सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 368 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

जात्यधिकरण ] [ २३५
तत्रादिमपदाद् यानसंख्या सम्यक् प्रदर्शिता ।
द्वितीयपदतो व्योमयानजातिनिरूपिता ॥ ५५ ॥
तृतीयपदतस्तेषा नामभेदा निरूपिता ।
एवं सूत्रस्थपदाना सामान्यार्थो निरूपितः ॥ ५६ ॥
इदानीं सप्रमाणेन ? विशेषार्थो विविच्यते ।
ये तु मन्त्रप्रभावेण (न ?) व्योम्नि सचरति ? स्वयम् ॥५७॥
तेष्वेकेकविमानस्य पुष्पकादिप्रभेदत ।
पञ्चविंशतिनामानि शौनकीये यथाक्रमम् ॥ ५८ ॥
निरूपितानि तान्येव क्रमादत्र प्रचक्षते ।
पूर्व सूत्र में जातिभेद से विमानों की त्रिविधता युगरूपानुसार सप्रमाण वर्णित की है, उसमें
जो शास्त्र में मान्त्रिक विमान कहे हैं पुष्पक आदि भेद से उनकी संख्या का निर्णय स्पष्ट इस सूत्र में
शास्त्रमान से सम्यक् किया जाता है, यानसंख्या निर्णय के सम्बन्ध में इस शास्त्र-सूत्र में तीन पद हैं ।
आदि पद से यानसंख्या सम्यक् दिखलाई है द्वितीय पद से व्योमयान जाति कही है तृतीय पद से
उनके नाम निरूपित किये हैं । इस प्रकार सूत्रस्थ पदों का सामान्य अर्थ निरूपित किया है । अब
सप्रमाण विशेष अर्थों का विवेचन करते हैं, जो तो मन्त्रप्रभाव से आकाश में स्वयं सञ्चार करते हैं उनमें
एक एक विमान का पुष्पक आदि प्रभेद से पच्चीस नाम शौनकीय सूत्र में यथाक्रम निरूपित किये हैं
उन्हें ही क्रम से कहते हैं ॥ ५२-५८ ॥
तत्र तावच्छौनकं सूत्रम्—उस विषय में शौनक सूत्र कथन—
अथ विमानेषु त्रेताया पञ्चविंशतिस्ते मान्त्रिकास्तेषा नामान्यनुक्र-
मिष्याम । पुष्पकाजमुखभ्राजस्वज्योतिर्मु खकौशिकभीष्मशेषवज्राङ्गदैवत-
ज्वलकोलाहलाचिर्विष्णुप्सोमांकपञ्चवर्णषण्मुखपञ्चबाणमयूरशङ्करत्रिपुरवसुहार-
पञ्चाननाम्बरीषत्रिनेत्रभेरूण्डा इति ॥
त्रेतायुग में विमानों में मान्त्रिक विमान हैं उनके नामों का वर्णन करेंगे—पुष्पक, अजमुख,
भ्राज, स्वज्योतिर्मुख, कौशिक, भीष्म, शेष, वज्राङ्ग, दैवत, ज्वल, कोलाहल, आर्चिष, भूष्णु, सोमाङ्क,
पञ्चवर्ण, षण्मुख, पञ्चबाण, मयूर, शङ्कर, त्रिपुर, वसुद्वार, पञ्चानन, अम्बरीष, त्रिनेत्र, भेरुण्ड ॥
माणिभद्रकारिका—इस विषय में माणिभद्रकारिका कथन—
त्रेतायुगविमानास्स्युर्द्वात्रिंशन्मान्त्रिका इति ।
गौतमोक्तानि नामानि तेषामत्र यथाक्रमम् ॥ ५६ ॥
विविच्यन्ते समालोड्य मुलसूत्रं यथामति ।
पुष्पकोऽब्जमुखो भ्राजस्स्वज्योतिश्च कौशिक. ॥ ६० ॥
भीष्मकदशेषवज्राङ्गो दैवतो ज्वल एव च ।
कोलाहलोर्चिषो भूष्णुस्सोमाङ्को वर्णंपञ्चक. ॥ ६१ ॥