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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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शकुनविमान ] [ २४१
कलियुग में कृतकविमान पच्चीस कहे हैं उनके नामों का गौतम के कहे विधान से विवेचन
विधिवत् संक्षेप से करते हैं। शकुन, सुन्दर, रुक्मक, मण्डल, वक्रतुण्ड, भद्रक, रोचक, विराजक, भास्कर,
गज, आवर्त, पौष्कल, विरञ्चिक, नन्दक, कुमुद, मन्दर, हंस, शुकास्य, सौम्यक, क्रौञ्चक, पद्माक, सैंहिक,
पञ्चबाण, और्यायण, पुष्कर, कोदण्ड । ये कृतकविमान पच्चीस हैं ॥ २६-३१ ॥
राजलोहादेतेषामाकाररचना ॥ अ० ३, सू० ५ ॥ १ ?
बो० वृ०
एवमुक्त्वा कृतकयानप्रभेदान्‡ शास्त्रात क्रमात् ।
शकुनादिविमानानामाकाररचनादय ॥ ३२ ॥
अथेदानीं राजलोहादेवेहस्मिन्निरूप्यन्ते(ते?) ॥ ३३ ॥
इस प्रकार कृतकविमानयान के भेदों को शास्त्र से क्रमशः कहकर राजलोहे से शकुन आदि
विमानों के आकाररचना आदि हीं अब इस में निरूपित किए जाते हैं ॥ ३२-३३ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—वह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
कृतकव्योमयानानामाकाररचनाविधौ ।
उक्तेषु सर्वलोहेषूष्मपास्सुप्रशस्तका ॥ ३४ ॥
तेषु राजारख्यलोहोत्र शुकनस्य प्रशस्तक ॥
कृतकव्योमयानों के आकार रचनाविधि में कहे सारे लोहों में उष्मपा प्रशस्त लोहे हैं उनमें
भी राजनामक लोहा यहां शकुनविमान का प्रशस्त है ॥ ३४ ॥
तदुक्तं लोहप्रकरणे—वह कहा है लोहप्रकरण में—
सोमसौण्डालमौर्त्विकलोहवर्गत्रये क्रमात् ।
त्र्यष्टद्विलोहभागान् टङ्कणेन समन्वितान् ॥ ३५ ॥
मूषाया पूरयित्वाग्नौ न्यसेद् व्यासटिकान्तरे ।
द्वासप्तत्युत्तरद्विशतकक्ष्यौष्णप्रमाणत ॥ ३६ ॥
सञ्गालयेत् ततो राजलोहो भवति नान्यथा । इत्यादि ॥
सोम, सौण्डाल, मौर्त्विक तीनों लोहवर्ग-जाति में क्रम से तीन आठ दो लोहभाग मात्राओं
को टङ्कण—सुहागा के साथ मूषा (कृत्रिम बोतल) में भरकर अग्नि में रखदे व्यासटिका कुण्ड के अन्दर
दो सौ बहत्तर कक्ष्य-दर्जे की उष्णता से गलावे फिर वह राजलोहा बन जाता है ॥ ३५-३६ ॥
विश्वम्भरोपि-विश्वम्भर आचार्य ने भी कहा है-
लोहाधिकरणे सम्यग्विमानरचनाविधौ ।
ऊष्मपाप्योऽश प्रोक्ताश्श्रेष्ठाच्छ्रे ⊕ ष्ठतरा इति ॥ ३७ ॥
चतुर्थलोहस्तेषु राजारख्योलोह इतीरित ।
तेनैव कुर्याच्छकुनविमान इति वर्णित ॥ ३८ ॥ इत्यादि ॥
‡ प्रमेदाच्छास्त्रत ( हस्तलेखे ? )