बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
२३४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यन्त्रकल्पेऽपि—यन्त्रकल्प में भी--
जातिभेदो विमानानां मान्त्रिकादिप्रभेदतः ।
युगशक्त्यनुसारेण प्रोक्तं यानविदां वरैः ॥ ४७ ॥ इत्यादि ॥
विमानों का जातिभेद मान्त्रिक आदि प्रकार से युगशक्ति के अनुसार यानवेत्ताओं में श्रेष्ठ-
जनों ने कहा है ॥ ४७ ॥
मान्त्रिको तान्त्रिकश्चैव कृतकश्चेति शास्त्रतः ।
जातिभेदास्त्रिधा प्रोक्ता विमानाना बुधैः क्रमात् ॥ ४८ ॥
इति यानबिन्दौ
मान्त्रिक तान्त्रिक और कृतक शास्त्रानुसार जातिभेद तीन प्रकार के विमानों के
विद्वानों ने कहे हैं ॥ ४८ ॥ यह यानबिन्दु में कहा है ।
युगभेदाज्जातिभेदो विमानाना महर्षिभिः ।
मान्त्रिकादिप्रभेदेन त्रिधा शास्त्रेषु वर्णितम् ॥ ४६ ॥
इति खेटयानप्रदीपिकायाम् ।
युगभेद से जातिभेद विमानों का महर्षियों ने मान्त्रिक आदि प्रकार से तीन प्रकार शास्त्रों में
कहा है ॥४६॥ यह खेटयान प्रदीपिका में कहा ॥
त्रैविध्य व्योमयानाना युगभेदानुसारत ।
उक्त हि शास्त्रतस्सम्यग्यानशास्त्रविदा वरैः ॥ ५० ॥
इति व्योमयानार्कप्रकाशिकायाम् ॥
युगभेद के अनुसार व्योमयानों की त्रिविधता शास्त्रसम्मत ठीक यानशास्त्रज्ञ श्रेष्ठ विद्वानों ने कही
है ॥५०॥ यह व्योमयानार्कप्रकाशिका में कहा है ।
एव शास्त्रानुसारेण सूत्रेऽस्मिन् जातिभेदत ।
त्रैविध्य व्योमयानानामुक्त सम्यग्यथाविधि ॥ ५१ ॥ इत्यादि ॥
इस प्रकार शास्त्रानुसार इस सूत्र में जातिभेद से विमानों की त्रिविधता यथाविधि सम्यक्
कही है ॥५१॥
पञ्चविंशन्मान्त्रिकाः पुष्पकादिप्रभेदेन ।। अ० २ । सू० २ ॥१
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे विमानाना त्रैविध्य जातिभेदत ।
युगरूपानुसारेण वर्णित सप्रमाणत ॥ ५२ ॥
मान्त्रिका इति ये प्रोक्ता विमानास्तेषु शास्त्रतः ।
पुष्पकादिप्रभेदेन तेषां संख्याविनिर्णयः ॥ ५३ ॥
विशदी क्रियते सम्यक् सूत्रेऽस्मिन् शास्त्रतः ।
पदानि त्रीणि शास्त्रेऽस्मिन् यानसंख्याविनिर्णये ॥ ५४ ॥
जात्यधिकरण ] [ २३५
तत्रादिमपदाद् यानसंख्या सम्यक् प्रदर्शिता ।
द्वितीयपदतो व्योमयानजातिनिरूपिता ॥ ५५ ॥
तृतीयपदतस्तेषा नामभेदा निरूपिता ।
एवं सूत्रस्थपदाना सामान्यार्थो निरूपितः ॥ ५६ ॥
इदानीं सप्रमाणेन ? विशेषार्थो विविच्यते ।
ये तु मन्त्रप्रभावेण (न ?) व्योम्नि सचरति ? स्वयम् ॥५७॥
तेष्वेकेकविमानस्य पुष्पकादिप्रभेदत ।
पञ्चविंशतिनामानि शौनकीये यथाक्रमम् ॥ ५८ ॥
निरूपितानि तान्येव क्रमादत्र प्रचक्षते ।
पूर्व सूत्र में जातिभेद से विमानों की त्रिविधता युगरूपानुसार सप्रमाण वर्णित की है, उसमें
जो शास्त्र में मान्त्रिक विमान कहे हैं पुष्पक आदि भेद से उनकी संख्या का निर्णय स्पष्ट इस सूत्र में
शास्त्रमान से सम्यक् किया जाता है, यानसंख्या निर्णय के सम्बन्ध में इस शास्त्र-सूत्र में तीन पद हैं ।
आदि पद से यानसंख्या सम्यक् दिखलाई है द्वितीय पद से व्योमयान जाति कही है तृतीय पद से
उनके नाम निरूपित किये हैं । इस प्रकार सूत्रस्थ पदों का सामान्य अर्थ निरूपित किया है । अब
सप्रमाण विशेष अर्थों का विवेचन करते हैं, जो तो मन्त्रप्रभाव से आकाश में स्वयं सञ्चार करते हैं उनमें
एक एक विमान का पुष्पक आदि प्रभेद से पच्चीस नाम शौनकीय सूत्र में यथाक्रम निरूपित किये हैं
उन्हें ही क्रम से कहते हैं ॥ ५२-५८ ॥
तत्र तावच्छौनकं सूत्रम्—उस विषय में शौनक सूत्र कथन—
अथ विमानेषु त्रेताया पञ्चविंशतिस्ते मान्त्रिकास्तेषा नामान्यनुक्र-
मिष्याम । पुष्पकाजमुखभ्राजस्वज्योतिर्मु खकौशिकभीष्मशेषवज्राङ्गदैवत-
ज्वलकोलाहलाचिर्विष्णुप्सोमांकपञ्चवर्णषण्मुखपञ्चबाणमयूरशङ्करत्रिपुरवसुहार-
पञ्चाननाम्बरीषत्रिनेत्रभेरूण्डा इति ॥
त्रेतायुग में विमानों में मान्त्रिक विमान हैं उनके नामों का वर्णन करेंगे—पुष्पक, अजमुख,
भ्राज, स्वज्योतिर्मुख, कौशिक, भीष्म, शेष, वज्राङ्ग, दैवत, ज्वल, कोलाहल, आर्चिष, भूष्णु, सोमाङ्क,
पञ्चवर्ण, षण्मुख, पञ्चबाण, मयूर, शङ्कर, त्रिपुर, वसुद्वार, पञ्चानन, अम्बरीष, त्रिनेत्र, भेरुण्ड ॥
माणिभद्रकारिका—इस विषय में माणिभद्रकारिका कथन—
त्रेतायुगविमानास्स्युर्द्वात्रिंशन्मान्त्रिका इति ।
गौतमोक्तानि नामानि तेषामत्र यथाक्रमम् ॥ ५६ ॥
विविच्यन्ते समालोड्य मुलसूत्रं यथामति ।
पुष्पकोऽब्जमुखो भ्राजस्स्वज्योतिश्च कौशिक. ॥ ६० ॥
भीष्मकदशेषवज्राङ्गो दैवतो ज्वल एव च ।
कोलाहलोर्चिषो भूष्णुस्सोमाङ्को वर्णंपञ्चक. ॥ ६१ ॥
२३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
षण्मुखः पञ्चबाणश्च मयूरो शङ्करप्रियः ।
त्रिपुरोवसुहारश्च पञ्चाननोबरीषकः ॥ ६२ ॥
त्रिणेत्रो भेरुण्ड इति मान्त्रिकाणां यथाक्रमम् ।
एतान्युक्तानि नामानि पञ्चविंशन्महर्षिणा ॥ ६३ ॥ इत्यादि ॥
त्रेतायुग के मान्त्रिक विमान बत्तीस हैं गौतम के कहे हुए उनके नामों का यहां मूल सूत्र का
यथामति आलोडन करके करते हैं । पुष्पक, अजमुख, भ्राज, स्वयंज्योति, कौशिक, भीष्मक, शेष, वज्राङ्ग,
दैवत, ज्वल, कोलाहल, आर्चिष, भूष्णु, सोमाङ्ग, वर्णपञ्चक, षण्मुख, पञ्चबाण, मयूर, शङ्करप्रिय, त्रिपुर,
वसुहार, पञ्चानन, अम्बरीषक, त्रिणेत्र, भेरुण्ड, ये मान्त्रिक विमानों के नाम यथाक्रम महर्षि ने पच्चीस
कहे हैं ॥
हस्तलेख कापी नं १७—
भैरवादिभेदात् तान्त्रिकाष्टपञ्चाशत् ॥ अ० २, सू० ३ ॥ ?
