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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

शकुनविमान ] [ २४६
उसकी ऊंचाई लम्बाई २० बालिश्त ८ बालिश्त चौड़ाई पंखों के मूल में डेढ़ बालिश्त मोटा,
उनके अपने मूल कील में दृढ युक्त हों । पंखों के पिछले भाग में रेखा की भांति दिखलाई पड़ता है,
उसके सामने के भाग का विस्तार १० बालिश्त हो पिछले भाग का विस्तार लम्बाई ४० बालिश्त पंखों का
उन्नतिपथ ६० बालिश्त हो । इस आकार के दो पंख हों ॥ १०३-१०६ ॥
अथ पुच्छप्रमाणम्—अब पुच्छ का प्रमाण कहते हैं—
पुच्छोन्नतय वितस्तीना विशतिस्स्यात्तथैव हि । १०७ ॥
तत्पुरोभागविस्तारस्सार्धत्रयवितस्तिकः ।
तत्पश्चाद्भागविस्तारो वितस्तीनो तु विशति ॥ १०८ ॥
एतत्पुच्छाकारमिति प्रवदन्ति मनीषिण ।
पुच्छ का ऊपर उठाव २० बालिश्त, सामने वाले भाग की मोटाई साढे तीन बालिश्त उसके
पिछले भाग की लम्बाई २० बालिश्त यह पुच्छ का आकार मनीषी कहते हैं ॥ १०७-१०८ ॥
वाताकर्षक यन्त्रं तदौष्ण्यक यन्त्रं च—बाताकर्षक यन्त्र और उसका औष्ण्यक यन्त्र भी—
यन्त्रोन्नतय वितस्तीनामुक्त पञ्चदश क्रमात् ॥ १०६ ॥
वितस्तित्रयमायाममिति शास्त्रे निरूपितम् ।
यन्त्र की ऊंचाई १५ बालिश्त मोटाई ३ बालिश्त शास्त्र में कही है । १०६ ॥
नालप्रमाणम्—नाल का प्रमाण—
वितस्तित्रयमोन्नतय तन्नालाना तथैव हि ॥ ११० ॥
बाह्यावृत्त वितस्तीना चत्वारीति विनिर्णितम् ।
एतद् यन्त्रशलाकाश्च कीलकाद्यास्तथैव हि ॥ १११ ॥
कृतास्तदनुसारेण शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
इसी प्रकार उनके नालों की ऊंचाई मोटाई तीन बालिश्त हो, बाहिरी आवृत्त—मूठ की मोटाई
चार बालिश्त हो ऐसे ही यन्त्र की शलाकाए कील आदि भी अपने माप के अनुसार शास्त्र में कहे मार्ग
से हों ॥ ११०-१११ ॥
अथ बातपायन्त्रनिर्णय —अब वातपा-वायुरक्षकयन्त्र का निर्णय—
वितस्तिद्वादशोन्नतय वर्तुलावरण तथा ॥ ११२ ॥
वितस्तिसार्धनवकप्रमाणेनाभिवर्णितम् ।
इत्युक्त वातपायन्त्रप्रमाण शास्त्रत क्रमात् ॥ ११३ ॥
अन्त प्रदक्षिणावृत्ततन्त्रिभि परिवेष्टितम् ।
एतदन्तर्मुखे नालमेक सन्धारितं भवेत् ॥ ११४ ॥
आवृत्ततन्त्रीनालेनवर्तिसञ्चारतस्तथा ।
तद्बहि पक्वतेलस्य ज्वालसन्धारवेगत ॥ ११५ ॥