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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 259

२३६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
षण्मुखः पञ्चबाणश्च मयूरो शङ्करप्रियः ।
त्रिपुरोवसुहारश्च पञ्चाननोबरीषकः ॥ ६२ ॥
त्रिणेत्रो भेरुण्ड इति मान्त्रिकाणां यथाक्रमम् ।
एतान्युक्तानि नामानि पञ्चविंशन्महर्षिणा ॥ ६३ ॥ इत्यादि ॥
त्रेतायुग के मान्त्रिक विमान बत्तीस हैं गौतम के कहे हुए उनके नामों का यहां मूल सूत्र का
यथामति आलोडन करके करते हैं । पुष्पक, अजमुख, भ्राज, स्वयंज्योति, कौशिक, भीष्मक, शेष, वज्राङ्ग,
दैवत, ज्वल, कोलाहल, आर्चिष, भूष्णु, सोमाङ्ग, वर्णपञ्चक, षण्मुख, पञ्चबाण, मयूर, शङ्करप्रिय, त्रिपुर,
वसुहार, पञ्चानन, अम्बरीषक, त्रिणेत्र, भेरुण्ड, ये मान्त्रिक विमानों के नाम यथाक्रम महर्षि ने पच्चीस
कहे हैं ॥