऋषि ने कहा है । अतः आहारभेद इस सूत्र में तीन स्थानों
पर कहा है, उनके सेवन से यात्रियों की शरीरपुष्टि निश्चित हो जावे ॥ ३२—३६ ॥
तत्कालानुसारदिति ॥ अ० १ सू० ६ ॥
बो० बृ०

३० ] • [ बृहद् विमानशास्त्र
पदत्रय तु सूत्रेस्मिन् भुक्तिकालनिर्णये ।
उक्त स्यात् सग्रहेणाद्य तदर्थस्सन्निरूप्यते ॥४०॥
पूर्वोक्तत्रिविधाहारास्तच्छब्देनात्र वर्णिताः ।
भुक्तिकालविधिसम्यग् द्वितीयपदत्स्मृत ॥४१॥
इत्थम्भावेति†शब्द स्यादिति शब्दार्थनिर्णय ।
आहारोत्र प्रभेदेन यन्तॄणा पञ्चधा स्मृत (म् ?) ॥४२॥
इस सूत्र में भोजनकालनिर्णयप्रसङ्ग में तीन पद कहे हैं, अब संक्षेप से अर्थ कहा जाता है ।
पूर्वोक्त तीन प्रकार के आहार तन् शब्द से यहां वर्णित किए हैं भोजनकाल का विधान दूसरे पद से
कहा है, इत्थम्भाव के अर्थ में इति शब्द है यह शब्दार्थ का निर्णय है, चालक यात्रियों का आहार
यहां भेद से पांच प्रकार का कहा है ॥
तदुक्तं शौनकीये—यह कहा है शौनकीय सूत्र में—
अथ भोजनकालविधिं व्याख्यास्याम कालाकालविभागेन गृहिणा
द्वावेकमित्येक मस्करिणा चतुर्वंतरेषा पञ्चधा यानयन्तॄणा यथेच्छ
योगिनामिति ॥
अब भोजन की कालविधि को काल अकाल विभाग से कहूंगा गृहस्थों का दो काल एक काल,
संन्यासियों का एक काल, अन्यों का चार बार, विमान के चालक यात्रियों का पाच बार करना और
योगियों का इच्छानुसार करना ॥
लल्लकारिका—लल्लकारिका है—
कालयोर्भोजनमिति सूत्रवाक्यानुसारत ।
अह्नि द्वितीययामान्ते रात्रौ प्राथमिकान्तरे ॥४३॥
सकालभोजने प्राहुर्गृहिणा कालनिर्णय ।
अकालभोजने तेषामेकभुक्तविधौ क्रमात् ॥४४॥
दिवि तृतीययामाया चतुर्थान्तमिति स्मृत ।
एकभुक्ताधिकारत्वाद् यमिनामेकमेव हि ॥४५॥
अहोरात्रविभागेन शूद्रादीना तु भोजने ।
अह्नि त्रिधैकधा रात्राविति कालविनिर्णय ॥४६॥
भोजने नास्त्यतस्तेषा यथेच्छ भोजन विदु । इति
अह्नि त्रिधा द्विधा रात्रावाकाशे यन्तॄणा क्रमात् ।
पञ्चधा भुक्तिकालस्य निर्णय परिकीर्तित ॥४७॥
सूत्रवाक्यानुसार दो कालों में भोजन है । दिन में दूमरे प्रहर के अन्त में रात्रि में प्रथम
प्रहर के अन्दर । गृहस्थों का कालनिर्णय सकाल भोजन में अर्थात् निश्चितकाल पर करना, उनका एक
† 'इत्यम्भाव इति' उभयोरेकादेश आर्ष ।

आहाराधिकरण ] [ ३१
वार भोजनविधि में अकाल भोजन है दिन में तीसरे प्रहर से लेकर चतुर्थ प्रहर तक कहा है, संन्यासियों
का एक बार भोजन का अधिकार होने से एक काल पर ही करना, शूद्रों आदि का तो भोजन में दिनरात
के विभाग से दिन में तीन बार रात्रि में एक बार यह कालनिर्णय है, उनका भोजन में काल नियम
नहीं यथेच्छ भोजन को जानते हैं । इत्यादि । दिन में तीन बार रात्रि में दो बार भोजन आकाश में
