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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

शकुनविमान ] [ २५१
प्रयाणकाले सर्वत्र सहायो भवति ध्रुवम् ॥ १२६ ॥
तथैव व्योमयानस्य पार्श्वयोरुभयोरपि ।
न्यग्गुलीकरणार्थाय पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२७ ॥
पक्षाघातककीलेपि कर्तुं स्याद् रज्जुबन्धनम् ।
एतद्रज्ज्वाकर्षणेन पक्षयोरुभयो क्रमात् ॥ १२८ ॥
विस्तृतत्वं च न्यग्भाव क्रमाद् भवति नान्यथा ।
प्रथमावरणादस्ति वितस्तिदशकादध ॥ १२६ ॥
सार्धद्वयबितस्त्यूर्ध्वोन्नत्यमात्र मनोहरम् ।
अन्यदावरण पीठात् किञ्चिन्न्यून प्रमाणतः ॥ १३० ॥
वातनालस्तम्भमूलमेकस्मिन् शास्त्रतो दृढम् ।
प्रदक्षिणावृत्तभागात्सम्यक संयोजित भवेत् ॥ १३१ ॥
वातपा चक्र यन्त्र के पूर्व भाग में यथाविधि तैलप्रज्वलन के लिए दीपचुल्ली लगी हो, उसमें
दीप प्रतिष्ठार्थ अग्नि की उत्पत्ति के निमित्त ही कीलों से विद्युद्यन्त्र दृढ स्थापित हो । इससे समयानुसार
अग्नि जल जावे, दीप के उपसंहार समय—बुझाने के समय तैल संरक्षण के लिए एक कील यथाविधि
लगी हो । पुच्छ के भीतरी प्रवेश के सिरे पर करने को रज्जुबन्धन हो, यन्त्रनियन्ता चालक द्वारा रज्जु के
खींचने से बार वार निरन्तर पुच्छ वेग से ऊपर नीचेवाले भागों में घूमती है इससे विमान के आरोहण—
ऊपर उठने वैसे ही अवरोहण—नीचे आने और प्रयाणकाल—उड़ते हुए सर्वत्र सहायक होता है । ऐसे
ही व्योमयान के दोनों पंखों को क्रम से नीचे ऊपर झुकाने को पंखों को आघात करने—प्रेरित करने
वाली कील में रज्जुबन्धन हो । इस डोरी के खींचने से दोनों पंखों का विस्तार गमन—अपगमन ऊर्ध्व-
गमन और पश्चाद् गमन नीचे गमन क्रम से होता है । प्रथम आवरण से १० बालिश्त नीचे तथा पीठ से
अढाई बालिश्त उठा हुआ अन्य आवरण हो, कुछ न्यून वातनाल मूल एक में घूमने वाले भाग से भली
प्रकार लगी हो—फिट हो ॥ १२१-१३१ ॥
तैलपात्रनिर्णयः—तैलपात्र का निर्णय करते हैं—
एतस्मिन्नेव विधिवज्जलावरणसयुतम् ।
बितस्तीना सार्धनवप्रमाणोन्नत्यक तथा ॥ १३२ ॥
चतुर्वितस्त्यावृत्त चायामे नववितस्तय ।
षडङ्गुल तदुपरिप्रमाणोनाभिर्वर्णिताम् ॥ १३३ ॥
वितस्तीनां पञ्चदशविस्तृताकारसयुतम् ।
तैलपात्रद्वय सम्यक् स्थापित सुदृढ यथा ॥ १३४ ॥
इसी मे विधिवत् जलावरण से युक्त साढे नौ बालिश्त ऊंचाई में तथा चार बालिश्त घेरेवाला
या गोलाई में और नव बालिश्त छः अङ्गुल विस्तार में नाभि कही है पन्द्रह बालिश्त विस्तृत आकारवाला
लम्बे दो तैलपात्र सुदृढ सम्यक् स्थापित करे ॥ १३२—१३४ ॥