बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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जाने वालों (विमानों) का शतांश हो इस प्रकार विमान का पीठभाग बनावे, विमानयान के ऊंचाई के
माप के आधे माप से पीठ बनावे, उसके मध्य में नालस्तम्भ को घूमनेवाली कीलों के साथ स्थापित
करे ॥ ४५-४७ ॥
नालस्तम्भलक्षणं लल्लेनोक्तम्-नालस्तम्भलक्षण लल्ल आचार्य ने कहा है-
लल्लोक्त यथा शास्त्रे यन्त्रकल्पतरी क्रमात् ।
तदेवात्र प्रवक्ष्यामि नालस्तम्भस्य लक्षणम् ॥ ४८ ॥
हाटकास्येन लोहेन नालस्तम्भ प्रकल्पयेत् ।
न कुर्यादन्यलोहेन कृतञ्चेन्नाशमेष्यते ॥ ४६ ॥
लल्ल आचार्य ने यन्त्रकल्पतरु शास्त्र में जैसे क्रम से कहा है वह ही यहां नालस्तम्भ का
लक्षण कहूंगा। हाटकास्य लोहे से नालस्तम्भ बनाना चाहिए अन्य से किया तो नाश को प्राप्त हो
जाता है ॥ ४८-४६ ॥
हाटकास्यलोहमुक्तं लोहतन्त्रे-हाटकास्य लोहा कहा है लोहतन्त्र में-
सुवर्चलस्याष्टमभागान् लघुश्विद्स्य षोडश ।
लघुबम्भारिकस्याष्टादशभागान् रवेस्तथा ॥ ५० ॥
शतभागान् सुसंयोज्य मूषाया सन्निवेश्य च ।
कूर्भव्यासटिकामध्ये संस्थाप्य सुदृढ यथा ॥ ५१ ॥
सप्तोत्तरत्रिशत्कक्ष्यप्रमाणेिन वेगत ।
महोर्मिभस्त्रिकात्सभ्यक् तःनेत्रोन्मीलनावधि ॥ ५२ ॥
गालयेद् विधिवत् पश्चाद्धाटकास्य भविष्यति । इत्यादि ॥
सुवर्चल-सज्जीक्षार आठ भाग, लघुश्विद्वङ्क हल्का लोहा-जस्ती टीन? सोलह भाग, लघुम्बभारिक?
अठारह भाग, रवि-ताम्बा सौ भाग, इन्हें मिलाकर मूंषिका (कृत्रिम बोतल) में भरकर कूर्भव्यासटिका-कूर्मा-
कार कुण्ड के मध्य में रखकर तीन सौसात दर्जे की उष्णता से वेग से महोर्मिंनामक भस्त्रिक-धोंकनी से
भली भांति नेत्रोन्मीलन अवधि तक गलावे फिर हाटकास्यलोहा हो जावेगा ॥ ५०-५२ ॥
पीठनिय-पीठ-भूमिका-नीचे के ढांचे का निर्णय कहते हैं-
पीठोन्नत्यू वितस्तीनामशीतिरिति वर्णितम् ।
षट्पञ्चाशद्वितस्तीनामायाम च तथैव हि ॥ ५३ ॥
बितस्तिसप्तत्योंन्नतय दक्षिणोत्तरभागयो ।
ह्रस्वो भूत्वान्त्यभागे तु त्रिकोणाकारसयुतम् ॥५४॥
शकुनाख्यविमानस्य पीठाकारमितीरितम् ॥ ५५ ॥
पीठ की ऊंचाई अस्सी बालिशत कही, छप्पन बालिशत लम्बाई चौडाई, दक्षिण और उत्तर
भागों में ऊंचाई सत्तर बालिशत, अन्तवाले भाग में छोटा होकर त्रिकोण आकारयुक्त पीठ का आकार
शकुनविमान का कहा है ॥ ५३-५५ ॥