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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 368 में से

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पृष्ठ 257

२३४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यन्त्रकल्पेऽपि—यन्त्रकल्प में भी--
जातिभेदो विमानानां मान्त्रिकादिप्रभेदतः ।
युगशक्त्यनुसारेण प्रोक्तं यानविदां वरैः ॥ ४७ ॥ इत्यादि ॥
विमानों का जातिभेद मान्त्रिक आदि प्रकार से युगशक्ति के अनुसार यानवेत्ताओं में श्रेष्ठ-
जनों ने कहा है ॥ ४७ ॥
मान्त्रिको तान्त्रिकश्चैव कृतकश्चेति शास्त्रतः ।
जातिभेदास्त्रिधा प्रोक्ता विमानाना बुधैः क्रमात् ॥ ४८ ॥
इति यानबिन्दौ
मान्त्रिक तान्त्रिक और कृतक शास्त्रानुसार जातिभेद तीन प्रकार के विमानों के
विद्वानों ने कहे हैं ॥ ४८ ॥ यह यानबिन्दु में कहा है ।
युगभेदाज्जातिभेदो विमानाना महर्षिभिः ।
मान्त्रिकादिप्रभेदेन त्रिधा शास्त्रेषु वर्णितम् ॥ ४६ ॥
इति खेटयानप्रदीपिकायाम् ।
युगभेद से जातिभेद विमानों का महर्षियों ने मान्त्रिक आदि प्रकार से तीन प्रकार शास्त्रों में
कहा है ॥४६॥ यह खेटयान प्रदीपिका में कहा ॥
त्रैविध्य व्योमयानाना युगभेदानुसारत ।
उक्त हि शास्त्रतस्सम्यग्यानशास्त्रविदा वरैः ॥ ५० ॥
इति व्योमयानार्कप्रकाशिकायाम् ॥
युगभेद के अनुसार व्योमयानों की त्रिविधता शास्त्रसम्मत ठीक यानशास्त्रज्ञ श्रेष्ठ विद्वानों ने कही
है ॥५०॥ यह व्योमयानार्कप्रकाशिका में कहा है ।
एव शास्त्रानुसारेण सूत्रेऽस्मिन् जातिभेदत ।
त्रैविध्य व्योमयानानामुक्त सम्यग्यथाविधि ॥ ५१ ॥ इत्यादि ॥
इस प्रकार शास्त्रानुसार इस सूत्र में जातिभेद से विमानों की त्रिविधता यथाविधि सम्यक्
कही है ॥५१॥
पञ्चविंशन्मान्त्रिकाः पुष्पकादिप्रभेदेन ।। अ० २ । सू० २ ॥१
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे विमानाना त्रैविध्य जातिभेदत ।
युगरूपानुसारेण वर्णित सप्रमाणत ॥ ५२ ॥
मान्त्रिका इति ये प्रोक्ता विमानास्तेषु शास्त्रतः ।
पुष्पकादिप्रभेदेन तेषां संख्याविनिर्णयः ॥ ५३ ॥
विशदी क्रियते सम्यक् सूत्रेऽस्मिन् शास्त्रतः ।
पदानि त्रीणि शास्त्रेऽस्मिन् यानसंख्याविनिर्णये ॥ ५४ ॥