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे मान्त्रिकाणा नामसंख्यादिनिर्णयः ।
कृतो यथा तान्त्रिकव्योमयानाना तथैव हि ॥ १ ॥
नामसंख्यानिर्णयार्थं सूत्रोयं परिकीर्तित ।
तान्त्रिकाणा नामसंख्याबोधकानि पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
पदानि त्रीणि सूत्रेस्मिन् वर्णितानि यथाक्रमम् ।
तत्रादिमपदाद् याननामभेदो निरूपित ॥ ३ ॥
द्वितीयपदतस्तेषा जातिभेद प्रदर्शित ।
तृतीयपदतस्संख्यानिर्णयस्समुदीरितः ॥ ४ ॥
एव सामान्यतस्सूत्रपदार्थ परिकीर्तित ।
इदानीं तद्विशेषार्थस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ५ ॥
आकारगतिवेगाद्या मान्त्रतान्त्रिकयोः क्रमात् ।
समानमिति वर्ण्यन्ते यानशास्त्रविदा वरैः ॥ ६ ॥
तथापि तान्त्रिकेष्वेकप्रभेद परिकीर्त्यते ।
द्यावापृथिव्योस्सन्ध्यस्थशक्तिसम्मेलनक्रमः ॥ ७ ॥
एकप्रभेद इत्याहुस्तान्त्रिकेषु मनीषिणः ।
पूर्व सूत्र में मान्त्रिक विमानों के नाम और संख्या आदि का निर्णय जैसे कर दिया वैसे ही
तान्त्रिक व्योमयानों के भी नाम और संख्या के निर्णयार्थ यह सूत्र कहा गया है । तान्त्रिकों के नाम और
संख्या के बोधक पृथक् पृथक् तीन पद इस सूत्र में यथाक्रम वर्णित हैं । आदिपद से नाम भेद निरूपित
किया है, द्वितीय पद से उनका जातिभेद दिखलाया है, तृतीय पद से संख्या निर्णय प्रकट किया है ।
इस प्रकार सामान्य से सूत्र का पदार्थ — सूत्र पदों का अर्थ कहा गया है अब उसका विशेष अर्थ संक्षेप से
निरूपित किया जाता है । आकार गति वेग आदि मान्त्रिक और तान्त्रिक में क्रम से यानशास्त्रवेत्ताओं
द्वारा समान कहे जाते हैं तथापि तान्त्रिकों में एक प्रभेद कहा गया है, द्यावापृथिवी की सन्धि में स्थित
शक्ति का सम्मेलनक्रम ही भेद मनीषी तान्त्रिकों में कहते हैं ॥ १—७ ॥
२३८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
लल्लोऽपि—लल्ल आचार्य भी कहते हैं—
एक एव प्रभेदस्स्यान्मान्त्रिकादपि तान्त्रिके ॥ ८ ॥
द्यावापृथिव्योर्यच्छक्ति तस्यास्सम्मेलनक्रमः ।
आकारगतिवैचित्र्यादिषु सर्वत्र हि क्रमात् ॥ ९ ॥
एतद्विना समानत्वमुभयोरपि वर्णितम् (.?) ।
तान्त्रिकाणां प्रभेदस्तु षट्पञ्चाशदिति क्रमात् ॥ १० ॥
सूत्रे यदुक्तं तच्छौनकोक्तरीत्या निरूप्यते ।
मान्त्रिक विमान से तान्त्रिक विमान में एक ही भेद है वह यह कि द्यावापृथिवी की जो शक्ति
है उसका सम्मेलन क्रम बिना इसके आकार गति वैचित्र्य आदि में क्रम से सर्वत्र ही दोनों में समानत्व
है तान्त्रिकों का भेद ५६ निर्णय किया है। जो कि शौनक की कही रीति के अनुसार निरूपित किए
जाते हैं ॥ ८—१० ॥
तत्र तावच्छौनकसूत्रम्—उस विषय में अब शौनक सूत्र कथन है—
द्वापरे* तान्त्रिकाण्यष्टपञ्चाशत्तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम । भैरवनन्दनवटुक-
विरिञ्चितुम्बरवैनतेयभेरूण्डमकरध्वजशृङ्गाटकाम्बरीषशेषास्यसैहिकमातृक-
भ्राजपैङ्गलटिट्टिभप्रमथभूर्विणचम्पकद्रौणिकरुक्मपुङ्खभ्रामणिककुकुभकालभैरव
जम्बुकगिरीशगरुडास्यगजास्यवसुदेवशूरसेनवीरबाहु बुसुण्डगण्डकशुकतुण्ड-
कुमुदकौशिकाइजगरपञ्चदलचुम्बकदुन्दुभिरम्बरास्यमायूरकभीरूनलिककाम-
पालगण्डक्षंपारियात्रशकुन्तरविमण्डनव्याघ्रमुखविष्णुरथसौवर्णिकमुड-
दम्भोलिबृहत्कुक्षमहानट इति ।
द्वापर युग में तान्त्रिक विमान ५६ हैं उनके नाम कहेंगे । भैरव, नन्दन, वटुक, विरिञ्चि, तुम्बर,
वैनतेय, भेरूण्ड, मकरध्वज, शृङ्गाटक, अम्बरीष, शेषास्य, सहिक, मातृक, भ्राज, पैङ्गल, टिट्टिभ, प्रमथ,
भूर्विण, चम्पक, द्रौणिक, रुक्मपुङ्ख, भ्रामणि, ककुभ, कालभैरव, जम्बुक, गिरीश, गरुडास्य, गजास्य,
वसुदेव, शूरसेन, वीरबाहु, ब्रुसुण्ड, गण्डक, शुकतुण्ड, कुमुद, कौशिक, अजगर, पञ्चदल, चुम्बुक, दुन्दुभि,
अम्बरास्य, मायूरक, भीरु, नलिक, कामपाल, गडक्षं, पारियात्र, शकुन्त, रविमण्डन, व्याघ्रमुख, विष्णुरथ,
सौवर्णिक, मूढ, दम्भोलि, बृहत्कुक्ष, महानट ॥
माणिभद्रकारिका-इस विषय में माणिभद्रकारिका कथन है—
षट्पञ्चाशदिति प्रोक्तास्तान्त्रिका द्वापरे युगे ।
तेषां नामानि विधिवद् गोतमोक्तप्रकारतः ॥ ११ ॥
निरूप्यन्तेऽत्र विधिवद् यथाशास्त्र समासतः ।
भैरवो नन्दकस्तद्वद्वटुकोथ विरिञ्चिकः ॥ १२ ॥
तुम्बरो वैनतेयश्च भेरुण्डो मकरध्वज ।
शृङ्गाटकोम्बरीषश्च शेषास्यो सैंहिकस्तथा ॥ १३ ॥
- त्रेताया ( हस्तपाठे ) लेखक प्रमादतः ।
जात्यधिकरण ] [ २१६
मातृको भ्राजकश्चैव पैङ्गलो टिट्टिभस्तत ।
प्रमथो भूर्ष्णिकस्तद्वच्चम्पको द्रोणिकस्तथा ॥१४॥
रुक्मपुङ्खो भ्रामणिक ककुभ कालभैरवः ।
जम्बुकाख्यो गिरीशश्च गरुडास्यो गजास्यक. ॥१५॥
वसुदेवश्शूरसेनो वीरबाहुर्भुसुण्डक. ।
गण्डको शुकतुण्डश्च कुमुद क्रौञ्चिकस्ततः ॥१६॥
अजगर. पञ्चदलश्चुम्बको दुन्दुभिस्तथा ।