चालक यात्रियों का क्रम से होता है जोकि पांच बार भोजन में कालनिर्णय है ॥४७॥
तदभावे सत्त्वं गोलो वा ॥ अ० १ सू० १० ॥
बो० वृ०
पदत्रय भवत्यस्मिन्नाहारान्तरबोधकम् ।
तदर्थं (ह ?) सम्प्रवक्ष्यामि समासेन यथामति ॥४८॥
आहारासम्भवे तेषां तत्सारेण कृतान् मृदून् ।
प्रदद्याद् घननिःस्वाकानाहारार्थं यथाविधि ॥४६॥
इस सूत्र में तीन पद हैं आहारान्तर—अन्य आहार के स्थान को बोधन कराने वाले उनके
अर्थ को मैं यथामति संक्षेप से कहूंगा, आहार की सम्भावना न होने पर उनके सार—आटे आदि के
बने कोमल घननिस्पाक—पिण्डों—लड्डुओं को आहारार्थ यथाविधि दे ॥४६॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में—
आहारा पञ्चधा प्रोक्ता देहपुष्टिकराश्शुभा ।
अन्नकाञ्जिकपिष्टप्रद्रोटिकासत्त्वरूपतः ॥५०॥
तेषु श्रेष्ठतरो सत्त्वगोलाविति कीर्तितो ।
देह की पुष्टि करने वाले आहार—भोजन पाच प्रकार के कहे हैं । अन्न, काञ्जिक—धान्याम्ल
(खट्टा अन्नरस), पिष्ट—लुगदी, रोटिका, सार—चूर्णरूप में उनमें सत्त्व—सार—चूर्ण—भुनाचून—कसार और
गोल—लड्डू कहे हैं ॥५०॥
उक्तं हि पाकसर्वस्वे—कहा ही पाकसर्वस्व में—
धान्याद्याहारवस्तूना सत्त्वमाहृत्य यन्त्रतः ।
पाक कृत्वा पाचनाख्ययन्त्रभाण्डे यथाविधि ॥५१॥
उक्ताष्टमेन पाकेन सत्त्वगोलान् प्रकल्पयेत् ।
सुगन्ध मधुर स्निग्धमाहार पुष्टिवर्धनम् ॥५२॥ इति
धान्य आदि आहार वस्तुओं के चूर्ण —आटे को चक्की यन्त्र से लेकर पाचना नामक—कढाई
आदि में यथाविधि पाक करके कहे आठवें भाग पाक से सत्त्वगोल—लड्डू बनावे. उसमें सुगन्ध मधुर
स्निग्ध डालकर पुष्टिवर्धक आहार बनावे ॥ ५१–५२ ॥
फलमूलकन्दसारो वा ॥ अ० १ सू० ११ ॥
बो० वृ०

३२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
पूर्वसूत्रे धान्यसत्त्वाहारमुक्तं हि यन्तॄणाम् ।
तथैवास्मिन् कन्दमूलफलसत्त्वमपीयते ॥५३॥
प्रथम कन्दसत्त्वस्स्याद् द्वितीयो मूलसत्त्वकः ।
फलसत्त्वस्तृतीयस्स्यादिति सूत्रार्थनिर्णय ॥५४॥
पूर्व सूत्र में धान्य—गेहूं आदि अन्न के चूर्ण—भुने आटे आदि का बना विमानचालक
यात्रियों का आहार कहा गया है वैसे ही उस सूत्र में कन्द मूल फल के सत्त्व—गूदे मीगी आदि को
आहार कहा है । प्रथम कन्दसत्त्व हो दूसरे मूल का सत्त्व हो तीसरे फलसत्त्व हो यह सूत्रार्थ है ॥५३-५४॥
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प में—
अलाभे धान्यसत्त्वस्य सत्त्वत्रयमुदाहृतम् ।
कन्दसत्त्वो मूलसत्त्व फलसत्त्व इति क्रमात् ॥५५॥
पिष्टशंकरामञ्जूषमधुक्षीरघृतादय ।
स्निग्धोदकक्षारकटुकमञ्जूषाम्लम्लु

आहाराधिकरण ] [ ३३
मूलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुर्ज्ञानविदा वरा ।
मनोबुद्धीन्द्रियग्रामज्ञानाम् माससिक्रिरा ॥ ६३ ॥
फलसत्त्वाद् वृद्धिमेतीत्याहुश्शास्त्रविदा वरा ।
