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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 269

२४६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
ततस्त्रयङ्गुलमानेन सौधत्रयं मनोहरम् ॥७५॥
वितस्तीना दशोन्नत्ये गात्रे त्र्यङ्गुलसंयुतम् ।
एतदाकारसंयुक्तं स्तम्भोपरि यथाविधि ॥७६॥
संस्थापितं कीलशङ्कुबन्धनात्सुदृढं यथा ।
प्रतिस्तम्भान्तरायस्तु वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥७७॥
प्रतिस्तम्भाग्रभागान्ते चक्रावर्तप्रकल्पनात् ।
परस्परं मिलित्वाथान्योन्यं सम्परिगृह्यते ॥७८॥
एतत्पीठे चतुर्दिक्षु तत्तत्केन्द्रोपरि क्रमात् ।
वितस्तिदशकायामं विस्थ्यष्टोन्नत्यं तथा ॥७९॥
सुदृढं स्थापयेत् सम्यगौष्म्ययन्त्रचतुष्टयम् ।
यन्त्रप्रदक्षिणावृत्तो वितस्तिदशकं स्मृतम् ॥८०॥
पीठ के ऊपरिभाग पर तीन सुन्दर भवन १४ बालिश्त और ३ अंगुल माप प्रसार से तथा
१० बालिश्त ऊंचाई में और ३ अंगुल मोटाई में बनावे । इस आकार से युक्त स्तम्भ के ऊपर यथा-
विधि संस्थापित कील शंकुबन्धनों से सुदृढ करे, स्तम्भ की दूरी १० बालिश्त कही है। स्तम्भ के अग्रभाग
के अन्त में चक्र आवर्त—घेर बनाने से परस्पर मिलकर एक दूसरेसे संयुक्त किया जाता है। यह पीठ में
चारों दिशाओं में उस उस केन्द्र के ऊपर क्रम से १० बालिश्त लम्बाई ८ बालिश्त ऊंचाई पर सुदृढ चार
औष्म्य यन्त्र (एजिन) हों, औष्म्ययन्त्र का घेरा १० बालिश्त कहा गया है—॥७५-८०॥
वितस्त्यष्टकमोन्नत्यमिति शास्त्रविनिर्णयं ।
एतन्मध्यस्थितस्तम्भपंक्तिमार्गानुसारतः ॥८१॥
व्योमयानं प्रयात्तॄणामुपवेष्टुं यथाविधि ।
गृहान् प्रकल्पयेच्छिल्पशास्त्रीत्या पृथक् पृथक् ॥८२॥
एवमुक्त्वा प्रथमसौधप्रदेशे गृहकल्पनाम् ।
विमानस्याङ्गयन्त्राणां स्थापनार्थमतः परम् ॥८३॥
द्वितीयसौधप्रमाणमुक्त्वा तस्मिन् यथाविधि ।
स्तम्भपंक्त्यनुसारेण गृहान् सम्यक् पृथक् पृथक् ॥८४॥
अङ्गयन्त्रप्रमाणानुसारतः परिकल्पयेत् ।
अथैकैकगृहे सिद्धान्यङ्गयन्त्राण्यथाविधि ॥८५॥
एकैकं स्थापयेत्सम्यग्दृढं कीलैः पृथक् पृथक् ।
वितस्तीनां षष्टितमोन्नत्यमुक्तं तथैव हि ॥८६॥
और ऊंचाई ८ बालिश्त हो यह शास्त्र का निर्णय है। इसके मध्य में स्थित स्तम्भपंक्तिमार्ग
के अनुसार व्योमयान के यात्रियों के बैठने को यथाविधि घर—शास्त्ररीति से पृथक् पृथक् बनावे ।
इस प्रकार प्रथम सौध-महल घेरे प्रदेश में गृह(कम्पार्टमेण्ट) बनाना। विमानके अंगयन्त्रों के स्थापनार्थ