अम्बरास्यो मयूरश्च भीरुश्च नलिकाह्वय ॥१७॥
कामपालोऽथगण्डक्ष पारियात्रो शकुन्तक ।
रविमण्डनो व्याघ्रमुख पश्चाद् विधुरथस्तथा ॥१८॥
सौवर्णिको मूडश्चैव दम्भोल्याख्यस्तथैव च ।
बृहत्कुञ्जविमानश्च महानट इति ॥१९॥
एते षट्पञ्चाशतिकास्तान्त्रिका इति द्वापरे । इति
द्वापर युग में तान्त्रिक विमान ५६ कहे हैं उनके नाम गौतम के कहे प्रकार से यथाशास्त्र
संक्षेप से निरूपित किए जाते हैं । भैरव, नन्दक, वटुक, विरिञ्चिक, तुम्बर, वैनतेय, भेरुण्ड, मकरध्व,
शृङ्गाटक, अम्बरीष, शेषास्य, सैंहिक, मातूक, भ्राजक, पैङ्गल, टिट्टिभ, प्रमथ, भूर्णिण, चम्पक, द्रोणिक,
रुक्मपुङ्ख, भ्रामणिक, ककुभ, कालभैरव, जम्बुकनामक, गिरीश, गरुडास्य, गजास्यक, वसुदेव, शूरसेन,
वीरबाहु, भुसुण्डक, गण्डक, शुकतुण्ड, कुमुद, क्रौञ्चिक, अजगर, पञ्चदल, चुम्बक, दुन्दुभि, अम्बरास्य,
मयूर, भीरु, नलिकानामक, कामपाल, गण्डर्क्ष, पारियात्र, शकुन्तक, रविमण्डल, व्याघ्रमुख, विधुरथ,
सौवर्णिक, मूड, दम्भोलि नामक, बृहत्कुञ्ज, महानट क्रम से ये ५६ तान्त्रिक विमान हैं द्वापर में ॥११-१६॥
शकुनायाः पञ्चविंशत् कृतकाः ॥ अ० ३ सू० ४ ॥ १
॥ बो० वृ० ॥
एवमुक्त्वा तान्त्रिकाणा नामभेदादिनिर्णय. ।
कृतकाना नामभेदनिर्णयार्थ तथैव हि ॥२०॥
क्रमेण शास्त्रतस्सम्यक् सूत्रोऽय परिकीर्तित ।
कृतकाना यानसंख्याबोधकानि पृथक् पृथक् ॥२१॥
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् वर्णितानि यथाक्रमम् ।
तत्रादिमपदाद् याननामभेदो निरूपित. ॥२२॥
तेषां सख्याविभागस्तु द्वितीयपदतस्मृतः ।
तृतीयपदतस्तद्वज्जातिभेदः प्रकीर्तित. ॥२३॥
एव सामान्यतस्सूत्रपदार्थस्सन्निरूपितः ।
२४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
इदानीं तद्विशेषार्थस्सङ्ग्रहेण विविच्यते ॥२४॥
आकारगतिवैचित्र्यादिषु शास्त्रान्महर्षिभिः ।
समानमिति हि प्रोक्तं मन्त्रतन्त्रादिकं विना ॥२५॥
कृतकानां प्रभेदस्तु पञ्चविंशदिति क्रमात् ।
सूत्रे निरूपितं यत्तच्छौनकोक्तप्रकारतः ॥२६॥
समालोच्य विशेषेण यथामति निरूप्यते ।
इस प्रकार तान्त्रिकविमान का नाम भेद आदि निर्णय कहकर कृतकविमानों के नामभेद आदि
के निर्णयार्थ भी वैसे ही क्रम से शास्त्ररीति से सम्यक् यह सूत्र कहा गया है । कृतकविमानों के नाम
संख्याबोधक पृथक् पृथक् तीन पद इस सूत्र में यथाक्रम वर्णित हैं, उनमें आदिमपद से यान के नाम
और भेद निरूपित किये हैं, उनका संख्याविभाग तो द्वितीयपद से जानना तृतीयपद से जातिभेद कहा
गया है । इस प्रकार सामान्य से सूत्र का पदार्थ निरूपित कर दिया, अब उसके विशेषार्थ का संक्षेप से
विवेचन किया जाता है । शास्त्र से आकार विचित्रगति आदियों में समान है मन्त्रतन्त्र आदि के विना
ऐसा महर्षियों ने कहा है । कृतकों के भेद पच्चीस हैं, यहां सूत्र में शौनक में कहे प्रकार से निरूपित
किया है उसे यथामति सम्यक् मन्थन करके विशेषरूप से निरूपित किया जाता है ॥
तत्र तावच्छौनकसूत्रम् — उसमें शौनक सूत्र कथन है—
अथ तिष्ये कृतकभेदाः पञ्चविंशतिस्तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम ॥
शकुनसुन्दररुक्ममण्डलवक्रतुण्डभद्रकरुचकवैराजभास्करगजावर्तपौष्कलविरञ्चिनन्दककुमुद-
मन्दरहसशुकास्यसोमकक्रौञ्चकपद्मकसैहिकपञ्चबाण शौर्यायणपुष्करकोदण्डा इति ॥
कलियुग में कृतकविमान के भेद पच्चीस हैं उनके नाम कहेंगे । शकुन, सुन्दर, रुक्म, मण्डल,
वक्रतुण्ड, भद्रक, रुचक, वैराज, भास्कर, गज, आवर्त, पौष्कल, विरञ्चि, नन्दक,कुमुद, मन्दर,हंस, शुकास्य,
सोम, क्रौञ्चक, पद्मक, सैंहिक, पञ्चबाण, शौर्यायण, पुष्कर, कोदण्ड ॥
माणिभद्रकारिका—माणिभद्रकारिका कथन है—
पञ्चविंशदिति प्रोक्ताः कृतकास्तु कलौ युगे ।
तेषां नामानि विधिवद् गौतमोक्तविधानतः ॥२७॥
विविच्यन्तेऽत्र विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् ।
शकुनो सुन्दरश्चैव रुक्मको मण्डलस्तथा ॥२८॥
वक्रतुण्डो भद्रकश्च रुचकश्च विराजकः ।
भास्करश्च गजावर्तपौष्कलोथ विरञ्चकः ॥ २६ ॥
नन्दकः कुमुदस्तद्वन्मन्दरो हंस एव च ।
शुकास्यस्सोम्यकश्चैव क्रौञ्चको पद्मकस्तत ॥ ३० ॥
सैंहिको पञ्चबाणश्च शौर्यायणस्तथैव हि ।
पुष्करः कोदण्ड इति कृतकाः पञ्चविंशतिः ॥ ३१ ॥ इति
शकुनविमान ] [ २४१
कलियुग में कृतकविमान पच्चीस कहे हैं उनके नामों का गौतम के कहे विधान से विवेचन
विधिवत् संक्षेप से करते हैं। शकुन, सुन्दर, रुक्मक, मण्डल, वक्रतुण्ड, भद्रक, रोचक, विराजक, भास्कर,
गज, आवर्त, पौष्कल, विरञ्चिक, नन्दक, कुमुद, मन्दर, हंस, शुकास्य, सौम्यक, क्रौञ्चक, पद्माक, सैंहिक,
पञ्चबाण, और्यायण, पुष्कर, कोदण्ड । ये कृतकविमान पच्चीस हैं ॥ २६-३१ ॥
राजलोहादेतेषामाकाररचना ॥ अ० ३, सू० ५ ॥ १ ?