एतत्सत्त्वत्रयाहारो यन्तॄणा भोजने बुधा ॥ ६४ ॥
शास्त्रोक्ताहारवर्गेषु श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतम विदु ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्सत्त्व सग्रहेत् सुधी ॥ ६५ ॥ इत्यादि
आहार मूल वर्ग तो शास्त्र में १६ प्रकार के कहे हैं, वैसे ही आहार फल वर्ग ३२ कहे हैं
कन्दसत्त्व से मेद मज्जा हड्डी वीर्य आदि बढ़ते हैं मूलसत्त्व से ओज, बल काय की पुष्टि प्राण कोश
आदि बढ़ते हैं, फलसत्त्व से मन ज्ञानेन्द्रियों का ज्ञान रक्त मास सिक्रिजर-रस बढ़ते हैं ऐसा श्रेष्ठ शास्त्रज्ञ
कहते हैं, यह तीन सत्त्वों का आहार विमान के चालक यात्रियों के भोजन में विद्वानों ने शास्त्रोक्त आहार
वर्गों में श्रेष्ठतम माना है । अत सर्व प्रयत्न से बुद्धिमान उस सत्त्व का संग्रह करे ॥ ६१-६५ ॥
अपि च तृणादीनाम् ॥ अ० १, सू० १२ ॥
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे कन्दमूलफलसत्त्वमुदाहृतम् ।
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वमस्मिन्निरूप्यते ॥६६॥
पूर्व सूत्र में कन्द मूल फल का सत्त्व कहा है, इस सूत्र मे तृण गुल्म लता आदियों का सत्त्व
निरूपित किया जाता है ।
तदुक्तमशनकल्पे—वह कहा है अशनकल्प ग्रन्थ में —
तृणगुल्मलतादीना सत्त्वाहार च यन्तॄणाम् ।
पूर्वोक्तसत्त्ववद् देहारोग्यायुरप्यादिवर्धनम् ॥६७॥
तस्मात् सत्त्वमप्यन्तृभोजनार्थ समाहरेत् ।
दूर्वाषट्क मुञ्जषट्क कुशषट्क तथैव हि ॥६८॥
शौण्डीरस्याश्वकर्णस्य षट्क षट्कमत् परम् ।
शतमूलत्रय चैव भोजनेत्यन्तशोभना ॥६९॥
कारुवेल्ली चन्द्रवेल्ली मधुवेल्ली तथैव च ।
वर्चुली माकुटीवेल्ली सुगन्धा सूर्यवेल्लिका ॥७०॥
तृण, गुल्म, लता आदि का सत्त्व—लुगदी या रस चालक यात्रियों का भोजन है । पूर्वोक्त
सत्त्व—कन्द मूल फल के सत्त्व की भांति देह का आरोग्य आयुश्य आदि बढाने वाला है अत (इनका)
सत्त्व भी भोजनार्थ ले ले । दूब ६ भाग, मूञ्ज ६ भाग, कुशा ६ भाग, शौण्डीर ?—देवधान्य—कंगुनी या
स्वयं उत्पन्न जंगली तृण धान्य ? ६ भाग, अश्वकर्ण—लताशाल ६ भाग, शतमूलं—शतमूलिका—महा-
मूषाकर्णी ३ भाग, भोजन में अत्यन्त अच्छे हैं । कारुवेल्ली—कारवल्ली—छोटा करेला, चन्द्रवेल्ली—
ब्राह्मी, मधु वेल्ली—मुलहठी, वर्चुली ?, माकुटीवेल्ली ?, सुगन्धा—तुलसी, सूर्यवेल्ली—सूर्यवल्ली—
क्षीरकाकोली ॥ ६७-७० ॥

एते गुल्मास्सदा यन्तृभोजने पुष्टिवर्धना ।
सोमवल्ली चक्रिकादतुम्बिकारसवल्लिका ॥७१॥
कूष्माण्डवल्लिका चेक्षुवल्लिका पिष्टवल्लरी ।
सूर्यकान्ता चन्द्रकान्ता मेघनाद. पुनर्नवः ॥७२॥
अवन्ती वास्तु मत्स्या क्षीरुकमाया. पुष्टिवर्धना ।
पूर्वोक्तपिष्टमञ्जूषशर्कराद्या यथाक्रमम् ॥७३॥
