बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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लल्लोऽपि—लल्ल आचार्य भी कहते हैं—
एक एव प्रभेदस्स्यान्मान्त्रिकादपि तान्त्रिके ॥ ८ ॥
द्यावापृथिव्योर्यच्छक्ति तस्यास्सम्मेलनक्रमः ।
आकारगतिवैचित्र्यादिषु सर्वत्र हि क्रमात् ॥ ९ ॥
एतद्विना समानत्वमुभयोरपि वर्णितम् (.?) ।
तान्त्रिकाणां प्रभेदस्तु षट्पञ्चाशदिति क्रमात् ॥ १० ॥
सूत्रे यदुक्तं तच्छौनकोक्तरीत्या निरूप्यते ।
मान्त्रिक विमान से तान्त्रिक विमान में एक ही भेद है वह यह कि द्यावापृथिवी की जो शक्ति
है उसका सम्मेलन क्रम बिना इसके आकार गति वैचित्र्य आदि में क्रम से सर्वत्र ही दोनों में समानत्व
है तान्त्रिकों का भेद ५६ निर्णय किया है। जो कि शौनक की कही रीति के अनुसार निरूपित किए
जाते हैं ॥ ८—१० ॥
तत्र तावच्छौनकसूत्रम्—उस विषय में अब शौनक सूत्र कथन है—
द्वापरे* तान्त्रिकाण्यष्टपञ्चाशत्तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम । भैरवनन्दनवटुक-
विरिञ्चितुम्बरवैनतेयभेरूण्डमकरध्वजशृङ्गाटकाम्बरीषशेषास्यसैहिकमातृक-
भ्राजपैङ्गलटिट्टिभप्रमथभूर्विणचम्पकद्रौणिकरुक्मपुङ्खभ्रामणिककुकुभकालभैरव
जम्बुकगिरीशगरुडास्यगजास्यवसुदेवशूरसेनवीरबाहु बुसुण्डगण्डकशुकतुण्ड-
कुमुदकौशिकाइजगरपञ्चदलचुम्बकदुन्दुभिरम्बरास्यमायूरकभीरूनलिककाम-
पालगण्डक्षंपारियात्रशकुन्तरविमण्डनव्याघ्रमुखविष्णुरथसौवर्णिकमुड-
दम्भोलिबृहत्कुक्षमहानट इति ।
द्वापर युग में तान्त्रिक विमान ५६ हैं उनके नाम कहेंगे । भैरव, नन्दन, वटुक, विरिञ्चि, तुम्बर,
वैनतेय, भेरूण्ड, मकरध्वज, शृङ्गाटक, अम्बरीष, शेषास्य, सहिक, मातृक, भ्राज, पैङ्गल, टिट्टिभ, प्रमथ,
भूर्विण, चम्पक, द्रौणिक, रुक्मपुङ्ख, भ्रामणि, ककुभ, कालभैरव, जम्बुक, गिरीश, गरुडास्य, गजास्य,
वसुदेव, शूरसेन, वीरबाहु, ब्रुसुण्ड, गण्डक, शुकतुण्ड, कुमुद, कौशिक, अजगर, पञ्चदल, चुम्बुक, दुन्दुभि,
अम्बरास्य, मायूरक, भीरु, नलिक, कामपाल, गडक्षं, पारियात्र, शकुन्त, रविमण्डन, व्याघ्रमुख, विष्णुरथ,
सौवर्णिक, मूढ, दम्भोलि, बृहत्कुक्ष, महानट ॥
माणिभद्रकारिका-इस विषय में माणिभद्रकारिका कथन है—
षट्पञ्चाशदिति प्रोक्तास्तान्त्रिका द्वापरे युगे ।
तेषां नामानि विधिवद् गोतमोक्तप्रकारतः ॥ ११ ॥
निरूप्यन्तेऽत्र विधिवद् यथाशास्त्र समासतः ।
भैरवो नन्दकस्तद्वद्वटुकोथ विरिञ्चिकः ॥ १२ ॥
तुम्बरो वैनतेयश्च भेरुण्डो मकरध्वज ।
शृङ्गाटकोम्बरीषश्च शेषास्यो सैंहिकस्तथा ॥ १३ ॥
- त्रेताया ( हस्तपाठे ) लेखक प्रमादतः ।