बो० वृ०
एवमुक्त्वा कृतकयानप्रभेदान्‡ शास्त्रात क्रमात् ।
शकुनादिविमानानामाकाररचनादय ॥ ३२ ॥
अथेदानीं राजलोहादेवेहस्मिन्निरूप्यन्ते(ते?) ॥ ३३ ॥
इस प्रकार कृतकविमानयान के भेदों को शास्त्र से क्रमशः कहकर राजलोहे से शकुन आदि
विमानों के आकाररचना आदि हीं अब इस में निरूपित किए जाते हैं ॥ ३२-३३ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
कृतकव्योमयानानामाकाररचनाविधौ ।
उक्तेषु सर्वलोहेषूष्मपास्सुप्रशस्तका ॥ ३४ ॥
तेषु राजारख्यलोहोत्र शुकनस्य प्रशस्तक ॥
कृतकव्योमयानों के आकार रचनाविधि में कहे सारे लोहों में उष्मपा प्रशस्त लोहे हैं उनमें
भी राजनामक लोहा यहां शकुनविमान का प्रशस्त है ॥ ३४ ॥
तदुक्तं लोहप्रकरणे—वह कहा है लोहप्रकरण में—
सोमसौण्डालमौर्त्विकलोहवर्गत्रये क्रमात् ।
त्र्यष्टद्विलोहभागान् टङ्कणेन समन्वितान् ॥ ३५ ॥
मूषाया पूरयित्वाग्नौ न्यसेद् व्यासटिकान्तरे ।
द्वासप्तत्युत्तरद्विशतकक्ष्यौष्णप्रमाणत ॥ ३६ ॥
सञ्गालयेत् ततो राजलोहो भवति नान्यथा । इत्यादि ॥
सोम, सौण्डाल, मौर्त्विक तीनों लोहवर्ग-जाति में क्रम से तीन आठ दो लोहभाग मात्राओं
को टङ्कण—सुहागा के साथ मूषा (कृत्रिम बोतल) में भरकर अग्नि में रखदे व्यासटिका कुण्ड के अन्दर
दो सौ बहत्तर कक्ष्य-दर्जे की उष्णता से गलावे फिर वह राजलोहा बन जाता है ॥ ३५-३६ ॥
विश्वम्भरोपि-विश्वम्भर आचार्य ने भी कहा है-
लोहाधिकरणे सम्यग्विमानरचनाविधौ ।
ऊष्मपाप्योऽश प्रोक्ताश्श्रेष्ठाच्छ्रे ⊕ ष्ठतरा इति ॥ ३७ ॥
चतुर्थलोहस्तेषु राजारख्योलोह इतीरित ।
तेनैव कुर्याच्छकुनविमान इति वर्णित ॥ ३८ ॥ इत्यादि ॥
‡ प्रमेदाच्छास्त्रत ( हस्तलेखे ? )
२४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सम्यक् विमानरचनाविधि में लोहाधिकरण में—लोहप्रसङ्ग में सोलह ऊष्मप श्रेष्ठ से श्रेष्ठ
लोहे हैं उनमें चतुर्थ लोहा राजनामकोलोहा कहा है उसी से शकुनविमान बनावे यह वर्णित किया है ।
आदौ पीठस्ततो नालस्तम्भ पश्चाद् यथाक्रमम् ।
त्रिचक्रकीलकान्यस्य सरन्ध्राणि तत परम् ॥ ३९ ॥
चतुरोष्ण्यकयन्त्राञ्च वातनालास्तथैव हि ।
ततो जलावरणानालस्तैलपात्रमत परम् ॥ ४० ॥
वातपाचकतन्त्रीनालोथ्चुल्ली तथैव च ।
विद्युद्यन्त्रञ्चाथ वातचोदनायन्त्र एव च ॥ ४१ ॥
तथैव वातपायन्त्रो दिक्प्रदर्शकध्वजस्तथा ।
पश्चाच्छकुनयन्त्रञ्च तत्पक्षद्वयमेव च ॥ ४२ ॥
विमानोत्क्षेपणार्य तत्पुच्छभागस्तथैव हि ।
ततो विमानसञ्चारकारणोष्ण्यकयन्त्रक ॥ ४३ ॥
किरणाकर्षणमणिैरित्यष्टाविंशति क्रमात् ।
अङ्गान्यक्तानि शकुनविमानस्य यथाक्रमम् ॥ ४४ ॥
प्रथम पीठ भूमिका—नीचे का ढांचा फिर नालस्तम्भ, पश्चात् यथाक्रम तीन कीलचक्र छिद्र-
सहित, चार औष्ण्यकयन्त्र कदाचित् ऐन्जिन, वातनाल, फिर जलावरणनाल, पुन तैलपात्र, वातपाचक
तन्त्रीनाल —वायु को गरम करने वाला तारों का नाल, चुल्ली—अगीठी (हीटर), विद्युद्यन्त्र, वातचोदना-
यन्त्र—वायु को फेंकने वाला यन्त्र, दिशाप्रदर्शक ध्वजा, शकुनयन्त्र उस विमान के दो पंख, विमान के
ऊपर उठाने को पुच्छभाग, विमान गति का कारण औष्ण्यक यन्त्र—एञ्जिन, किरणों का आकर्षण करने
वाली मणि । ये अठाईस २८ शकुनविमान के अङ्ग यथाक्रम कहे हैं ॥ ३९-४४ ॥
अथ यानरचनाविधिरुच्यते—अब विमानयान रचना की विधि कही जानी है—
पट्टिकायन्त्रतो लोहं समीकृत्य यथाविधि ।
चतुरश्रं वर्तुलं वा दो*लाकारमथापि वा ॥ ४५ ॥
विमानाकारो†भारस्तु भारवाणां शत यदि ।
कुर्यात् पीठं विमानस्य तदर्धेन यथाविधि ॥ ४६ ॥
यानमानानुसारेण पीठमेव प्रकल्पयेत् ।
तन्मध्ये स्थापयेन्नालस्तम्भमावर्तकीलकं ॥ ४७ ॥
पट्टिकायन्त्र से लोहे को यथाविधि एकसा करके—बराबर करके चतुष्कोण—चौकोण या गोल
या दोला के आकारवाला—लम्बा गोलाकार झूलनासा विमानाकार हो भार तो भारवों—भारवालों—भार ले
- दोला ( हस्तलेखे )
† विमानकारभारस्तु ( हस्तलेखे )
शकुनविमान ] [ २४३
जाने वालों (विमानों) का शतांश हो इस प्रकार विमान का पीठभाग बनावे, विमानयान के ऊंचाई के
माप के आधे माप से पीठ बनावे, उसके मध्य में नालस्तम्भ को घूमनेवाली कीलों के साथ स्थापित
करे ॥ ४५-४७ ॥
नालस्तम्भलक्षणं लल्लेनोक्तम्-नालस्तम्भलक्षण लल्ल आचार्य ने कहा है-
लल्लोक्त यथा शास्त्रे यन्त्रकल्पतरी क्रमात् ।
तदेवात्र प्रवक्ष्यामि नालस्तम्भस्य लक्षणम् ॥ ४८ ॥
हाटकास्येन लोहेन नालस्तम्भ प्रकल्पयेत् ।
न कुर्यादन्यलोहेन कृतञ्चेन्नाशमेष्यते ॥ ४६ ॥
लल्ल आचार्य ने यन्त्रकल्पतरु शास्त्र में जैसे क्रम से कहा है वह ही यहां नालस्तम्भ का
लक्षण कहूंगा। हाटकास्य लोहे से नालस्तम्भ बनाना चाहिए अन्य से किया तो नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ४८-४६ ॥
हाटकास्यलोहमुक्तं लोहतन्त्रे-हाटकास्य लोहा कहा है लोहतन्त्र में-
सुवर्चलस्याष्टमभागान् लघुश्विद्स्य षोडश ।
लघुबम्भारिकस्याष्टादशभागान् रवेस्तथा ॥ ५० ॥
शतभागान् सुसंयोज्य मूषाया सन्निवेश्य च ।
कूर्भव्यासटिकामध्ये संस्थाप्य सुदृढ यथा ॥ ५१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्कक्ष्यप्रमाणेिन वेगत ।
महोर्मिभस्त्रिकात्सभ्यक् तःनेत्रोन्मीलनावधि ॥ ५२ ॥
गालयेद् विधिवत् पश्चाद्धाटकास्य भविष्यति । इत्यादि ॥
सुवर्चल-सज्जीक्षार आठ भाग, लघुश्विद्वङ्क हल्का लोहा-जस्ती टीन? सोलह भाग, लघुम्बभारिक?
