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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 368 में से

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पृष्ठ 276

हस्तलेख कापी संख्या १८—
सुन्दरोथ ॥ अ० ३, सू० ६ ॥ १
एवमुक्त्वा शकुनविमान शास्त्रानुसारतः ।
अथेदानो सुन्दरविमान सम्यक् प्रचक्षते ॥ १ ॥
यानप्रबोधकपदद्वयमस्मिन्निरूपितम् ।
तत्रादिमपदाद् याननाम सम्यक् प्रकाशितम् ॥ २ ॥
श्रानन्तर्यवाची स्याद् द्वितीयपदमत्र (हि) तु ।
एव पदद्वयस्यार्थस्सामान्येन निरूपितः ॥ ३ ॥
इदानी तद्विशेषार्थं सग्रहेण प्रचक्षते ।
अष्टाङ्गान्यस्य शास्त्रेस्मिन्निर्णितानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
तेषा स्वरूप विधिवद् विचार्याथ पृथक् पृथक् ।
विलिख्यते यथाशास्त्र सग्रहेण यथामति ॥ ५ ॥
आदौ पीठस्ततो धूमनालस्तम्भस्तथैव हि ।
पश्चाद् धूमोद्गमयन्त्रपञ्चक च तत परम् ॥ ६ ॥
भुज्युलोहकनालश्च ततो वातप्रसारणम् ।
विद्युद्यन्त्र ततो धातुर्मुखोष्मकमत परम् ॥ ७ ॥
विमाननिर्णयश्चैतान्यष्टाङ्गानि भवन्ति हि ।
तेष्वादौ यानपीठस्य रचनाविधिरुच्यते ॥ ८ ॥
इस प्रकार शकुनविमान शास्त्रानुसार कहकर अब सुन्दरविमान कहते हैं । यान के प्रबोध
करानेवाले दो पद यहा निरूपित किए हैं, उनमें आदि पद से विमान यान का नाम सम्यक् प्रकाशित
किया है द्वितीय पद अनन्तर अर्थ का वाचक यहां है । इस प्रकार दोनों पदों का सामान्य अर्थ निरूपित
कर दिया । अब संक्षेप से इसका विशेष अर्थ कहते हैं । इस शास्त्र में इसके आठ अङ्ग निश्चित किए
हैं इनका विधिवत् स्वरूप विचार कर यथाशास्त्र संक्षेप से पृथक् पृथक् लिखा जाता है । प्रथम पीठ फिर
धूमनालस्तम्भ पश्चात् पांच धूमोद्गमयन्त्र, भुज्य लोहे की नाल, फिर वातप्रसारण फिर विद्युद्यन्त्र पश्चात्
धातुर्मुखोष्मक यन्त्र । ये आठ अङ्ग विमाननिर्णय प्रसङ्ग में हैं जिनमें आदि में विमानयान के पीठ की
रचनाविधि कही जाती है ॥ १-८ ॥