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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

शकुनविमान ] [ २४५
कालानुसारतो मध्यचक्रसम्भ्रमणाय हि ।
नालस्तम्भस्य बाह्ये कीलकास्सम्यक् प्रतिष्ठिता. ।।६७।।
चक्रेषु रन्ध्रस्थितत्वादचलत्वाद् द्विचक्रयोः ।
मध्यचक्रभ्रमात् सम्यक्चक्रत्रयसमूह्त ।।६८।।
वायुसञ्चरणार्थाय सम्यक् मार्गं कृतं भवेत् ।
एतेन वायुसञ्चारस्तिरोधानोप्यथाक्रमम् ।।६६।।
अनुलोमाद्विलोमाच्च बाह्यकीलकचालनात् ।
भवेत्कालानुसारेण सप्रमाणं यथाविधि ।।७०।।
पीठ से चार बालिश्त ऊपर स्तम्भ में कम से छिद्रसहित गोलाकार तीन चक्र लगादे,
चक्रों का घेरा साढे पन्द्रह बालिश्त हो । उसी प्रकार पीठ से ४४ बालिश्त ऊपर छिद्रसहित गोलाकार
तीन चक्र प्रतिष्ठित हों इनमें ऊपर नीचे दो अचल चक्र हों इस प्रकार उन्हें शंकुओं से बान्धे, कालानुसार
मध्यचक्र के घूमने के लिये नालस्तम्भ के बाहिर कीलें लगावे, चक्रों में छिद्र होने से और दो चक्रों के
अचल होने से मध्यचक्र के घूमने से तीनों चक्रों के समूह—तीनों के होने से वायु सञ्चार के लिये
सम्यक् मार्ग हो जाता है इस वायु का सञ्चार और उसका तिरोधान — बन्द हो जाना समयानुसार यथा-
विधि क्रम से कील के सीधा उल्टा चलाने से हो जाता है — होता रहेगा ।।६३-७०।।
गवाक्षशिखरनिर्णय —गवाक्ष शिखर का निर्णय—
बाह्यावृत्त गोपुरस्य सार्धपञ्चदशक्रमात् ।
वितस्तिप्रमाणमिति शास्त्रे प्रोक्तं महर्षिभि ।।७१।।
तदन्तर्वलयं पञ्चवितस्तय इतीरितम् ।
वितस्तिद्वयमोन्नत्यं सु दृढं च मनोहरम् ।।७२।।
गवाक्षशिखरं सम्यग् नालस्तम्भोपरि न्यसेत् ।
गोपुर-सूर्यकिरण द्वार का बाहरी घेरा साढ़े पन्द्रह बालिश्त माप का शास्त्रों से महर्षियों ने
कहा है उसके अन्दर का घेरा पांच बालिश्त कहा है दो बालिश्त उठाव आडेपन का सुन्दर गवाक्षशिखर-
झरोके की ऊंचाई नालस्तम्भ के ऊपर रखे ।
अथ रविचुम्बकमणिनिर्णयः —अब सूर्यकान्तमणि का निर्णय—
प्रदक्षिणावृत्तस्सप्तवितस्तिस्स्यान्मणेस्तथा ।।७३।।
वितस्तिद्वयमायामं वितस्तिद्वयगात्रकम् ।
आदित्यचुम्बकमणि शिखरस्योपरि न्यसेत् ।।७४।।
सूर्यकान्तमणि का घेरा ७ बालिश्त दो बालिश्त लम्बा चौड़ा दो बालिश्त मोटाईवाला हो
उस सूर्यचुम्बकमणि को गवाक्ष की चोटी पर रखे — ऊपरिभाग पर रखे जडवे ।
चतुरौष्मिकयन्त्राणि —चार औष्मिकयन्त्र—
पीठस्योपरिभागे तु वितस्तीनां चतुर्दश ।