अठारह भाग, रवि-ताम्बा सौ भाग, इन्हें मिलाकर मूंषिका (कृत्रिम बोतल) में भरकर कूर्भव्यासटिका-कूर्मा-
कार कुण्ड के मध्य में रखकर तीन सौसात दर्जे की उष्णता से वेग से महोर्मिंनामक भस्त्रिक-धोंकनी से
भली भांति नेत्रोन्मीलन अवधि तक गलावे फिर हाटकास्यलोहा हो जावेगा ॥ ५०-५२ ॥
पीठनिय-पीठ-भूमिका-नीचे के ढांचे का निर्णय कहते हैं-
पीठोन्नत्यू वितस्तीनामशीतिरिति वर्णितम् ।
षट्पञ्चाशद्वितस्तीनामायाम च तथैव हि ॥ ५३ ॥
बितस्तिसप्तत्योंन्नतय दक्षिणोत्तरभागयो ।
ह्रस्वो भूत्वान्त्यभागे तु त्रिकोणाकारसयुतम् ॥५४॥
शकुनाख्यविमानस्य पीठाकारमितीरितम् ॥ ५५ ॥
पीठ की ऊंचाई अस्सी बालिशत कही, छप्पन बालिशत लम्बाई चौडाई, दक्षिण और उत्तर
भागों में ऊंचाई सत्तर बालिशत, अन्तवाले भाग में छोटा होकर त्रिकोण आकारयुक्त पीठ का आकार
शकुनविमान का कहा है ॥ ५३-५५ ॥
२४४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथनालस्तम्भनिर्णयः- अब नालस्तम्भ का निर्णय कहते हैं—
स्तम्भमूलं वितस्तीनां पञ्चत्रिंशदितीरितम् ।
प्रदक्षिणावृतोत्प्रत्यवर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५६ ॥
अन्तर्वलयमानन्तु त्रिंशद्वितस्तय क्रमात् ।
स्तम्भमध्यप्रमाणं तु वर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५७ ॥
वर्णित शास्त्रत सम्यक् पञ्चविंशद्वितस्तय ।
तदन्तर्वलयाकारो वितस्तीना हि विंशति ॥ ५८ ॥
स्तम्भान्त्यस्य बहिर्गात्रो वर्तुंलाकारत क्रमात् ।
विंशद्वितस्तय प्रोक्ता ( ? ) तदन्तर्वलयाकृति ॥ ५६ ॥
वितस्तीना पञ्चदशेत्युक्त शास्त्रे मनीषिभि ।
एव प्रमाणतोशीतिवितस्त्योन्नतयत क्रमात् ॥ ६० ॥
नालस्तम्भो राजलोहात्कारयेद् यानकर्मणि ।
तन्मूले पञ्चदशाङ्गुलप्रमाणावधिक्रमात् ॥ ६१ ॥
पीठे स्तम्भप्रतिष्ठार्थ कुर्यादावर्तनीलकम् ।
कर्तुं न्यूनाधिक वायुवेग कालोचित यथा ॥ ६२ ॥
स्तम्भान्तरे दृढ चक्रषट्क संस्थापयेत् क्रमात् ।
पीठ के मध्य जो नालस्तम्भ लगता है उसका मूल—नीचलाभाग ३५ वालिश्त कहा है, घूम के
साथ उठकर बाहिर से गोल हो । पीठ के अन्दर गोलाई में ३३ वालिश्त रहे स्तम्भ के बीच का प्रमाण
तो बाहिर गोलाकार २५ वालिश्त शास्त्र से वर्णित किया है, उसके अन्दर वलयाकार २० बालिश्र्त स्तम्भ
का अन्त्य-सिरा हो बाहिरी अङ्ग गोल हो । उसके अन्दर २० बालिश्त फिर उसके अन्दर अन्य भाग
१५ बालिरत शास्त्र में मनीषियों ने कहा है, इस प्रकार प्रमाण से पाच भागों की ८० वालिश्त ऊंचाई
होनी चाहिए । नालस्तम्भ राजलोहे से करावे विमानयानकर्म में, उसके मूल में १५ अंगुल स्तम्भ के
प्रतिष्ठार्थ घूमनेवाली कील पीठ में करे अथवा वायुवेग समय के अनुसार न्यूनाधिक करे । स्तम्भ के
अन्दर छः दृढ चक्र क्रम से स्थापित करे ॥५६-६२॥
चक्रनिर्णय. — चक्र का निर्णय कहते हैं—
पीठाच्चतुर्थवितस्तीनामूर्ध्वं स्तम्भान्तरे क्रमात् ॥६३॥
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रयं सन्धारयेत् क्रमात् ।
चक्रावर्त वितस्तीना सार्धपञ्चदश स्मृतम् ॥६४॥
पीठाच्चतुश्चत्वारिंशद्वितस्त्योर्ध्वे तथैव हि ।
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रय सम्यक् प्रतिष्ठितम् ॥६५॥
एतेषूर्ध्वाधस्यचक्रद्वय दृढमचञ्चलम् ।
यथा भवेत् तथा सम्यग्बध्नीयाच्छङ्कुभि क्रमात् ॥६६॥
शकुनविमान ] [ २४५
कालानुसारतो मध्यचक्रसम्भ्रमणाय हि ।
नालस्तम्भस्य बाह्ये कीलकास्सम्यक् प्रतिष्ठिता. ।।६७।।
चक्रेषु रन्ध्रस्थितत्वादचलत्वाद् द्विचक्रयोः ।
मध्यचक्रभ्रमात् सम्यक्चक्रत्रयसमूह्त ।।६८।।
वायुसञ्चरणार्थाय सम्यक् मार्गं कृतं भवेत् ।
एतेन वायुसञ्चारस्तिरोधानोप्यथाक्रमम् ।।६६।।
अनुलोमाद्विलोमाच्च बाह्यकीलकचालनात् ।
भवेत्कालानुसारेण सप्रमाणं यथाविधि ।।७०।।
पीठ से चार बालिश्त ऊपर स्तम्भ में कम से छिद्रसहित गोलाकार तीन चक्र लगादे,
चक्रों का घेरा साढे पन्द्रह बालिश्त हो । उसी प्रकार पीठ से ४४ बालिश्त ऊपर छिद्रसहित गोलाकार
तीन चक्र प्रतिष्ठित हों इनमें ऊपर नीचे दो अचल चक्र हों इस प्रकार उन्हें शंकुओं से बान्धे, कालानुसार
मध्यचक्र के घूमने के लिये नालस्तम्भ के बाहिर कीलें लगावे, चक्रों में छिद्र होने से और दो चक्रों के
अचल होने से मध्यचक्र के घूमने से तीनों चक्रों के समूह—तीनों के होने से वायु सञ्चार के लिये
सम्यक् मार्ग हो जाता है इस वायु का सञ्चार और उसका तिरोधान — बन्द हो जाना समयानुसार यथा-
विधि क्रम से कील के सीधा उल्टा चलाने से हो जाता है — होता रहेगा ।।६३-७०।।
गवाक्षशिखरनिर्णय —गवाक्ष शिखर का निर्णय—
बाह्यावृत्त गोपुरस्य सार्धपञ्चदशक्रमात् ।
वितस्तिप्रमाणमिति शास्त्रे प्रोक्तं महर्षिभि ।।७१।।
तदन्तर्वलयं पञ्चवितस्तय इतीरितम् ।
वितस्तिद्वयमोन्नत्यं सु दृढं च मनोहरम् ।।७२।।
गवाक्षशिखरं सम्यग् नालस्तम्भोपरि न्यसेत् ।
गोपुर-सूर्यकिरण द्वार का बाहरी घेरा साढ़े पन्द्रह बालिश्त माप का शास्त्रों से महर्षियों ने
कहा है उसके अन्दर का घेरा पांच बालिश्त कहा है दो बालिश्त उठाव आडेपन का सुन्दर गवाक्षशिखर-
झरोके की ऊंचाई नालस्तम्भ के ऊपर रखे ।
अथ रविचुम्बकमणिनिर्णयः —अब सूर्यकान्तमणि का निर्णय—
प्रदक्षिणावृत्तस्सप्तवितस्तिस्स्यान्मणेस्तथा ।।७३।।
वितस्तिद्वयमायामं वितस्तिद्वयगात्रकम् ।
आदित्यचुम्बकमणि शिखरस्योपरि न्यसेत् ।।७४।।
