बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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वातापकर्षणयन्त्रद्वयमध्यस्थकेन्द्रके ।
वातपाचकयन्त्रं च सुदृढं स्थापितं भवेत् ॥९८॥
एतद्यन्त्रमुखे वातपाचनार्थं यथाविधि ।
बाह्यवायुं पूरयितुं पृथग्यन्त्रद्वयं क्रमात् ॥९९॥
यानस्य पूर्वपश्चाद्भागयोस्सम्यक् प्रतिष्ठितम् ।
विमानोभयपार्श्वस्थपक्षयोरुभयोरपि ॥१००॥
प्रसारणाघात*क्रियासिद्धयर्थं च तथैव हि ।
तिर्यङ्न्यग्गुलरूपेणोपसंहारार्थं शास्त्रतः ॥ १०१ ॥
स्वानुकूलं यथा तत्र कीलकास्स्थापितास्तथा ।
विमानस्य पुरोभागस्थितपङ्कभ्रमाय हि ॥ १०२ ॥
शलाका नालमध्यस्था योजिताश्चौष्ण्ययन्त्रके ।
विमानयान के उपर्युक्त यन्त्र इसमें रचे हैं उसके मध्यकेन्द्र में नालस्तम्भ मूल दृढ करे, इस
नालस्तम्भ मूल में चारों दिशाओं में यथाक्रम चार वाताकर्षण यन्त्र—वायु का आकर्षण करने वाले यन्त्र
स्थापित हों, उनके प्रेरक चार औष्ण्य यन्त्र ताप देने वाले यन्त्र ( ऐंञ्जिन ) भी रखे हों। विमान के
पिछले भाग और पूर्व भाग में दोनों यन्त्रों के मध्यकेन्द्र में वातापकर्षण यन्त्र—वात को फेंकने वाले यन्त्र
हों और वातपाचक यन्त्र भी सुदृढ लगावे। इस यन्त्रमुख में यथाविधि वातपाचनार्थ बाह्य वायु को अन्दर
भरने को क्रम से पृथक दो यन्त्र होने चाहिएं वे विमान यान के पूर्व पश्चात् के भागों में ठीक रखे हों।
विमान के दोनों पाश्र्वों में स्थित पंखों को प्रसारण के आघात या प्रसारण और आधानक्रिया सिद्धि के
लिए तिर्यक्—तिरछा नीचे समेटनेरूप से उपसंहार के लिये भी शास्त्र से अनुकूल कीलें वहां लगानी
चाहिएं। विमान के सम्मुख भाग स्थित वातव्यक्तीकरण चक्र† भ्रमण के लिए औष्ण्यक यन्त्र ( ऐञ्जिन )
में शलाकाएं नाल के मध्य में युक्त हों ॥ ९५–१०२ ॥
अथ पक्षनिर्णयः—अब पंखों का निर्णय करते हैं—
विंशद्वितस्त्युन्नत तदायामोऽष्टवितस्तिकः ॥ १०३ ॥
गात्रे सार्धवितस्तीति निश्चितं पक्षमूलयोः ।
तन्मूलो कीलके सम्यक् सुदृढ योजित क्रमात् ॥ १०४ ॥
पक्षयो पञ्चिमभागे रेखावत्परिदृश्यते ।
तत्पुरोभागविस्तारो वितस्तिदशकं भवेत् ॥ १०५ ॥
पश्चाद्भागस्य विस्तारो चत्वारिंशद्वितस्तयः ।
पक्षोन्नत्य वितस्तीनां भवेत् षष्टितम क्रमात् ॥ १०६ ॥
एतदाकारसंयुक्तं पक्षद्वयमितीरितम् ।
- घात ( हस्तलेपे )
† पचि व्यक्तीकरणे ( भ्वादि० )