बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
पृष्ठ 265, कुल 368 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
सम्यक् विमानरचनाविधि में लोहाधिकरण में—लोहप्रसङ्ग में सोलह ऊष्मप श्रेष्ठ से श्रेष्ठ
लोहे हैं उनमें चतुर्थ लोहा राजनामकोलोहा कहा है उसी से शकुनविमान बनावे यह वर्णित किया है ।
आदौ पीठस्ततो नालस्तम्भ पश्चाद् यथाक्रमम् ।
त्रिचक्रकीलकान्यस्य सरन्ध्राणि तत परम् ॥ ३९ ॥
चतुरोष्ण्यकयन्त्राञ्च वातनालास्तथैव हि ।
ततो जलावरणानालस्तैलपात्रमत परम् ॥ ४० ॥
वातपाचकतन्त्रीनालोथ्चुल्ली तथैव च ।
विद्युद्यन्त्रञ्चाथ वातचोदनायन्त्र एव च ॥ ४१ ॥
तथैव वातपायन्त्रो दिक्प्रदर्शकध्वजस्तथा ।
पश्चाच्छकुनयन्त्रञ्च तत्पक्षद्वयमेव च ॥ ४२ ॥
विमानोत्क्षेपणार्य तत्पुच्छभागस्तथैव हि ।
ततो विमानसञ्चारकारणोष्ण्यकयन्त्रक ॥ ४३ ॥
किरणाकर्षणमणिैरित्यष्टाविंशति क्रमात् ।
अङ्गान्यक्तानि शकुनविमानस्य यथाक्रमम् ॥ ४४ ॥
प्रथम पीठ भूमिका—नीचे का ढांचा फिर नालस्तम्भ, पश्चात् यथाक्रम तीन कीलचक्र छिद्र-
सहित, चार औष्ण्यकयन्त्र कदाचित् ऐन्जिन, वातनाल, फिर जलावरणनाल, पुन तैलपात्र, वातपाचक
तन्त्रीनाल —वायु को गरम करने वाला तारों का नाल, चुल्ली—अगीठी (हीटर), विद्युद्यन्त्र, वातचोदना-
यन्त्र—वायु को फेंकने वाला यन्त्र, दिशाप्रदर्शक ध्वजा, शकुनयन्त्र उस विमान के दो पंख, विमान के
ऊपर उठाने को पुच्छभाग, विमान गति का कारण औष्ण्यक यन्त्र—एञ्जिन, किरणों का आकर्षण करने
वाली मणि । ये अठाईस २८ शकुनविमान के अङ्ग यथाक्रम कहे हैं ॥ ३९-४४ ॥
अथ यानरचनाविधिरुच्यते—अब विमानयान रचना की विधि कही जानी है—
पट्टिकायन्त्रतो लोहं समीकृत्य यथाविधि ।
चतुरश्रं वर्तुलं वा दो*लाकारमथापि वा ॥ ४५ ॥
विमानाकारो†भारस्तु भारवाणां शत यदि ।
कुर्यात् पीठं विमानस्य तदर्धेन यथाविधि ॥ ४६ ॥
यानमानानुसारेण पीठमेव प्रकल्पयेत् ।
तन्मध्ये स्थापयेन्नालस्तम्भमावर्तकीलकं ॥ ४७ ॥
पट्टिकायन्त्र से लोहे को यथाविधि एकसा करके—बराबर करके चतुष्कोण—चौकोण या गोल
या दोला के आकारवाला—लम्बा गोलाकार झूलनासा विमानाकार हो भार तो भारवों—भारवालों—भार ले
- दोला ( हस्तलेखे )
† विमानकारभारस्तु ( हस्तलेखे )