बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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अथनालस्तम्भनिर्णयः- अब नालस्तम्भ का निर्णय कहते हैं—
स्तम्भमूलं वितस्तीनां पञ्चत्रिंशदितीरितम् ।
प्रदक्षिणावृतोत्प्रत्यवर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५६ ॥
अन्तर्वलयमानन्तु त्रिंशद्वितस्तय क्रमात् ।
स्तम्भमध्यप्रमाणं तु वर्तुंलाकारतो बहि ॥ ५७ ॥
वर्णित शास्त्रत सम्यक् पञ्चविंशद्वितस्तय ।
तदन्तर्वलयाकारो वितस्तीना हि विंशति ॥ ५८ ॥
स्तम्भान्त्यस्य बहिर्गात्रो वर्तुंलाकारत क्रमात् ।
विंशद्वितस्तय प्रोक्ता ( ? ) तदन्तर्वलयाकृति ॥ ५६ ॥
वितस्तीना पञ्चदशेत्युक्त शास्त्रे मनीषिभि ।
एव प्रमाणतोशीतिवितस्त्योन्नतयत क्रमात् ॥ ६० ॥
नालस्तम्भो राजलोहात्कारयेद् यानकर्मणि ।
तन्मूले पञ्चदशाङ्गुलप्रमाणावधिक्रमात् ॥ ६१ ॥
पीठे स्तम्भप्रतिष्ठार्थ कुर्यादावर्तनीलकम् ।
कर्तुं न्यूनाधिक वायुवेग कालोचित यथा ॥ ६२ ॥
स्तम्भान्तरे दृढ चक्रषट्क संस्थापयेत् क्रमात् ।
पीठ के मध्य जो नालस्तम्भ लगता है उसका मूल—नीचलाभाग ३५ वालिश्त कहा है, घूम के
साथ उठकर बाहिर से गोल हो । पीठ के अन्दर गोलाई में ३३ वालिश्त रहे स्तम्भ के बीच का प्रमाण
तो बाहिर गोलाकार २५ वालिश्त शास्त्र से वर्णित किया है, उसके अन्दर वलयाकार २० बालिश्र्त स्तम्भ
का अन्त्य-सिरा हो बाहिरी अङ्ग गोल हो । उसके अन्दर २० बालिश्त फिर उसके अन्दर अन्य भाग
१५ बालिरत शास्त्र में मनीषियों ने कहा है, इस प्रकार प्रमाण से पाच भागों की ८० वालिश्त ऊंचाई
होनी चाहिए । नालस्तम्भ राजलोहे से करावे विमानयानकर्म में, उसके मूल में १५ अंगुल स्तम्भ के
प्रतिष्ठार्थ घूमनेवाली कील पीठ में करे अथवा वायुवेग समय के अनुसार न्यूनाधिक करे । स्तम्भ के
अन्दर छः दृढ चक्र क्रम से स्थापित करे ॥५६-६२॥
चक्रनिर्णय. — चक्र का निर्णय कहते हैं—
पीठाच्चतुर्थवितस्तीनामूर्ध्वं स्तम्भान्तरे क्रमात् ॥६३॥
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रयं सन्धारयेत् क्रमात् ।
चक्रावर्त वितस्तीना सार्धपञ्चदश स्मृतम् ॥६४॥
पीठाच्चतुश्चत्वारिंशद्वितस्त्योर्ध्वे तथैव हि ।
सरन्ध्रं वर्तुंल चक्रत्रय सम्यक् प्रतिष्ठितम् ॥६५॥
एतेषूर्ध्वाधस्यचक्रद्वय दृढमचञ्चलम् ।
यथा भवेत् तथा सम्यग्बध्नीयाच्छङ्कुभि क्रमात् ॥६६॥