बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 260, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ेंहस्तलेख कापी नं १७—
भैरवादिभेदात् तान्त्रिकाष्टपञ्चाशत् ॥ अ० २, सू० ३ ॥ ?
बो० वृ०
पूर्वसूत्रे मान्त्रिकाणा नामसंख्यादिनिर्णयः ।
कृतो यथा तान्त्रिकव्योमयानाना तथैव हि ॥ १ ॥
नामसंख्यानिर्णयार्थं सूत्रोयं परिकीर्तित ।
तान्त्रिकाणा नामसंख्याबोधकानि पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
पदानि त्रीणि सूत्रेस्मिन् वर्णितानि यथाक्रमम् ।
तत्रादिमपदाद् याननामभेदो निरूपित ॥ ३ ॥
द्वितीयपदतस्तेषा जातिभेद प्रदर्शित ।
तृतीयपदतस्संख्यानिर्णयस्समुदीरितः ॥ ४ ॥
एव सामान्यतस्सूत्रपदार्थ परिकीर्तित ।
इदानीं तद्विशेषार्थस्सङ्ग्रहेण निरूप्यते ॥ ५ ॥
आकारगतिवेगाद्या मान्त्रतान्त्रिकयोः क्रमात् ।
समानमिति वर्ण्यन्ते यानशास्त्रविदा वरैः ॥ ६ ॥
तथापि तान्त्रिकेष्वेकप्रभेद परिकीर्त्यते ।
द्यावापृथिव्योस्सन्ध्यस्थशक्तिसम्मेलनक्रमः ॥ ७ ॥
एकप्रभेद इत्याहुस्तान्त्रिकेषु मनीषिणः ।
पूर्व सूत्र में मान्त्रिक विमानों के नाम और संख्या आदि का निर्णय जैसे कर दिया वैसे ही
तान्त्रिक व्योमयानों के भी नाम और संख्या के निर्णयार्थ यह सूत्र कहा गया है । तान्त्रिकों के नाम और
संख्या के बोधक पृथक् पृथक् तीन पद इस सूत्र में यथाक्रम वर्णित हैं । आदिपद से नाम भेद निरूपित
किया है, द्वितीय पद से उनका जातिभेद दिखलाया है, तृतीय पद से संख्या निर्णय प्रकट किया है ।
इस प्रकार सामान्य से सूत्र का पदार्थ — सूत्र पदों का अर्थ कहा गया है अब उसका विशेष अर्थ संक्षेप से
निरूपित किया जाता है । आकार गति वेग आदि मान्त्रिक और तान्त्रिक में क्रम से यानशास्त्रवेत्ताओं
द्वारा समान कहे जाते हैं तथापि तान्त्रिकों में एक प्रभेद कहा गया है, द्यावापृथिवी की सन्धि में स्थित
शक्ति का सम्मेलनक्रम ही भेद मनीषी तान्त्रिकों में कहते हैं ॥ १—७ ॥