बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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इदानीं तद्विशेषार्थस्सङ्ग्रहेण विविच्यते ॥२४॥
आकारगतिवैचित्र्यादिषु शास्त्रान्महर्षिभिः ।
समानमिति हि प्रोक्तं मन्त्रतन्त्रादिकं विना ॥२५॥
कृतकानां प्रभेदस्तु पञ्चविंशदिति क्रमात् ।
सूत्रे निरूपितं यत्तच्छौनकोक्तप्रकारतः ॥२६॥
समालोच्य विशेषेण यथामति निरूप्यते ।
इस प्रकार तान्त्रिकविमान का नाम भेद आदि निर्णय कहकर कृतकविमानों के नामभेद आदि
के निर्णयार्थ भी वैसे ही क्रम से शास्त्ररीति से सम्यक् यह सूत्र कहा गया है । कृतकविमानों के नाम
संख्याबोधक पृथक् पृथक् तीन पद इस सूत्र में यथाक्रम वर्णित हैं, उनमें आदिमपद से यान के नाम
और भेद निरूपित किये हैं, उनका संख्याविभाग तो द्वितीयपद से जानना तृतीयपद से जातिभेद कहा
गया है । इस प्रकार सामान्य से सूत्र का पदार्थ निरूपित कर दिया, अब उसके विशेषार्थ का संक्षेप से
विवेचन किया जाता है । शास्त्र से आकार विचित्रगति आदियों में समान है मन्त्रतन्त्र आदि के विना
ऐसा महर्षियों ने कहा है । कृतकों के भेद पच्चीस हैं, यहां सूत्र में शौनक में कहे प्रकार से निरूपित
किया है उसे यथामति सम्यक् मन्थन करके विशेषरूप से निरूपित किया जाता है ॥
तत्र तावच्छौनकसूत्रम् — उसमें शौनक सूत्र कथन है—
अथ तिष्ये कृतकभेदाः पञ्चविंशतिस्तेषां नामान्यनुक्रमिष्याम ॥
शकुनसुन्दररुक्ममण्डलवक्रतुण्डभद्रकरुचकवैराजभास्करगजावर्तपौष्कलविरञ्चिनन्दककुमुद-
मन्दरहसशुकास्यसोमकक्रौञ्चकपद्मकसैहिकपञ्चबाण शौर्यायणपुष्करकोदण्डा इति ॥
कलियुग में कृतकविमान के भेद पच्चीस हैं उनके नाम कहेंगे । शकुन, सुन्दर, रुक्म, मण्डल,
वक्रतुण्ड, भद्रक, रुचक, वैराज, भास्कर, गज, आवर्त, पौष्कल, विरञ्चि, नन्दक,कुमुद, मन्दर,हंस, शुकास्य,
सोम, क्रौञ्चक, पद्मक, सैंहिक, पञ्चबाण, शौर्यायण, पुष्कर, कोदण्ड ॥
माणिभद्रकारिका—माणिभद्रकारिका कथन है—
पञ्चविंशदिति प्रोक्ताः कृतकास्तु कलौ युगे ।
तेषां नामानि विधिवद् गौतमोक्तविधानतः ॥२७॥
विविच्यन्तेऽत्र विधिवत्सङ्ग्रहेण यथाक्रमम् ।
शकुनो सुन्दरश्चैव रुक्मको मण्डलस्तथा ॥२८॥
वक्रतुण्डो भद्रकश्च रुचकश्च विराजकः ।
भास्करश्च गजावर्तपौष्कलोथ विरञ्चकः ॥ २६ ॥
नन्दकः कुमुदस्तद्वन्मन्दरो हंस एव च ।
शुकास्यस्सोम्यकश्चैव क्रौञ्चको पद्मकस्तत ॥ ३० ॥
सैंहिको पञ्चबाणश्च शौर्यायणस्तथैव हि ।
पुष्करः कोदण्ड इति कृतकाः पञ्चविंशतिः ॥ ३१ ॥ इति