सूर्यकान्तमणि का घेरा ७ बालिश्त दो बालिश्त लम्बा चौड़ा दो बालिश्त मोटाईवाला हो
उस सूर्यचुम्बकमणि को गवाक्ष की चोटी पर रखे — ऊपरिभाग पर रखे जडवे ।
चतुरौष्मिकयन्त्राणि —चार औष्मिकयन्त्र—
पीठस्योपरिभागे तु वितस्तीनां चतुर्दश ।
२४६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततस्त्रयङ्गुलमानेन सौधत्रयं मनोहरम् ॥७५॥
वितस्तीना दशोन्नत्ये गात्रे त्र्यङ्गुलसंयुतम् ।
एतदाकारसंयुक्तं स्तम्भोपरि यथाविधि ॥७६॥
संस्थापितं कीलशङ्कुबन्धनात्सुदृढं यथा ।
प्रतिस्तम्भान्तरायस्तु वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥७७॥
प्रतिस्तम्भाग्रभागान्ते चक्रावर्तप्रकल्पनात् ।
परस्परं मिलित्वाथान्योन्यं सम्परिगृह्यते ॥७८॥
एतत्पीठे चतुर्दिक्षु तत्तत्केन्द्रोपरि क्रमात् ।
वितस्तिदशकायामं विस्थ्यष्टोन्नत्यं तथा ॥७९॥
सुदृढं स्थापयेत् सम्यगौष्म्ययन्त्रचतुष्टयम् ।
यन्त्रप्रदक्षिणावृत्तो वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥८०॥
पीठ के ऊपरिभाग पर तीन सुन्दर भवन १४ बालिश्त और ३ अंगुल माप प्रसार से तथा
१० बालिश्त ऊंचाई में और ३ अंगुल मोटाई में बनावे । इस आकार से युक्त स्तम्भ के ऊपर यथा-
विधि संस्थापित कील शंकुबन्धनों से सुदृढ करे, स्तम्भ की दूरी १० बालिश्त कही है। स्तम्भ के अग्रभाग
के अन्त में चक्र आवर्त—घेर बनाने से परस्पर मिलकर एक दूसरेसे संयुक्त किया जाता है। यह पीठ में
चारों दिशाओं में उस उस केन्द्र के ऊपर क्रम से १० बालिश्त लम्बाई ८ बालिश्त ऊंचाई पर सुदृढ चार
औष्म्य यन्त्र (एजिन) हों, औष्म्ययन्त्र का घेरा १० बालिश्त कहा गया है—॥७५-८०॥
वितस्त्यष्टकमोन्नत्यमिति शास्त्रविनिर्णयं ।
एतन्मध्यस्थितस्तम्भपंक्तिमार्गानुसारतः ॥८१॥
व्योमयानं प्रयात्तॄणामुपवेष्टुं यथाविधि ।
गृहान् प्रकल्पयेच्छिल्पशास्त्रीत्या पृथक् पृथक् ॥८२॥
एवमुक्त्वा प्रथमसौधप्रदेशे गृहकल्पनाम् ।
विमानस्याङ्गयन्त्राणां स्थापनार्थमतः परम् ॥८३॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त्वा तस्मिन् यथाविधि ।
स्तम्भपंक्त्यनुसारेण गृहान् सम्यक् पृथक् पृथक् ॥८४॥
अङ्गयन्त्रप्रमाणानुसारतः परिकल्पयेत् ।
अथैकैकगृहे सिद्धान्यङ्गयन्त्राण्यथाविधि ॥८५॥
एकैकं स्थापयेत्सम्यग्दृढं कीलैः पृथक् पृथक् ।
वितस्तीनां षष्टितमोन्नत्यमुक्तं तथैव हि ॥८६॥
और ऊंचाई ८ बालिश्त हो यह शास्त्र का निर्णय है। इसके मध्य में स्थित स्तम्भपंक्तिमार्ग
के अनुसार व्योमयान के यात्रियों के बैठने को यथाविधि घर—शास्त्ररीति से पृथक् पृथक् बनावे ।
इस प्रकार प्रथम सौध-महल घेरे प्रदेश में गृह(कम्पार्टमेण्ट) बनाना। विमानके अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ
शकुनविमान ] [ २४७
दूसरे सौध-महल घेरे में यथाविधि कहकर स्तम्भपंक्ति के अनुसार घरों को पृथक् पृथक् अंगयन्त्रों के
प्रमाणानुसार बनावे, एक एक घर में. सिद्ध अंगयन्त्रों को यथाविधि एक एक को कीलों से स्थापित करे,
६० बालिशत ऊंचाई कही है—॥८१-८६॥
वितस्तिषोडशायाममूर्ध्वोन्नत्यमत परम् ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव च ॥८७॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त (खलु?) महर्षिभि ।
चत्वारिंशद्वितस्तिप्रमाणमुन्नतमद्भुतम् ॥८८॥
वितस्त्यष्टमायाम तदूर्ध्वोन्नत्यक तथा ।
चतुर्दशवितस्त्योपर्यंगुलत्रयमेव हि ॥८९॥
तृतीयसौधप्रमाणमेव शास्त्रेण वर्णितम् ।
अङ्गयन्त्रस्थापनार्थं तत्रत्यस्तम्भपंक्तिभि ॥६०॥
जनोपवेशनार्थं च गृहान् सम्यक् प्रकल्पयेत् ।
पीठात् श्यावरणान्त च तदारभ्य पुन क्रमात् ॥६१॥
नालस्तम्भान्तपर्यन्तं चतुर्दिक्षु पृथक् पृथक् ।
रज्वाकाराद् रन्ध्रनालादेकैकस्य परस्परम् ॥६२॥
विना बन्ध योजित स्यात् सुदृढ क्रमात् ।
पीठावरणतस्तद्वत्साधं सप्तवितस्तनचध ॥६३॥
यावतीठप्रमाण स्यात् तावदेव यथाविधि ।
एकमावरण कुर्यात्सुदृढं सुमनोहरम् ॥६४॥
१६ बालिशत लम्बा ऊपर उन्नत हुआ १४ बालिशत ३ अंगुल अधिक दूसरे सौध—महल का
प्रमाण महर्षियों ने कहा है । ४० बालिशत प्रमाण का उन्नत ८ बालिशत लम्बा उससे ऊपर, १४ बालिशत
३ अंगुल तीसरा सौध—महल का प्रमाण शास्त्र में कहा है । अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ वहां की स्तम्भ-
पंक्तियों से तथा मनुष्यों के बैठने के लिये घर सम्यक् बनावे । पीठ से आवरणपर्यन्त और पुन आवरण
से आरम्भ करके चारों दिशाओं में नालस्तम्भपर्यन्त रस्सी के आकार छिद्रवाली नाल से एक एक का
परस्पर विनाबन्धन के स्थान सुदृढयुक्त किया हो । पीठावरण से साढेसात बालिशत नीचे पीठ के माप का
एक आवरण मनोहर करे ।
यानोपयुक्तयन्त्राण्ये तस्मिन् संरचितानि हि ।
तन्मध्यकेन्द्रनालस्तम्भमूलोस्ति दृढ यथा ॥६५॥
एतन्नालस्तम्भमूले चतुर्दिक्षु यथाक्रमम् ।
वाताकर्षणयन्त्राणि चत्वारि स्थापितानि हि ॥६६॥
तत्प्रेरणकारिणि चत्वारि रौष्ण्ययन्त्राण्यपि क्रमात् ।
पश्चाद्भागे विमानस्य पूर्वभागेऽपि च स्थिते ॥६७॥
२४८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
वातापकर्षणयन्त्रद्वयमध्यस्थकेन्द्रके ।
वातपाचकयन्त्रं च सुदृढं स्थापितं भवेत् ॥९८॥
एतद्यन्त्रमुखे वातपाचनार्थं यथाविधि ।
बाह्यवायुं पूरयितुं पृथग्यन्त्रद्वयं क्रमात् ॥९९॥
यानस्य पूर्वपश्चाद्भागयोस्सम्यक् प्रतिष्ठितम् ।
विमानोभयपार्श्वस्थपक्षयोरुभयोरपि ॥१००॥
