बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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अथ वातनालनिर्णयः—अब वातनाल का निर्णय दर्शाते हैं—
वितस्तीना पञ्चदशप्रमाणोन्नत्यसम्मितम् ।
वितस्तिद्वयगात्र च वर्णितं तदनन्तरम् ॥ १३५ ॥
सार्धषट्कवितस्तीना विस्तार सुमनोहरम् ।
वाताकर्षणभस्त्राणां चतुष्टयमुदाहृतम् ॥ १३६ ॥
वाताकर्षणयन्त्रैस्सम्भूतवायु यथाविधि ।
एतस्मिन् सन्नियोज्याथ यावदिच्छानुसारत ॥ १३७ ॥
बाह्ये प्रेरयितु नाल कीलक च सुशोधितम् ।
सन्धारित भवेदस्मिन् शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ॥ १३८ ॥
एतदावरणाधस्ताच्चतुर्दिक्षु यथाविधि ।
वितस्तिसप्तवलयाकाराणि सुदृढान्यपि ॥ १३६ ॥
चक्राणि भूसञ्चारयोग्यानि सन्धारितानि हि ।
एव शकुनयन्त्रस्य रचनाविधिरिरीतम् ॥ १४० ॥
१५ बालिश्त प्रमाण ऊंचाई-ऊंची लम्बाई २ बालिश्त मोटाई कहा है, साढे छः बालिश्त
विस्तार वात को खींचने वाले चार भस्त्राओं को कहा है, वाताकर्षण यन्त्रों से प्रकट या संगृहीत वायु को
यथाविधि इसमें जितनी इच्छा हो उतनी बाहिर फेंकने को नाल और कील भी इस में शास्त्रोक्त मार्ग
से ठीक शोधित लगाई गई हो इस आवरण की चारों दिशाओं में यथाविधि ७ बालिश्त गोल आकार
वाले सुदृढ चक्र भूमि में सञ्चार करने योग्य लगाए हों, इस प्रकार शकुनयन्त्र—शकुनविमान की
रचनाविधि कही है ॥ १३५–१४० ॥