विधिवच्छोदिते शास्त्रमुखात् सलभ्यते यदि ।
यो वा को वा भवेद् गुल्मलतादूर्वाद्य क्रमात् ॥७४॥
सत्वाहरणयोग्यास्ते बलपुष्टिविवर्धना. ।
शाकपुष्पतत्पन्नपल्लवादीना तथैव हि ॥७५॥
सत्वमत्युत्तम विद्यादाहारे यन्तृ णामिति ।
ये गुल्म सदा चालक यात्रियों के भोजन में पुष्टिवर्धक हैं । सोमवल्ली-सोमलता, चक्रिकाद ?,
तुम्बिका-घिया लौकी ?, रसवल्लिका ?, पेटा कद्दू लता, इक्षुवल्लिका-इक्षुवल्ली-कृष्णक्षीरविदारी,
पिष्टवल्लरी-पिष्टपर्णी, सूर्यकान्ता-आदित्यपर्णी, चन्द्रकान्ता-निर्गुण्डी-सम्भालू, मेघनाद-चौलाई,
पुनर्नवा, अवन्ती-राई, वास्तु-बथवा, मत्स्या-कुटकी, क्षीरुकमा ?-क्षीरपुष्पी-शङ्खपुष्पी, ये पुष्टि-
वर्धक हैं । पूर्व कहे चूर्ण लुगदी-गुड़ा दलिया या खाण्ड यथाक्रम विधिवत् शास्त्रमुख से प्राप्त होते
हैं । जो भी कोई भी गुल्म, लता, दूर्वा आदि ही क्रम से सत्त्व लेने योग्य हों वे बलपुष्टि बढ़ाने वाले हैं
शाक फूल पत्ते कोपल आदि आहार में उनके सत्त्व को यात्रियों के आहार में जाने ॥ ७१-७४ ॥
अथ लोहाधिकरणम् ॥
अब लोहे का अधिकरण प्रस्तुत किया जाता है ।
अथ यानलोहानि ॥ अ० १, सू० १३ ॥
बो० वृ०
यन्तॄणामाहारभेद. पूर्वाधिकरणे स्मृत ।
अथेदानीं यानलोहस्वरूपोस्मिन्निरूप्यते ॥७६॥
पदद्वय भवेदस्मिन् यानलोहविनिर्णये ।
तयोरानन्तर्यवाची स्यादादिमपदस्तथा ॥७७॥
यानक्रियार्हलोहानि प्रोक्तानि स्युर्द्वितीयत ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥७८॥
उक्तानि यानलोहानि शौनकीये यथाक्रमम् ।
तान्येवोदाहरिष्यामि विमानरचनाविधौ ॥७९॥
विमानचालक यात्रियों का आहारभेद पूर्व अधिकरण में कह दिया । अब यान के लोहे
का स्वरूप इस प्रकरण में निरूपित किया जाता है । इस सूत्र में दो पद विमानलोहे के निर्णय में हैं ।

लोहाधिकरण ] [ ३५
उन दोनों में आदिम पद 'अथ' अनन्तरार्थ का वाची है। दूसरे पद से विमानकार्य के योग्य लोहे कहे
हैं। पदों का अर्थ ऐसे कहकर अब विशेषार्थ कहा जाता है। शौनकीय सूत्र में जैसे लोहे कहे हैं वैसे
ही यथाक्रम उन्हें विमानरचनाविधि में कहूंगा ॥ ७६—७९ ॥
तदुक्तं शौनकोये—वह कहा है शौनकीय सूत्र में-
अथ वैमानिकान् लोहाननुक्रमिष्यामस्सौमकसौण्डालिकमौक्तिकाइचे-
तत्सम्मेलनादूष्मपाष्षोडशधा भवन्तीति ते वैमानिका इति ॥
अथ वैमानिक - विमान के हितकर लोहों को कहेंगे जो कि सौमक, सौण्डालिक, मौक्तिक हैं।
इनके सम्मेलन से ऊष्मप लोहे १६ प्रकार के होते हैं अत. वे वैमानिक लोहे होते हैं ॥
अथ नामानि - अथ उनके नाम हैं-
उष्णाम्भरोष्णपोष्णाहनराजाम्लतृड् वीरहापञ्चघ्नोग्नितृड्भारहनशीत-
ह्नोगरलघ्नाम्लहनो विषम्भरविशल्यकृद् द्विजमित्रश्चेतीत्यादि ॥
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