प्रसारणाघात*क्रियासिद्धयर्थं च तथैव हि ।
तिर्यङ्न्यग्गुलरूपेणोपसंहारार्थं शास्त्रतः ॥ १०१ ॥
स्वानुकूलं यथा तत्र कीलकास्स्थापितास्तथा ।
विमानस्य पुरोभागस्थितपङ्कभ्रमाय हि ॥ १०२ ॥
शलाका नालमध्यस्था योजिताश्चौष्ण्ययन्त्रके ।
विमानयान के उपर्युक्त यन्त्र इसमें रचे हैं उसके मध्यकेन्द्र में नालस्तम्भ मूल दृढ करे, इस
नालस्तम्भ मूल में चारों दिशाओं में यथाक्रम चार वाताकर्षण यन्त्र—वायु का आकर्षण करने वाले यन्त्र
स्थापित हों, उनके प्रेरक चार औष्ण्य यन्त्र ताप देने वाले यन्त्र ( ऐंञ्जिन ) भी रखे हों। विमान के
पिछले भाग और पूर्व भाग में दोनों यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में वातापकर्षण यन्त्र—वात को फेंकने वाले यन्त्र
हों और वातपाचक यन्त्र भी सुदृढ लगावे। इस यन्त्रमुख में यथाविधि वातपाचनार्थ बाह्य वायु को अन्दर
भरने को क्रम से पृथक दो यन्त्र होने चाहिएं वे विमान यान के पूर्व पश्चात् के भागों में ठीक रखे हों।
विमान के दोनों पाश्र्वों में स्थित पंखों को प्रसारण के आघात या प्रसारण और आधानक्रिया सिद्धि के
लिए तिर्यक्—तिरछा नीचे समेटनेरूप से उपसंहार के लिये भी शास्त्र से अनुकूल कीलें वहां लगानी
चाहिएं। विमान के सम्मुख भाग स्थित वातव्यक्तीकरण चक्र† भ्रमण के लिए औष्ण्यक यन्त्र ( ऐञ्जिन )
में शलाकाएं नाल के मध्य में युक्त हों ॥ ९५–१०२ ॥
अथ पक्षनिर्णयः—अब पंखों का निर्णय करते हैं—
विंशद्वितस्त्युन्नत तदायामोऽष्टवितस्तिकः ॥ १०३ ॥
गात्रे सार्धवितस्तीति निश्चितं पक्षमूलयोः ।
तन्मूलो कीलके सम्यक् सुदृढ योजित क्रमात् ॥ १०४ ॥
पक्षयो पञ्चिमभागे रेखावत्परिदृश्यते ।
तत्पुरोभागविस्तारो वितस्तिदशकं भवेत् ॥ १०५ ॥
पश्चाद्भागस्य विस्तारो चत्वारिंशद्वितस्तयः ।
पक्षोन्नत्य वितस्तीनां भवेत् षष्टितम क्रमात् ॥ १०६ ॥
एतदाकारसंयुक्तं पक्षद्वयमितीरितम् ।
- घात ( हस्तलेपे )
† पचि व्यक्तीकरणे ( भ्वादि० )
शकुनविमान ] [ २४६
उसकी ऊंचाई लम्बाई २० बालिश्त ८ बालिश्त चौड़ाई पंखों के मूल में डेढ़ बालिश्त मोटा,
उनके अपने मूल कील में दृढ युक्त हों । पंखों के पिछले भाग में रेखा की भांति दिखलाई पड़ता है,
उसके सामने के भाग का विस्तार १० बालिश्त हो पिछले भाग का विस्तार लम्बाई ४० बालिश्त पंखों का
उन्नतिपथ ६० बालिश्त हो । इस आकार के दो पंख हों ॥ १०३-१०६ ॥
अथ पुच्छप्रमाणम्—अब पुच्छ का प्रमाण कहते हैं—
पुच्छोन्नतय वितस्तीना विशतिस्स्यात्तथैव हि । १०७ ॥
तत्पुरोभागविस्तारस्सार्धत्रयवितस्तिकः ।
तत्पश्चाद्भागविस्तारो वितस्तीनो तु विशति ॥ १०८ ॥
एतत्पुच्छाकारमिति प्रवदन्ति मनीषिण ।
पुच्छ का ऊपर उठाव २० बालिश्त, सामने वाले भाग की मोटाई साढे तीन बालिश्त उसके
पिछले भाग की लम्बाई २० बालिश्त यह पुच्छ का आकार मनीषी कहते हैं ॥ १०७-१०८ ॥
वाताकर्षक यन्त्रं तदौष्ण्यक यन्त्रं च—बाताकर्षक यन्त्र और उसका औष्ण्यक यन्त्र भी—
यन्त्रोन्नतय वितस्तीनामुक्त पञ्चदश क्रमात् ॥ १०६ ॥
वितस्तित्रयमायाममिति शास्त्रे निरूपितम् ।
यन्त्र की ऊंचाई १५ बालिश्त मोटाई ३ बालिश्त शास्त्र में कही है । १०६ ॥
नालप्रमाणम्—नाल का प्रमाण—
वितस्तित्रयमोन्नतय तन्नालाना तथैव हि ॥ ११० ॥
बाह्यावृत्त वितस्तीना चत्वारीति विनिर्णितम् ।
एतद् यन्त्रशलाकाश्च कीलकाद्यास्तथैव हि ॥ १११ ॥
कृतास्तदनुसारेण शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
इसी प्रकार उनके नालों की ऊंचाई मोटाई तीन बालिश्त हो, बाहिरी आवृत्त—मूठ की मोटाई
चार बालिश्त हो ऐसे ही यन्त्र की शलाकाए कील आदि भी अपने माप के अनुसार शास्त्र में कहे मार्ग
से हों ॥ ११०-१११ ॥
अथ बातपायन्त्रनिर्णय —अब वातपा-वायुरक्षकयन्त्र का निर्णय—
वितस्तिद्वादशोन्नतय वर्तुलावरण तथा ॥ ११२ ॥
वितस्तिसार्धनवकप्रमाणेनाभिवर्णितम् ।
इत्युक्त वातपायन्त्रप्रमाण शास्त्रत क्रमात् ॥ ११३ ॥
अन्त प्रदक्षिणावृत्ततन्त्रिभि परिवेष्टितम् ।
एतदन्तर्मुखे नालमेक सन्धारितं भवेत् ॥ ११४ ॥
आवृत्ततन्त्रीनालेनवर्तिसञ्चारतस्तथा ।
तद्बहि पक्वतेलस्य ज्वालसन्धारवेगत ॥ ११५ ॥
१० बालिश्त उठा हुआ गोल आवरण भी साढ़े नौ बालिश्त प्रमाण से कढ़ा है। शास्त्र से
वातपा यन्त्र का प्रमाण कह दिया है। अन्दर घूमने वाले तारों से लपेटा हुआ हो उसके भीतरी मुख में
एक नाल लगाई हो। घूमने वाले तारों के नाल में अन्दर बातसञ्चार होगा, उसके बाहिर गरम तैल ज्वलन-
शक्ति वेग से--॥ ११२-११५ ॥
भवेत्सन्तापितो वायुश्शतकक्ष्यप्रमाणात. ।
एतत्सन्तापित वायुमोष्म्ययन्त्रे नियोजितुम् ॥ ११६ ॥
बाह्यस्यशीतवायोराकर्षणाय तदन्तरे ।
नालाश्च कीलका एतद्यन्त्रे सन्धारिता क्रमात् ॥ ११७ ॥
तैलज्वालासमुत्पन्नधूम वेगान्मुहुर्मुहुः ।
बाह्ये' नियोजितु यन्त्रात्स्तम्भमूलावधि क्रमात् ॥ ११८ ॥
षडङ्गुलगात्रनाला यन्त्रेऽस्मिन् सम्प्रतिष्ठिताः ।
बाह्यस्थ पूर्वोक्तशीतवायु यन्त्रान्तरे क्रमात् ॥ ११९ ॥
नियोजितुं पुनर्वातयन्त्रा
शकुनविमान ] [ २५१
प्रयाणकाले सर्वत्र सहायो भवति ध्रुवम् ॥ १२६ ॥
तथैव व्योमयानस्य पार्श्वयोरुभयोरपि ।
न्यग्गुलीकरणार्थाय पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२७ ॥
पक्षाघातककीलेपि कर्तुं स्याद् रज्जुबन्धनम् ।
एतद्रज्ज्वाकर्षणेन पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२८ ॥
विस्तृतत्वं च न्यग्भाव क्रमाद् भवति नान्यथा ।
प्रथमावरणादस्ति वितस्तिदशकादध ॥ १२६ ॥
सार्धद्वयबितस्त्यूर्ध्वोन्नत्यमात्र मनोहरम् ।
अन्यदावरण पीठात् किञ्चिन्न्यून प्रमाणतः ॥ १३० ॥
वातनालस्तम्भमूलमेकस्मिन् शास्त्रतो दृढम् ।
प्रदक्षिणावृत्तभागात्सम्यक संयोजित भवेत् ॥ १३१ ॥
वातपा चक्र यन्त्र के पूर्व भाग में यथाविधि तैलप्रज्वलन के लिए दीपचुल्ली लगी हो, उसमें
दीप प्रतिष्ठार्थ अग्नि की उत्पत्ति के निमित्त ही कीलों से विद्युद्यन्त्र दृढ स्थापित हो । इससे समयानुसार
अग्नि जल जावे, दीप के उपसंहार समय—बुझाने के समय तैल संरक्षण के लिए एक कील यथाविधि
लगी हो । पुच्छ के भीतरी प्रवेश के सिरे पर करने को रज्जुबन्धन हो, यन्त्रनियन्ता चालक द्वारा रज्जु के
खींचने से बार वार निरन्तर पुच्छ वेग से ऊपर नीचेवाले भागों में घूमती है इससे विमान के आरोहण—
ऊपर उठने वैसे ही अवरोहण—नीचे आने और प्रयाणकाल—उड़ते हुए सर्वत्र सहायक होता है । ऐसे
ही व्योमयान के दोनों पंखों को क्रम से नीचे ऊपर झुकाने को पंखों को आघात करने—प्रेरित करने
वाली कील में रज्जुबन्धन हो । इस डोरी के खींचने से दोनों पंखों का विस्तार गमन—अपगमन ऊर्ध्व-
गमन और पश्चाद् गमन नीचे गमन क्रम से होता है । प्रथम आवरण से १० बालिश्त नीचे तथा पीठ से
अढाई बालिश्त उठा हुआ अन्य आवरण हो, कुछ न्यून वातनाल मूल एक में घूमने वाले भाग से भली
प्रकार लगी हो—फिट हो ॥ १२१-१३१ ॥
तैलपात्रनिर्णयः—तैलपात्र का निर्णय करते हैं—
एतस्मिन्नेव विधिवज्जलावरणसयुतम् ।
बितस्तीना सार्धनवप्रमाणोन्नत्यक तथा ॥ १३२ ॥
चतुर्वितस्त्यावृत्त चायामे नववितस्तय ।
षडङ्गुल तदुपरिप्रमाणोनाभिर्वर्णिताम् ॥ १३३ ॥
वितस्तीनां पञ्चदशविस्तृताकारसयुतम् ।
तैलपात्रद्वय सम्यक् स्थापित सुदृढ यथा ॥ १३४ ॥
इसी मे विधिवत् जलावरण से युक्त साढे नौ बालिश्त ऊंचाई में तथा चार बालिश्त घेरेवाला
या गोलाई में और नव बालिश्त छः अङ्गुल विस्तार में नाभि कही है पन्द्रह बालिश्त विस्तृत आकारवाला
लम्बे दो तैलपात्र सुदृढ सम्यक् स्थापित करे ॥ १३२—१३४ ॥
२५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ वातनालनिर्णयः—अब वातनाल का निर्णय दर्शाते हैं—
वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणोन्नत्यसम्मितम् ।
वितस्तिद्वयगात्र च वर्णितं तदनन्तरम् ॥ १३५ ॥
सार्धषट्कवितस्तीना विस्तार सुमनोहरम् ।
वाताकर्षणभस्त्राणां चतुष्टयमुदाहृतम् ॥ १३६ ॥
वाताकर्षणयन्त्रैस्सम्भूतवायु यथाविधि ।
एतस्मिन् सन्नियोज्याथ यावदिच्छानुसारत ॥ १३७ ॥
बाह्ये प्रेरयितु नाल कीलक च सुशोधितम् ।
सन्धारित भवेदस्मिन् शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ॥ १३८ ॥
एतदावरणाधस्ताच्चतुर्दिक्षु यथाविधि ।
वितस्तिसप्तवलयाकाराणि सुदृढान्यपि ॥ १३६ ॥
चक्राणि भूसञ्चारयोग्यानि सन्धारितानि हि ।
एव शकुनयन्त्रस्य रचनाविधिरिरीतम् ॥ १४० ॥
१५ बालिश्त प्रमाण ऊंचाई-ऊंची लम्बाई २ बालिश्त मोटाई कहा है, साढे छः बालिश्त
विस्तार वात को खींचने वाले चार भस्त्राओं को कहा है, वाताकर्षण यन्त्रों से प्रकट या संगृहीत वायु को
यथाविधि इसमें जितनी इच्छा हो उतनी बाहिर फेंकने को नाल और कील भी इस में शास्त्रोक्त मार्ग
से ठीक शोधित लगाई गई हो इस आवरण की चारों दिशाओं में यथाविधि ७ बालिश्त गोल आकार
वाले सुदृढ चक्र भूमि में सञ्चार करने योग्य लगाए हों, इस प्रकार शकुनयन्त्र—शकुनविमान की
रचनाविधि कही है ॥ १३५–१४० ॥
हस्तलेख कापी संख्या १८—
सुन्दरोथ ॥ अ० ३, सू० ६ ॥ १
एवमुक्त्वा शकुनविमान शास्त्रानुसारतः ।
अथेदानो सुन्दरविमान सम्यक् प्रचक्षते ॥ १ ॥
यानप्रबोधकपदद्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् याननाम सम्यक् प्रकाशितम् ॥ २ ॥
श्रानन्तर्यवाची स्याद् द्वितीयपदमत्र (हि) तु ।
एव पदद्वयस्यार्थस्सामान्येन निरूपितः ॥ ३ ॥
इदानी तद्विशेषार्थं सग्रहेण प्रचक्षते ।
अष्टाङ्गान्यस्य शास्त्रेस्मिन्निर्णितानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
तेषा स्वरूप विधिवद् विचार्याथ पृथक् पृथक् ।
विलिख्यते यथाशास्त्र सग्रहेण यथामति ॥ ५ ॥
आदौ पीठस्ततो धूमनालस्तम्भस्तथैव हि ।
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रपञ्चक च तत परम् ॥ ६ ॥
भुज्युलोहकनालश्च ततो वातप्रसारणम् ।
विद्युद्यन्त्र ततो धातुर्मुखोष्मकमत परम् ॥ ७ ॥
विमाननिर्णयश्चैतान्यष्टाङ्गानि भवन्ति हि ।
तेष्वादौ यानपीठस्य रचनाविधिरुच्यते ॥ ८ ॥
इस प्रकार शकुनविमान शास्त्रानुसार कहकर अब सुन्दरविमान कहते हैं । यान के प्रबोध
करानेवाले दो पद यहा निरूपित किए हैं, उनमें आदि पद से विमान यान का नाम सम्यक् प्रकाशित
किया है द्वितीय पद अनन्तर अर्थ का वाचक यहां है । इस प्रकार दोनों पदों का सामान्य अर्थ निरूपित
कर दिया । अब संक्षेप से इसका विशेष अर्थ कहते हैं । इस शास्त्र में इसके आठ अङ्ग निश्चित किए
हैं इनका विधिवत् स्वरूप विचार कर यथाशास्त्र संक्षेप से पृथक् पृथक् लिखा जाता है । प्रथम पीठ फिर
धूमनालस्तम्भ पश्चात् पांच धूमोद्गमयन्त्र, भुज्य लोहे की नाल, फिर वातप्रसारण फिर विद्युद्यन्त्र पश्चात्
धातुर्मुखोष्मक यन्त्र । ये आठ अङ्ग विमाननिर्णय प्रसङ्ग में हैं जिनमें आदि में विमानयान के पीठ की
रचनाविधि कही जाती है ॥ १-८ ॥